Strategy Man’s Litmus Test : कुर्सी’ के रणनीतिकार पीके के लिए चैलेंजिंग है बिहार चुनाव

दीपक कुमार तिवारी 

पटना । अब तक अन्य दलों को राजनीति में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने की रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर, अब अपनी स्ट्रैटजी का लिटमस टेस्ट खुद 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में देने जा रहे हैं। अब तक चुनाव से दूर रह कर राज्य भ्रमण में लगे प्रशांत किशोर परोक्ष रूप से राजनीति से भले दूर थे, मगर अपरोक्ष रूप से जनता की नब्ज ही पकड़ रहे थे।

प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर को अपनी नई पार्टी को लॉन्च करने का ऐलान किया है। इनका दावा है कि बिहार के आधे लोग नया विकल्प चाह रहे हैं, वो लालू और नीतीश की राजनीति को और ढोने के मूड में नहीं हैं।दरअसल, प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में एक खास टाइमिंग का इंतजार कर रहे थे। कई तरह के असंतुलन के घेरे में आ रहे नीतीश कुमार का एक वर्ग प्रशांत के दिमाग में था, वो था विकास, अमन, शांति पसंद करने वाला क्लास।

प्रशांत किशोर के निशाने पर वो सवर्ण वर्ग भी हैं, जो अभी भाजपा का कोर वोटर बना हुआ है। वो सवर्ण वर्ग नीतीश कुमार की पलटी मार राजनीति के कारण विकल्प की नजर से कांग्रेस को देख रहा है। लेकिन कांग्रेस की असमर्थता और राजद का जंगलराज बार-बार उसे भाजपा के साथ बने रहने को विवश कर देता है।

बिहार में जनसंपर्क शुरू करने के पीछे प्रशांत किशोर जनता के उस नब्ज को पकड़ना चाहते थे। आंकड़ों के बाजीगर अपनी यात्रा में जनता से रू-ब-रू होकर और प्रश्नों के जरिए प्रशांत किशोर अपने लिए राजनीति का ‘प्रतिशत’ ही तैयार कर रहे थे। इसमें अपनी राजनीति का भविष्य ही देख रहे थे। जब लगा कि यही खास समय है, आगामी बिहार विधानसभा के चुनावी जंग में उतरने के फैसले का इजहार कर दिया।

प्रशांत किशोर ने जनसुराज अभियान को अब राजनीतिक दल में परिवर्तित करने जा रहे हैं। इसके लिए 2 अक्टूबर की तारीख भी घोषित कर दी।
पार्टी का नाम जन सुराज पार्टी रखते अपने चुनावी जीत का दावा भी किया। अपनी जीत को जनता के नजरिए में आए बदलाव को बड़ा कारण भी बताया। यही वजह भी रही कि उन्होंने भाजपा की नीतियों का विरोध किया।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर हमला किया तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मौकापरस्त गठबंधन को भी टारगेट किया। अपने लिए राजनीति का एक अलग रास्ता भी तैयार किया। पीके जानते थे कि उन्हें चुनावी जंग में राज्य की जनता बीजेपी, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बरक्स तौलेगी।

वर्ष 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पीके भले रणनीतिकार बनकर उतरे, मगर वे इस बहाने चुनाव की बारीकियां ही समझ रहे थे। कांग्रेस, जदयू और राजद गठबंधन के लिए काम करना भी उनके लिए एक अनुभव ही था। 2015 में महागठबंधन को मिली सफलता में पीके ने अपनी सफलता का भी रंग देखा। तब, एनडीए को 58 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जहां भाजपा को 53 सीटें मिली थी।

पीके इस बात को समझ गए कि एमवाई को राजद के पक्ष में बनाए रखने के लिए तेजस्वी यादव तैयार हैं। भाजपा के वोट बैंक और नीतीश कुमार के वोट बैंक को पाने की उम्मीद है।पीके की सोच और रणनीति के विरुद्ध ये हुआ कि लोकसभा 2024 में नीतीश कुमार के यूएसपी का असर दिखा। भाजपा से ज्यादा स्ट्राइक रेट लाकर जदयू के कई वरीय नेता अपने नीतीश कुमार की अगली पारी के प्रति विश्वस्त तो हुए ही, भाजपा फिर से नीतीश कुमार पर भरोसा कर बैठी।

ये भी कह डाला कि अगला चुनाव यानी वर्ष 2025 विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के चेहरे पर लडेंगे। अब पीके को एनडीए के इस नए विश्वास और मजबूत होते राजद के बीच अपना रास्ता बनाना हैं।

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