तिब्बत की आजादी के सवाल पर दुनिया के स्वतंत्रता के पक्षधरों को आगे आना होगा : अजय खरे
रीवा । भारत तिब्बत मैत्री संघ, नारी चेतना मंच के संयुक्त तत्वावधान में तिब्बती आध्यात्मिक नेता नोबेल पुरस्कार विजेता परम पावन दलाई लामा की 91 वीं जन्म वर्षगांठ के अवसर पर तुलसी नगर वार्ड नंबर 10 के मंदिर सभाकक्ष में सोमवार 6 जुलाई को उनके दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन के लिए अपराह्न 3 बजे प्रार्थना की गई। कार्यक्रम का संचालन डॉ श्रद्धा सिंह ने किया।
इस अवसर रखी गई संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए रीवा विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त सहायक कुल सचिव दल प्रताप सिंह तिवारी ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शांति सद्भाव के मार्ग पर चलने वाले दलाई लामा आज विश्व शांति के अग्रदूत हैं। बीसवीं सदी में जब दुनिया के अधिकांश देश आजाद हो गए तब साम्राज्यवादी चीन के द्वारा आजाद तिब्बत को गुलाम बना लिया जाना बहुत अप्रिय और बर्बरता पूर्ण क़दम था। तिब्बत के लोगों को भी दूसरे देशों की तरह आजाद होना बहुत जरूरी है
संगोष्ठी को प्रमुख रूप से संबोधित करते हुए भारत तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि हम सभी चाहते हैं कि परम पावन दलाई लामा जी के जीवन काल में तिब्बत को आजादी मिले। तिब्बत शीघ्र से शीघ्र आजाद हो और हजारों तिब्बतियों की स्वदेश वापसी सुनिश्चित हो सके। तिब्बतियों के लिए उनका दूसरा घर भारत है। तिब्बत की आजादी के सवाल पर सभी की चिंता जरूरी और स्वाभाविक है। पूरी दुनिया के स्वतंत्रता के पक्षधरों के लिए तिब्बत की आजादी का प्रश्न एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस सवाल पर सभी को आगे आना होगा। तिब्बत के गुलाम होने के बाद भारत की उत्तरी सीमाओं पर चीन की दखलंदाजी बढ़ती जा रही है जिसके चलते पूरा हिमालय क्षेत्र असुरक्षित और अशांत हो गया है। दुनिया की छत पर निवास करने वाले तिब्बतियों को भी खुली हवा में सांस लेने आजादी की जरूरत है। भारत की सुरक्षा के दृष्टि से भी तिब्बत की आजादी का सवाल काफी महत्वपूर्ण है। भारत की सुरक्षा और तिब्बत की आजादी परस्पर पूरक है। वर्तमान दौर में तिब्बत प्रश्न को अनदेखा करने से चीन का विस्तार वादी रवैया काफी खतरनाक बन गया है। चीन कभी भारत का पड़ोसी देश नहीं था लेकिन तिब्बत को हड़पने के बाद वह भारतीय सीमाओं के अंदर घुसपैठ करता जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार मुकुन्द मिश्रा ने कहा कि सन 1959 में तिब्बत से दलाई लामा जी के साथ आए हजारों तिब्बतियों को भारत में राजनीतिक शरण तत्कालीन नेहरू सरकार का साहसिक फैसला था। लंबे समय से तिब्बत के आजाद ना होने के कारण भारत एवं दुनिया के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में तिब्बती निर्वासित जीवन जी रहे हैं। आज तिब्बतियों की तीसरी पीढ़ी भारत में मौजूद है। तिब्बत को शीघ्र आजादी मिले ऐसी कामना है।
नारी चेतना मंच की पूर्व अध्यक्ष डॉ श्रद्धा सिंह ने कहा कि तिब्बत की आजादी का सवाल तिब्बतियों के लिए एक सपने की तरह बना हुआ है जो कब पूरा होगा अभी कुछ कहना मुश्किल है। दलाई लामा और हजारों तिब्बती लंबे समय से आजादी की आस लगाए हैं। तिब्बत की आजादी का सवाल काफी अहमियत रखता है। संपन्न कार्यक्रम में दल प्रताप सिंह तिवारी, अजय खरे मुकुन्द मिश्रा, सुखी नंद गौतम, आर एस गौतम, महेंद्र सिंह बघेल, भानमती सिंह पटेल , अशोक सोनी, गीता महंत , डॉ श्रद्धा सिंह, साक्षी मोटवानी महंत, परिवर्तन पटेल, दीपक द्विवेदी, बेला द्विवेदी, शकुंतला सिंह आदि की सक्रिय भागीदारी रही।







