सोनम वांगचुक पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवियों से आग्रह है कि तर्क के बजाय विवेकपूर्ण ढंग से सोचें-बोलें। सोनम वांगचुक का अनशन टूटना जरूरी था अन्यथा उनकी जान भी जा सकती थी, वह प्राथमिक कार्य हुआ, इतना काफी है। अब सेकेंडरी कार्यों को प्राथमिकताओं की तरह न गिनाएं कि किससे जूस पिया ? गिलास से पिया कि चम्मच से पिया ?
और अगर उन बुद्धिजीवियों को प्राथमिकता और सेकेंडरी चीजें नहीं समझ आ रही हैं तो एक सप्ताह का अनशन कर लें, तब उन्हें खुद अपने प्रश्नों का उत्तर मिल जायेगा। ऐसे ही बुद्धिजीवियों, जो तर्कों पर ज्यादा बल देते हैं और प्राथमिक एवं सेकेंडरी लक्ष्यों में भेद नहीं कर पाते, उन सबके कारण ही आज देश तानाशाही के चौराहे पर आकर खड़ा हो गया था जिससे मजबूर होकर छात्र-युवाओं को आंदोलन करना पड़ा। सोनम वांगचुक ने इंसान के हाथ से जूस पिया। हर आदमी के भीतर एक इंसान भी होता है। वह चाहे सोया या जागा रहे, पर होता जरूर है। सोनम वांगचुक ने मंत्री के हाथ से नहीं, इंसान के हाथ से जूस पिया।
– धनंजय कुमार सिन्हा








