SIR-‘वोट चोरी’ पर लड़ाई और गरमाई, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव ला सकता है विपक्ष

विपक्षी दलों, विशेष रूप से INDIA गठबंधन, ने “वोट चोरी” और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष ने दावा किया है कि 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाता सूचियों में हेरफेर और फर्जी वोटिंग हुई। उदाहरण के तौर पर, गांधी ने कर्नाटक के बेंगलुरु मध्य लोकसभा सीट के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में 1,00,250 से अधिक फर्जी वोटों की बात कही, जबकि यह सीट भाजपा ने केवल 32,707 मतों के अंतर से जीती थी।
विपक्ष ने SIR प्रक्रिया को “वोट चोरी” का हिस्सा बताते हुए इसे मतदाता सूची से योग्य मतदाताओं को हटाने का प्रयास करार दिया है। इसके विरोध में 11 अगस्त 2025 को विपक्षी सांसदों ने संसद भवन से चुनाव आयोग कार्यालय तक मार्च निकाला, जिसमें राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव और अन्य नेता शामिल थे।
हाल के घटनाक्रम में, विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, INDIA गठबंधन के साथ-साथ बीजू जनता दल (BJD), भारत राष्ट्र समिति (BRS), और YSR कांग्रेस पार्टी जैसे गैर-गठबंधन दलों का समर्थन भी इस प्रस्ताव के लिए मांगा जा सकता है। यह प्रस्ताव संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है, क्योंकि मानसून सत्र 21 अगस्त 2025 को समाप्त हो रहा है।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए 17 अगस्त 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह निष्पक्षता से काम कर रहा है और “वोट चोरी” के दावे निराधार हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी से या तो शपथपत्र देकर अपने दावों को साबित करने या माफी मांगने की मांग की। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना और केवल अपात्र मतदाताओं को हटाना है।
हालांकि, विपक्ष ने इसे संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का मुद्दा बनाया है। कांग्रेस ने “वोट चोरी” के खिलाफ जन अभियान शुरू किया, जिसमें एक वीडियो जारी कर चुनाव आयोग को “इलेक्शन चोरी आयोग” करार दिया गया और लोगों से इस मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की गई।
महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान में विपक्ष के पास नहीं है। इसलिए, इस प्रस्ताव का प्रतीकात्मक महत्व अधिक हो सकता है। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है, जहां आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची से किसी का नाम बिना नोटिस और सुनवाई के नहीं हटाया जाएगा।
यह मुद्दा अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर गरमाता जा रहा है, जिसमें विपक्ष संवैधानिक संस्थानों की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपनी प्रक्रियाओं को पारदर्शी और कानूनी बता रहा है।

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