आजादी की जंग में, डॉक्टर लोहिया, उषा मेहता का सनसनीखेज धमाका

‘ए वतन मेरे वतन’ फिल्म की असली कहानी।

प्रोफेसर राजकुमार जैन
9 अगस्त 1942 को देश के सभी बड़े नेता, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, सरदार पटेल वगैरा सलाखों के पीछे कैद कर लिए गए। परंतु कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नौजवान नेता जो गिरफ्तारी से बच गए थे, उन्होंने पहले से ही तैयारी कर रखी थी कि ऐसे हालात में भूमिगत रहकर कैसे काम करना है? जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, युसूफ मेहर अली, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, श्रीपाद जोशी, कमला देवी चट्टोपाध्याय, सुचेता कृपलानी वगैरा ने गुपचुप आपस में बातचीत कर आंदोलन कैसे चलाया जाए, कार्यक्रम बनाया। और सभी भाषाओं में इस कार्यक्रम के बारे में कागज तैयार करके, पूरे देश में बटंवा दिए गए। इसमें तार तथा टेलीफोन की लाइने काटना, रेलगाड़ी की पटरिया उखाड़ना, डाक व्यवस्था को भंग करना, सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना, सेना के लिए साजो-सामान तैयार करने वाले कारखाने में हड़ताल करवाना, तथा किसान सरकार को अनाज नहीं भेज सके, इसके लिए उनका संगठन बनाना, सेना को उनकी जरूरत का सामान न पहुंच सके, इसके लिए वाहनों के आने-जाने में बाधा पैदा करना आदि शामिल थे। इतना ही नहीं ‘तोड़फोड़ की बारहखड़ी’ नामक छोटी सी किताब (पुस्तिका) पूरे देश में बांटी गई। इसमें बड़े साफ शब्दों में लिखा था कि आंदोलन करने के बावजूद भी आम लोगों को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
इसी सिलसिले में ‘कांग्रेस रेडियो’


(आजाद रेडियो) को चालू करने की योजना भी बनी।
सुभाष चंद्र बोस भेष बदलकर पहले जर्मनी फिर वहां से जापान चले गए, उन्होंने दोनों जगह के रेडियो से अंग्रेजों के खिलाफ जो भाषण दिए उससे लोगों का खून खौल उठा। उनके भाषण हमारे देश में इतने लोकप्रिय हो गए थे कि लोग नया रेडियो खरीदते हुए दुकानदार से पूछते थे, कि इस पर जर्मनी तथा जापान के रेडियो कार्यक्रम सुन सकेंगे न?
ऐसे हालात में डॉ राममनोहर लोहिया को हिंदुस्तान में ही कांग्रेस रेडियो शुरू करने का विचार आया। उन्होंने योजना बनाकर भूमिगत कांग्रेस समिति के सामने विचार करने के लिए प्रस्ताव रखा, जिसको अमली जामा देने का फैसला लिया गया।
22 वर्ष वर्षीय क्रांतिकारी विचारों की गांधीवादी उषा मेहता जो उस समय कानून की छात्रा थी। उनके पिताजी जो कि रिटायर्ड जज थे। वे नहीं चाहते थे की उनके बच्चे किसी तरह के आंदोलन में शामिल हो। उसके बावजूद उनके घर के तीन बेटों एक बेटी ने आंदोलन में भाग लेने का फैसला ले लिया। उनके बड़े भाई चंद्रकांत मेहता, जो की उस समय कॉलेज में प्रोफेसर थे, उनसे बड़े भाई जो डॉक्टर थे, तथा उषा मेहता जो अभी पढ ही रही थी।
उषा मेहता ने एक रेडियो वार्ता, तथा अपने एक लेख में उन दिनों के के हालात का बखूबी विस्तार से वर्णन किया है।
“वे भारत छोड़ो संघर्ष के यादगार दिन थे। महात्मा जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। भारत खदक रहा था। लोग पीड़ा और बलिदान के लिए तैयार थे और सरकार अत्याचार और उत्पीड़न के लिए। देशभक्ति की ललक ने जनता को सभी कल्पनीय तरीकों से सरकार को चुनौती देने के लिए प्रेरित किया। डॉक्टर लोहिया जैसे भूमिगत नेता जिन्होंने गांधी जी से 1938 की शुरुआत में ही सत्याग्रह शुरू करने का आग्रह किया था और अच्युत पटवर्धन ने क्रांति की बिखरी हुंई ताकतो को एकजुट और समन्वित करने की कोशिश की और लोगों के समझाने की कोशिश की कि महात्मा द्वारा शुरू किया आंदोलन कोई सामान्य आंदोलन नहीं था, बल्कि एक क्रांति थी वह भी पारंपरिक रूप की नहीं। यह फ्रांस या रूस की तरह अत्याचारी बहुमत के खिलाफ एक सक्रिय अल्पसंख्यक विद्रोह नहीं था, बल्कि सभी लोगों का सहज आक्रोश था। 1857 के महान विद्रोह के बाद पहली बार बड़ी संख्या में लोग स्वतंत्रता के मार्ग पर आगे बढ़ने के दृढ़ संकल्प के साथ बिना हथियार या गोला बारूद के ब्रिटिश राज को चुनौती देने के लिए उठ खड़े हुए थे।


उषा मेहता ने लिखा है कि ” अगस्त में शुरू हुए आंदोलन में मेने तथा मेरे कुछ साथियों ने सोचा, आजादी के लिए हमें भी कुछ करना चाहिए। खबरों पर पाबंदी लगा दी गई थी। अगस्त महीने में मुंबई में आयोजित ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के एक सत्र में हमारी एक गुप्त रेडियो चलाने की दृढ़ इच्छा हो गई। क्योंकि हम ट्रांसमीटर के द्वारा प्रचार की अहमियत से वाकिफ थे। हमारी यह भी धारणा थी की एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर के माध्यम से हम विदेशी देशों तक भी पहुंच सकते हैं। हम बहुत अधिक उत्साहित थे, परंतु हमारी दिक्कत थी कि इसके लिए पैसा कहां से लाएं? हमारे कुछ रिश्तेदारों ने अपने आभूषण देने की इच्छा जताई परंतु हमे इसे स्वीकार करने में हिचक थी। हम किसी तरह संसाधनों को जुटा कर एक टेक्नीशियन दोस्त के पास गए, जो रेडियो मैकेनिक्स की क्लासेस चला रहा था। हमने उनसे एक चलता फिरता रेडियो स्टेशन तैयार करने की ख्वाहिश जाहिर की। कुछ ही दिनों में एक चलता फिरता रेडियो स्टेशन तैयार हो गया, यह लगभग 13 अगस्त तक तैयार हो गया था।
साथ ही साथ एक अन्य समूह जिसका नेतृत्व विट्ठल भाई झवेरी द्वारा किया जा रहा था, ट्रांसमीटर चलाने का प्रयास कर रहा था। इन दोनों के अलावा कई अन्य समूह भी इस दिशा में प्रयास कर रहे थे।
डॉ राममनोहर लोहिया जिन्हे इन सभी समूहों का पता था। उन्होंने उन सभी ग्रुपों को समन्वित करने का प्रयास किया।
एक अच्छी सुबह, मेरे चाचा अजीत देसाई ने एक नोट डॉ लोहिया के नाम से बाबू भाई और और मुझे दिया। नोट इस प्रकार था, “मैं आपको व्यक्ति रूप से नहीं जानता, लेकिन मैं आपके साहस और उत्साह की सराहना करता हूं। महात्मा गांधी द्वारा प्रज्वलित की गई अग्नि में अपना योगदान देने कीआपकी इच्छा की कद्र करता हूं। मैं, आपसे, अपनी सुविधाअनुसार मेरे से मिलने का अनुरोध करता हूं।”
यह मुलाकात 17 अगस्त की शाम को हुई। बाबू भाई और विट्ठल भाई तथा मैं, मुलाकात में मौजूद थे। हम एक दूसरे को नहीं जानते थे, नाही हम व्यक्तिगत रूप से डॉक्टर लोहिया से परिचित थे। फिर भी हम सभी तुरंत एक साथ एक समूह के रूप में काम करने के लिए सहमत हो गए। और हमारी पहली रेडियो घोषणा 14 अगस्त 1942 को शुरू हो गई। घोषणा में कहा गया
“‘यह कांग्रेस रेडियो है,भारत के किसी कोने से 42.34 मीटर के द्वारा कॉल किया जा रहा है।” यह घोषणा हम सभी के लिए दीर्घकालीन सपना पूर्ण होने जैसा था।

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