भाई-भतीजे के चक्कर में राजनीतिक हाशिये पर पहुंचे शिवपाल यादव! 

चरण सिंह राजपूत 

शिवपाल सिंह यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाकर फिर से अच्छा खासा वजूद हासिल कर लिया था। उनकी पार्टी को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहमियत भी मिलने लगी थी।  उनके प्रवक्ताओं को टीवी चैनल डीबेट में भी बुलाने लगे थे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में शिवपाल यादव को एक कद्दावर नेता के रूप में देखा जा रहा था। शिवपाल यादव को क्या सूझा कि निकल पड़े भतीजे को फिर से मुख्यमंत्री बनवाने के लिए। भतीजे ने क्या किया सीटें मांगी थे 65 और दी मात्र एक। वह भी शिवपाल यादव की परंपरागत जसवंतनगर । अब शिवपाल यादव जसवंतनगर सीट से अखिलेश यादव के साथ प्रतियोगिता बता रहे हैं। उनका दर्द है कि जिस पार्टी में अधिकतर सीटें उनकी सहमति पर दी जाती थी उस पार्टी में उन्हें एक ही सीट मिली है। शिवपाल यादव चाहते हैं कि जसवंत नगर से उनकी इतनी बड़ी जीत हो कि करहल से अखिलेश यादव की जीत फीकी पद जाये। वह चाहते हैं कि लोग अभी भी उन्हें अखिलेश यादव से बड़ा नेता मानें।

दरअसल शिवपाल यादव का कार्यकर्ताओं से बातचीत का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह सिर्फ एक सीट मिलने को लेकर अपना दर्द बयां कर रहे हैं। जसवंतनगर में एक होटल में कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने मन की बात बताई और यहां तक कहा कि पार्टी कुर्बना करके उन्हें क्या मिला? उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि आप तो देख ही रहे हैं कि मैंने पार्टी का बलिदान कर दिया। नहीं तो प्रसपा अपने दम पर पूरे प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी थी। 100 सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा भी हो गई थी। मगर, भाजपा को हराने के लिए गठबंधन स्वीकार किया।
शिवपाल यादव ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि अखिलेश से शुरू में 65 सीटें मांगीं, तो कहा गया कि ये ज्यादा हैं। फिर उन्होंने 45 सीटें मांगी, मगर तब भी कहा गया कि ज्यादा है। उन्होंने कहा है कि आखिर में 35 सीटों का प्रस्ताव दिया। मगर उन्हें एक ही सीट मिली है। शिवपाल यादव एक सीट पर इतनी बड़ी जीत हासिल करना चाहते हैं कि उनका कद राजनीति फिर से बढ़ जाये। शिवपाल यादव कम से कम 50 सीट चाहते  थे और अपने चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ना चाहते थे।  प्रसपा ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर तो लिया, लेकिन अंदरखाने बताया जा रहा है कि वे इससे संतुष्ट नहीं हैं। वे अपने बेटे को भी चुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन उसे भी टिकट नहीं मिला।”

दरअसल शिवपाल यादव अपने बड़े भाई और सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का सम्मान करते करते पहुंचे हैं। इसमें दो राय नहीं कि शिवपाल यादव ने हमेशा एक छोटे भाई का कर्त्तव्य निभाया है पर मुलायम सिंह यादव ने क्या किया ?
 जिस राजनीति में इमोशनल की कहीं जगह न हो। सम्मान स्वार्थ और दबाव में किया जाता हो उस राजनीति में एक ऐसे नेता ने भाई की आज्ञा को कभी नहीं ठुकराया जिस पर समय-समय पर विभिन्न आरोप लगते रहे हैं। इस नेता के लिए भाई का आदेश और सम्मान सर्वोपरि रहा है। यहां तक खुद का राजनीतिक करियर चौपट हो गया बेटे का करियर भी दांव पर लग गया पर भाई का सम्मान नहीं गिरने दिया। यहां तक कि भतीजे के तमाम अपमानित करने के बावजूद फिर से उसे मुख्यमंत्री बनवाने के लिए निकल पड़े। अपना सम्मान, वजूद और यहां तक पार्टी तक लगा दिया।
बात हो रही है समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के अनुज और अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल सिंह यादव की। कभी पार्टी में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले शिवपाल सिंह यादव का कद उस समय घटा जब मुलायम सिंह यादव ने पुत्र मोह के चलते 2012 पार्टी के प्रचंड बहुमत आने के बाद अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत को लेकर विवाद होना स्वभाविक था जो हुआ। मुलायम सिंह यादव ने दिखावे में न केवल राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव का निष्कासन किया बल्कि अखिलेश यादव का भी। वह बात दूसरी है कि कुछ ही समय बाद यह निष्कासन वापस ले लिया गया। शिवपाल यादव के साथ मिलकर मुलायम सिंह यादव अलग पार्टी भी बनवाने निकल गये पर उनकी सहानुभूति शिवपाल यादव से ज्यादा अपने बेटे अखिलेश यादव के साथ रही। जो राजनीतिक गलियारे में गूंजा भी। अब जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन और भाजपा के बीच की टक्कर मानी जा रही है तो शिवपाल यादव फिर से अखिलेश यादव से मिले हैं। उनका कहना है कि अखिलेश यादव को फिर से मुख्यमंत्री बनवाना है। वह बात दूसरी है कि उनकी बात को कोई तवज्जो न मिलने का दर्द उन्हें है।

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