कृषि प्रधान देश में किसान की इतनी दुर्गति ?

शहर के माहौल को ब्यान कर रही है बेंगलुरु में किसान को मेट्रो में न चलने देने की की घटना 

जो किसान घरती का सीना चीर कर अन्न उपजाता है। अपने बेटे को बॉर्डर पर देश की सेवा करने के लिए भेजता है। उस किसान की इतनी दुर्गति क्यों ? क्या अन्नदाता शहरी लोगों को बोझ लगने लगा है। क्या इस किसान ने टोकन नहीं ख़रीदा था ? क्या यह घटना टीवी चैनलों की डिबेट नहीं होनी चाहिए थी।  

चरण सिंह 

कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि कृषि प्रधान देश में एक किसान को मेट्रो में चलने से रोक  दिया जाए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि ये कौन लोग हैं जो देश के किसान मेट्रो में चलने से रोक रहे हैं। देखने की बात यह है कि इस किसान को रोकने वाला एक सिक्योरिटी गार्ड है। मतलब कोई  अमीर व्यक्ति नहीं बल्कि एक आम आदमी है। निश्चित रूप से जिस सिक्योरिटी गार्ड ने  इन बुजुर्ग किसान को रोका, वह गांव से ही नौकरी करने आया होगा।

इस घटना को सामान्य घटना नहीं कहा जा सकता है। यह घटना देश में बन चुके माहौल को बयां कर रही है। जो किसान घरती का सीना चीर कर अन्न उपजाता है। अपने बेटे को बॉर्डर पर देश की सेवा करने के लिए भेजता है। उस किसान की इतनी दुर्गति क्यों ? क्या अन्नदाता शहरी लोगों को बोझ लगने लगा है। क्या इस किसान ने टोकन नहीं ख़रीदा था ? क्या यह घटना टीवी चैनलों की डिबेट नहीं होनी चाहिए थी। क्या यह मामला राजनीतिक मुद्दा नहीं बनना चाहिए। देश में ऐसा न कितने मामले देश में किसान और मजदूर के साथ हो  रहे हैं। कौन हैं इसके लिए जिम्मेदार ? क्या शहर में आने वाले लोग गांवों में अपने बाप दादा का संघर्ष भूलते जा रहे हैं ?  कोरोना महामारी में यह किसान ही  था जिसने देश को बचाया। केंद्र सरकार जो 80 करोड़  लोगों को जो फ्री में राशन देने की बात करती है उसे कौन उपजाता है।
यह घटना क्यों नहीं दिखाई दी बड़े पत्रकार होने का दम्भ भरने वाले लोगों को। देश में पहनावे को लेकर भेदभाव से जुड़ी खबरें लगातार आ  रही हैं। दो-ढाई साल पहले दक्षिण दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में एक महिला को सिर्फ इसलिए एंट्री नहीं दी गई कि वह विशुद्ध भारतीय परिधान साड़ी पहनी हुई थी। तब उस मामले ने बहुत तूल पकड़ा था। जांच हुई तो पता चला कि रेस्टोरेंट बिना वैध लाइसेंस के चल रहा था और आखिरकार उस पर ताला लग गया, लेकिन बेंगलुरु मेट्रो में बुजुर्ग से भेदभाव का मामला तो और भी ज्यादा गंभीर है। यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ा मसला था। आम जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली मेट्रो में आम जनता को इसलिए नो एंट्री कि उसका ड्रेस सही नहीं है?

 बेंगलुरु मेट्रो की घटना 18 फरवरी की थी लेकिन भला हो हर हाथ में कैमरे वाले युग का जो राष्ट्रीय स्तर पर उस घटना की चर्चा हुई और बीएमआरसी को गलती माननी पड़ी। घटना का वीडियो वायरल होने और सोशल मीडिया पर लोगों के आक्रोश के बाद बीएमआरसी को संबंधित सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को नौकरी से निकालने का ऐलान करना पड़ा। नौकरी से निकालना सही सजा है या नहीं, ये कहना मुश्किल है लेकिन बीएमआरसी को अपने सभी स्टाफ चाहे वे नियमित हों या संविदा पर, उन्हें जागरूक करने की जरूरत है ताकि इस तरह की घटना का दोहराव न हो सके।

बुजुर्ग को मेट्रो में चढ़ने से रोके जाने की ये घटना 18 फरवरी को राजाजीनगर मेट्रो स्टेशन पर हुई थी। इससे जुड़े वायरल वीडियो में दिख रहा है कि सिक्यॉरिटी स्टाफ एक बुजुर्ग को इसलिए एंट्री से रोक रहा है कि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं है। वीडियो में दिख रहा है कि लगेज स्कैनर के पास सफेद शर्ट और धोती में एक बुजुर्ग दिख रहा है। सिर पर गठरी है जिसमें संभवतः कपड़े हैं। सोशल मीडिया पर किसान बताए जा रहे उस बुजुर्ग के पास यात्रा के लिए जरूरी टिकट भी था। इसके बाद भी सुरक्षाकर्मी उसे एंट्री नहीं दे रहे क्योंकि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं हैं, ‘गंदे’ हैं। कार्तिक सी. एरानी नाम के एक यात्री ने बुजुर्ग को रोके जाने का विरोध किया। वीडियो में वह सिक्योरिटी स्टाफ के फैसले पर सवाल उठाते दिख रहे हैं। उनके साथ एक और यात्री भी सिक्योरिटी स्टाफ से बहस करते दिख रहे हैं कि किसान से सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। वह तो सिर्फ कपड़े लेकर जा रहे हैं, उन्होंने बीएमआरसी के किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है। वह सवाल करते हैं कि क्या ये वीआईपी ट्रांसपोर्ट है? क्या मेट्रो आम जनता के चलने के लिए नहीं है? क्या मेट्रो में चलने के लिए ड्रेस कोड लागू है? इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बेचारा बुजुर्ग चुपचाप शांत एक दूसरे का मुंह ताकता रहता है। हिंदी बोलने वाले उस बुजुर्ग को समझ ही नहीं आता कि क्या करें। वीडियो के आखिर में दिख रहा है कि सिक्योरिटी स्टाफ से बहस करने वाले युवक ने बुजुर्ग को साथ में लेकर स्टेशन में उनकी एंट्री कराई। वीडियो में उन्हें यह कहते सुना जा सकता है, ‘चलो भैया…कौन क्या बोलेगा?’ बुजुर्ग ने राजाजीनगर से मैजेस्टिक मेट्रो स्टेशन तक सफर किया।

घटना के करीब एक हफ्ते बाद 24 फरवरी को उसका वीडियो एक्स पर वायरल हो गया। लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई। लोगों ने कार्तिक नाम के शख्स की जमकर तारीफ की और बीएमआरसी को खूब खरीखोटी सुनाई। लोगों के आक्रोश के मद्देनजर बीएमआरसी ने घटना की जांच कराई और दोषी सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को बर्खास्त कर दिया। पूरी घटना बेहद शर्मनाक है। गांधी के देश में एक बुजुर्ग को मेट्रो में ये कहकर चढ़ने से रोकने की कोशिश होती है कि उसके कपड़े ‘ठीक नहीं’ हैं। एक आजाद मुल्क में कपड़े, चमड़ी के रंग, भाषा, रंग-रूप वगैरह के आधार पर भेदभाव की घटना की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अफसोस कि आजादी के करीब 8 दशक बाद भी इस तरह के भेदभाव की घटना हो रही है।

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