संस्कृत है भारतीय संस्कृति की आत्मा : डॉ. राम चन्द्र

बिस्मिल क्रांतिकारियों के सिरमौर थे : अनिल आर्य

गाजियाबाद । केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्त्वावधान में ‘संस्कृत की ज्ञान परम्परा, अतीत, वर्तमान एवं भविष्य’ विषय पर ऑनलाइन वेबीनार आयोजित किया गया।य़ह कोरोना काल से  752वाँ वेबीनार था।इसके साथ ही अमर शहीद प. राम प्रसाद बिस्मिल के बलिदान पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

वैदिक विद्वान कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा है। विश्व भर में भारतीय संस्कृति एवं परंपरा की चर्चा होती है और इन्हें समझने के लिए संस्कृत ही सबसे बड़ा माध्यम है।भारत की ज्ञान परंपरा के मूल आधार वेद ,दर्शन, उपनिषद्, ब्राह्मण, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष हैं। इन्हें समझने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान अनिवार्य है।

डॉ रामचन्द्र ने संस्कृत की सनातन परम्परा की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि पाणिनि एवं पतंजलि को श्रेय जाता है कि उन्होंने अष्टाध्यायी एवं महाभाष्य जैसे कालजयी ग्रंथों के माध्यम से संस्कृत को वैज्ञानिक एवं अजर – अमर बना दिया। हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों को आज भी यथावत पढा जाना और उनके पूर्ण भाव को ग्रहण कर पाना किसी चमत्कार से कम नहीं है यही संस्कृत की वैज्ञानिकता है।

डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि संस्कृत का संदेश किसी काल, स्थान या सीमा में बंधा हुआ नहीं है। इसका संदेश सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के द्वारा हमने संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना की तथा ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ के माध्यम से संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में समझने की दृष्टि भी प्रदान की। ईशोपनिषद् का सन्देश है कि इस ब्रह्मांड के कण-कण  में ईश्वरीय चेतना का वास है।अथर्ववेद में कहा गया है कि यह पृथ्वी ही मेरी माँ है और मैं इसका पुत्र हूं। श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश है कि सबके कल्याण ( यज्ञ) के बाद भोजन करने वाला पुण्य प्राप्त करता है और अकेला खाने वाला पापी होता है। महाकवि कालिदास की शकुन्तला का प्रकृति एवं वन्य जीवों के प्रति अनन्य प्रेम पूरी मानवता को विलासिता से परे सात्विक एवं धर्म परायण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि आने वाला समय संस्कृत का समय है। आज भी युग के अनुकूल सैकड़ो ग्रंथ संस्कृत में लिखे जा रहे हैं। आईआईटी, आईआईएम एवं विश्वविद्यालयों में संस्कृत के विभाग खुल रहे हैं। भारत सरकार के ‘ज्ञान भारत मिशन’ के माध्यम से हजारों वर्ष पुरानी पांडुलिपियों पर गहन अनुसंधान हो रहा है। भारत में 17 संस्कृत विश्वविद्यालय हैं। विश्व के अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, पाकिस्तान सहित अनेक देशों में संस्कृत के अध्ययन की परम्परा बढ़ रही है। इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि भारतीय जनमानस गुलामी की मानसिकता को पूरी तरह से उखाड़ फेंक कर संस्कृत को हृदय से अपनायें और अपने छोटे बच्चों को भी अनिवार्य रूप से संस्कृत शिक्षण का प्रयास करें। संस्कृत तो स्वयं सिद्ध है हमारा अपना भविष्य संस्कृत के अध्ययन से ही सुरक्षित होगा Iऐसी सोच विकसित करनी चाहिए।

मुख्य अतिथि आर्य नेता अनिल अरोड़ा  विज, गवेंद्र शास्त्री व अध्यक्ष अरुण कपूर ने भी संस्कृत की उपयोगिता पर प्रकाश डाला I परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन करते हुए कहा कि प.रामप्रसाद प्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्रोत थे I प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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