तो फिर से सहारा कंपनियों के खिलाफ धोखाधड़ी की जांच करेगा एसएफआईओ!

एसएफआईओ ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की दिल्ली हाईकोर्ट की लगी रोक को हटाने की याचिका  

द न्यूज 15  

नई दिल्ली। मोटा रिटर्न पाने के लालच में लोगों ने सहारा (Sahara) की कंपनियों में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया। लेकिन मैच्योरिटी पर इन कंपनियों ने निवेशकों को पैसा देने के बजाय ठेंगा दिखा दिया। इन कंपनियों पर निवेशकों से 50,000 करोड़ रुपये जुटाने और फिर इन पैसों के गबन का आरोप है। गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) सहारा की कंपनियों के खिलाफ इस कथित धोखाधड़ी की जांच कर रहा था लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी।
एसएफआईओ ने इस रोक को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की है और इस पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया है। एजेंसी की तरफ से सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में बताया के सहारा की नौ कंपनियों के खिलाफ नवंबर 2018 से जांच चल रही थी, जिसे इस साल 31 मार्च तक पूरा होना था। एसएफआईओ के मुताबिक कंपनी रजिस्ट्रार को सहारा की इन कंपनियों के निवेशकों की तरफ से कई शिकायतें मिली थीं। उनका कहना था कि मैच्योरिटी के बावजूद उन्हें अपना पैसा नहीं मिल रहा है।
क्या है मामला : कंपनी रजिस्ट्रार, मुंबई ने इन शिकायतों की जांच की थी और 14 अगस्त, 2018 को केंद्र सरकार से सहारा की कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू करने की सिफारिश की थी। इनमें सहारा क्यू शॉप यूनीक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, सहारा क्यू गोल्ड मार्ट लिमिटेड और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन शामिल हैं।31 अक्टूबर 2018 को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इस मामले की जांच का जिम्मा एसएफआईओ को सौंपा। एजेंसी ने जांच में पाया कि सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड, सहारा इंजिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने हाई रिटर्न का लालच देकर निवेशकों से क्रमश: 14,100 करोड़, 17500 करोड़ और 19,400 करोड़ रुपये जुटाए थे। इस तरह विभिन्न स्कीमों के जरिए निवेशकों से करीब 50,000 करोड़ रुपये जुटाए गए थे।
एजेंसी के मुताबिक निवेशकों को मैच्योरिटी का पैसा नहीं दिया गया और उन्हें ग्रुप की दूसरी कंपनियों की स्कीमों में यह पैसा कन्वर्ट करने के लिए मजबूर किया गया। एजेंसी के मुताबिक इन छह कंपनियों के अलावा ग्रुप की तीन अन्य कंपनियां एंबी वैली लिमिटेड, किंग एंबी सिटी डेवेलपर्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड भी इस धोखाधड़ी में शामिल थीं।
बड़ी हेराफेरी : एसएफआईओ के मुताबिक सहारा की इन नौ कंपनियों की आपस में सांठगांठ थी। जांच में सामने आया कि इन कंपनियों ने एकदूसरे में भारी निवेश किया था। 27 अक्टूबर 2020 में छह और कंपनियों को भी इसमें संलिप्त पाया गया और इनको भी जांच के दायरे में लाया गया। एसएफआईओ ने कहा कि इन नौ कंपनियों ने प्रमोटर्स/डायरेक्टर्स और सहारा ग्रुप की दूसरी कंपनियों में फंड्स का बड़ा हेरफेर किया।
एसएफआईओ ने कहा कि हाई कोर्ट ने कंपनी कानून की धारा 212 (3) के तरह जांच पर रोक लगाई है जो गलत है। इस धारा के तहत जांच तीन महीने में पूरी होनी चाहिए। एसएफआईओ ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के एक फैसले का हवाला दिया और कहा कि मंत्रालय ने इस जांच की समयसीमा बढ़ाकर 31 मार्च, 2022 कर दी है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह दस्तावेजों को देखेंगे और उसके बाद सुनवाई की डेट देंगे।

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