उन्होंने तर्क दिया कि स्कूलों का विलय बिना सामुदायिक परामर्श के किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण, दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के बच्चों को 3-4 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक पैदल स्कूल जाना पड़ रहा है। यह बच्चों की शिक्षा तक पहुंच को मुश्किल बना रहा है और सुरक्षा जोखिम बढ़ा रहा है, खासकर व्यस्त सड़कों और राजमार्गों को पार करने में।
संजय सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी (उत्तर प्रदेश में 1.93 लाख प्राथमिक शिक्षक पद रिक्त) और बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली, पानी, और शौचालय की अनुपस्थिति के कारण छात्रों की संख्या कम हुई है, जिसे सरकार स्कूल बंद करने का आधार बना रही है। उन्होंने इस नीति को शिक्षा विरोधी करार देते हुए कहा कि सरकार बच्चों को पढ़ाने के बजाय शराब की दुकानों (27,308 नई दुकानें) को बढ़ावा दे रही है।
हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 7 जुलाई 2025 को स्कूल विलय के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिससे सरकार को यह नीति लागू करने की अनुमति मिल गई। संजय सिंह ने इस फैसले पर आश्चर्य जताया और इसे RTE का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की घोषणा की।
उन्होंने “स्कूल बचाओ अभियान” शुरू किया, जिसके तहत जौनपुर, हापुड़, अयोध्या, और लखनऊ जैसे क्षेत्रों में प्रदर्शन और पदयात्राएं कीं, जहां उन्होंने अभिभावकों और बच्चों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं। इस अभियान को सड़क से संसद तक ले जाने और सुप्रीम कोर्ट में लड़ने की बात कही गई है।
संजय सिंह ने राज्यसभा में भी नियम 267 के तहत इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की, जिसे सभापति ने संज्ञान में लिया। उनका कहना है कि यह नीति गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर रही है, और AAP इसे हर मोर्चे पर उठाएगी।








