Social Service : कौन थी फ्लोरेंस नाइटिंगेल जिनको कहा जाता था नर्सों का फरिश्ता

Social Service : धनी परिवार से थी लेकिन फिर भी क्यों चुना नर्स बनना? जानें हमारे साथ दुनिया की एक महान महिला की कहानी

शिवानी मांगवानी 

फ्लोरेंस नाइटिंगेल : दुनिया में अनगिनत आधुनिक नर्सिंग है लेकिन क्या आप जानते है की उनका जन्मदाता कौन है ? ये कैसे जानते होंगे किसी ने बताया ही नही..लेकिन छोड़िए आज में आपको बता देती हुं की आधुनिक नर्सिग की शुरुआत करने वाली महिला थी फ्लोरेंस नाइटिंगेल जिन्हें लेडी विद द लैंप के उपनाम से भी पुकारा जाता था उन्होंने अपनी सेवा भावना के चलते कई हजार लोगों की मदद की। वही उन्होने नर्सिंग के क्षेत्र में आने के लिए अपने परिवार के विरोध का भी सामना किया। लेकिन लम्बे संघर्ष करने के बाद वो अपने लक्ष्य तक पहुंची औऱ अपनी एक खास पहचान बनायी….जी हां कढ़ी मेहनत के बाद फ्लोरेंस नाइटिंगेल रोगियों की सेवा में जुट गय़ी। कहा ये जाता है की अगर फ्लोरेंस नाइटिंगेल न होती तो आज नर्सिंग को एक सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का कैसा था बचपन?

फ्लोरेंस नाइटिंगेल के अगर जन्म की बात करें तो बतादें की इनका जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था हालकि उन्होने अपनी बाकी जिंदगी इंग्लैंड में बिताय़ी थी। खास बात ये है की आज भी हर 12 मई को उनके जन्मदिन पर हर साल 12 मई को वर्ल्ड नर्सिंग डे मनाया जाता है। बात करें फ्लोरेंस की फैमिली पर तो बतादें की उनका जन्म एक अमीर परिवार में हुआ जिनकी आर्थिक स्थिति काफी अच्छी रही। उनकी माता का नाम फ्रांसिस नाइटिंगेल तथा उनके पिता का नाम विलियम एडवर्ड नाइटिंगेल था। वही बात करें की फ्लोरेंस ने अपनी लाइफ में क्या किया तो बतादें की आप जानते हैं फ्लोरेंस ने अपना पूरा जीवन रोगियों की सेवा में बिताया लेकिन फ्लोरेंस खुद शारीरिक कमजोरी का शिकार थी। बचपन में उनके हाथ इतने कमजोर थे कि वे 11 साल की उम्र तक ठीक से लिख भी नही पाती थी

कैसे नर्स बनी थी फ्लोरेंस नाइटिंगेल ?

फ्लोरेंस नाइटिंगेल कैसे बनी थी नर्स और उन्होने यी लाइन क्यो चुनी थी ये सवाल अब आपके मन में जरुर आ रहा होगा क्योकि वो एक रिच फैमिली से थी तो उनको नर्स बनने की क्या जरुरत पड़ी तो इसी सवाल का जवाब भी आपको देते है दरअसल 1837 में फ्लोरेंस अपनी फैमिली के साथ यूरोप के सफर पर गई थी। उस समय इस तरह की यात्राओं को शिक्षा-दीक्षा के लिए जरूरी माना जाता था। एक तरह से यह इंसान के बौद्धिक विकास का हिस्सा थी। इसी सफर के दौरान उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि वो कुछ अलग करना चाहती हैं।

उन्होंने माता-पिता से कहा था कि ईश्वर ने उन्हें मानवता की सेवा का आदेश दिया है। माता-पिता हालांकि इस बात को सुनकर परेशान थे। इसके बाद उन्होंने नर्स बनने के बारे में बताया। साथ ही साथ बताया कि वो अपने मरीजों की अच्छी तरह सेवा और देखभाल करने के लिए दिल से काम करना चाहती हैं। जिसके बाद ये सुनकर उनके माता-पिता काफी नाराज हुए थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस दौर में ब्रिटेन में अमीर घरानों की महिलाएं कोई ऐसा काम नहीं करती थी। नर्सिंग को उस दौर में सम्मानित काम भी नहीं माना जाता था, इसलिए भी माता-पिता का मानना था कि अमिर घर की लड़की के लिए यह पेशा बिल्कुल सही नहीं है..लेकिन विरोध और गुस्से के बाद भी फ्लोरेंस अपने फैसले पर अड़ी रही। साल 1849 में उन्होंने शादी करने से भी मना कर दिया।

1850 में उन्होंने जर्मनी में दो सप्ताह की अवधि में एक नर्स के रूप में अपना प्रारंभिक प्रशिक्षण पूरा किया। इसके बाद उनके पेरेंट्स भी उनका साथ देने लगे। उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई करने की अनुमति दे दी। वो इस काम की बारिकियां सीखे जा रही थी। जिसके बाद वह इस लाइन में आगे बड़ती गई और लोगो की सेवा करने में आगे रही

पूरी दुनिया ने फ्लोरेंस के काम को सराहा

आपने देखा की कैसे फ्लोरेंस लोगो की सेवा करने के लिए अपने परिवार के भी खिलाफ चली गई थी..लेकिन अब आप ये भी सोच रहे होगें की क्या वो बस ऐसे ही लोगो की सेवा करती रही या उन्हे अपने काम के लिए सराहना भी मिली या नही ? तो ये भी जान लिजिए की पूरी दुनिया फ्लोरेंस के काम को आज भी सराहती है। भारत सरकार ने साल 1973 में नर्सों को सम्मानित करने के लिए उन्हीं के नाम से ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार’ की स्थापना की थी। यह नर्स दिवस के दिन दिया जाता था, एक तरह से फ्लोरेंस को आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक ही माना जाता है। जनवरी 1974 में इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्स ने अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस उनके जन्मदिन के दिन मनाने की घोषणा की। जिसके बाद से आज भी देश और दुनिया की जितनी भी नर्सेज है वो आज भी फ्लोरेंस को अपना फरिश्ता मानती है..ते आपने देखा की फ्लोरेंस ने लोगो की सेवा करने व नर्सेज को सम्मान दिलाने के लिए कितनी मेहनत की है…लेकिन सालो के संघर्ष के बाद ये महान महिला 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 के इस दुनिया को अलविदा कह गई जिसके बाद आज भी लोग उन्हें उनके काम के लिए याद करते हैं।

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