Sahara Protest : भुगतान मामले में पीएम मोदी से मिलने की फ़िराक में सुब्रत रॉय 

15 नवम्बर को हुए राष्ट्रव्यापी आंदोलन और नोएडा के मीडिया ऑफिस पर 15 दिन के अल्टीमेटम से हिल गया है सहारा प्रबंधन 

चरण सिंह राजपूत 

इसे निवेशकों और जमाकर्ताओं के लिए थोड़ी सी राहत मिलना कहा जा सकता है कि सहारा भुगतान को लेकर चल रहा आंदोलन अपना रंग दिखाने लगा है। 15 नवम्बर को देशभर में हुए आंदोलन से सहारा का शीर्षस्थ प्रबंधन दबाव में है। सहारा प्रबंधन में सबसे अधिक बेचैनी नोएडा सहारा जोन ऑफिस पर हुए आंदोलन से है।

दरअसल सहारा नोएडा जोन जिस ऑफिस में है वह सहारा मीडिया का ऑफिस है। सहारा मीडिया का उच्च प्रबंधन यहां पर ही बैठता है। खुद सुब्रत राय के छोटे भाई जयब्रत राय भी यहां पर ही बैठते हैं। आंदोलनकारियों के 15 दिन का अल्टीमेटम देने से प्रबंधन में हड़कंप है। इस हड़कंप का बड़ा कारण यह है कि नोएडा ऑफिस पर जुटने वाले अधिकतर निवेशक और जमाकर्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे। तीन नये किसान कानूनों के मामले में जिस किसान आंदोलन केंद्र सरकार को झुकने के लिए विवश किया था उसमें अधिकतर किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे। किसान आंदोलन का चेहरा खुद राकेश टिकैत भी मुजफ्फरनगर के ही रहने वाले हैं।1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को अड़ियल माना जाता है। यही वजह है कि सहारा प्रबंधन किसी भी सूरत में नोएडा ऑफिस पर बड़ा आंदोलन होने नहीं देना चाहता है।

विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि पूरे देश में एफआईआर दर्ज होने तथा बड़े स्तर पर आंदोलन होने से सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय पूरी तरह से हिल चुके हैं। उनके सलाहकारों और सिपहसालारों ने भी उन्हें इस आफत से निपटने के लिए बड़े प्रयास करने का सुझाव दिया है। जानकारी यह भी मिली रही है कि सुब्रत राय निवेशकों के आंदोलन से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से समय मांग रहे हैं। सुब्रत राय का प्रयास है कि केंद्र सरकार की ओर भुगतान की एक समय सीमा निर्धारित कर दी जाए। क्योंकि सुब्रत राय कई बार भुगतान की डेट दे चुके हैं पर कुछ हुआ नहीं। वह तो कई बार निवेशकों का पाई-पाई चुकाने की भी बात कर चुके हैं। सेबी से पैसा मिलने की कोई उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहे है। ऐसे में सुब्रत राय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही सहारा नजर आ रहे हैं। उधर केंद्र सरकार पर भी सहारा मामले में बड़ा दबाव है। चारों ओर केंद्र सरकार पर सुब्रत राय को बचाने के आरोप लग रहे हैं। सुब्रत राय की प्रधानमंत्री से मुलाकात में कई ब्यूरोक्रेट्स और केंद्रीय मंत्रियों के लगे होने की बात सामने आ रही है। वैसे सुब्रत राय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उनसे कई बार मिल चुके हैं। सुब्रत राय के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा गृहमंत्री अमित शाह से भी अच्छे संबंध बताये जाते हैं। खुद अमित शाह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी सहारा मामले में भुगतान कराने की बात कर चुके हैं। ऐसे में सहारा भुगतान मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई बड़ी पहल कर सकते हैं।
दरअसल देश में भले ही कितनी ठगी कंपनियों के निवेशक आंदोलन कर रहे हों पर सहारा इंडिया का मामला बड़ा मामला माना जा रहा है। सहारा इंडिया पर निवेशकों का २ लाख करोड़ से ऊपर का बकाया भुगतान बताया जा रहा है। विभिन्न प्रदेशों से बीजेपी को सहारा आंदोलन की वजह से 2024 का आम चुनाव प्रभावित होने का फीडबैक मिल रहा है। मध्य प्रदेश के बीजेपी प्रवक्ता ने तो केंद्र सरकार से सहारा निवेशकों का पैसा दिलवाने और सुब्रत राय समेत दूसरे निदेशकों पर कार्रवाई करने की अपील की थी। बिहार में बीजेपी नेता सुशील मोदी भी सहारा निवेशकों का मामला उठा चुके हैं। ऐसे में वाहवाही लूटने में माहिर माने जाने वाले प्रधानमंत्री कुछ ऐसा खेल कर सकते हैं कि ऐसा कुछ हो जाए कि सहारा के खिलाफ चल रहे आंदोलन का असर बीजेपी की छवि और आम चुनाव पर न पड़े। वैसे भी नोटबंदी के बाद सहारा इंडिया का मामला थोड़ा मजबूत हुआ है। नोटबंदी में सहारा ने काफी काले धन को सफेद धन में बदल लिया है। सुब्रत राय फिर से सहारा को संवारने में लग गये हैं। नोएडा के ऑफिस पर उनके छोटे भाई जेबी राय फिर से बैठने लगे हैं। ऐसे में सुब्रत राय नहीं चाहते कि ऐसा कुछ हो कि निवेशकों का विवाद और ज्यादा बढ़े। सुब्रत राय का प्रयास है कि केंद्र सरकार कुछ ऐसी व्यवस्था करा दे कि उनको भुगतान करने के लिए कुछ समय मिल जाए। ऐसे में आंदोलन के प्रभाव को रोकने के लिए सुब्रत राय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध कर भुगतान के लिए निवेशकों से कुछ मोहलत मंगवा सकते हैं। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में ऐसी छवि बना रखी है यदि वह बोल दें कि सहारा भुगतान के लिए निवेशक और जमाकर्ता सहारा को कुछ समय दे दें तो अधिकतर आंदोलनकारी उनकी बात मान सकते हैं। वैसे मोदी भी अपने पहले कार्यकाल में सहारा इंडिया को चिटफंड कंपनी बताकर भुगतान का मामला उठा चुके हैं।
दरअसल ऑल इंडिया जन आंदोलन संघर्ष न्याय मोर्चा अभय देव शुक्ल की अगुआई में सहारा  इंडिया से अपना पैसा लेने को देशभर में बड़े स्तर पर आंदोलन छेड़े हुए है। देशभर में जहां सहारा के खिलाफ लीगल लड़ाई लड़ी जा रही है वहीं निवेशक और जमाकर्ता सड़कों पर भी उतरे हुए हैं। चाहे उत्तर प्रदेश हो, बिहार हो, मध्य प्रदेश हो, झारखंड हो, पश्चिम बंगाल हो, दिल्ली हो, उड़ीसा हो मतलब सभी प्रदेशों में निवेशक सहारा इंडिया के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। उधर अमन श्रीवास्तव की अगुआई में बने अखिल भारतीय जन कल्याण मंच के बैनर तले भी सहारा इंडिया के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ी जा रही है। इस संगठन का विशेष फोकस बिहार और पश्चिम बंगाल पर है। उधर ठगी पीड़ित जमाकर्ता परिवार के संयोजक मदन लाल आजाद सभी ठगी कंपनियों के खिलाफ फिर से भारत यात्रा पर निकल चुके हैं। मदन लाल आजाद की टीम बड्स एक्ट के तहत निवेशकों को भुगतान कराने की लड़ाई लड़ रही है।
इसे समय की नजाकत ही कहा जाएगा कि एक समय था कि सुब्रत राय सहारा पर इस बात को लेकर नाज करते थे कि उन्होंने संस्था में एक परिवार वाला माहौल बना रखा था। उनका सहारा परिवार विश्व का विशालतम परिवार है। वह बड़े रौब के साथ कहते थे कि सहारा में कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं उठती है। उनका दावा था कि उन्होंने सहारा में इतना लोकतंत्र स्थापित कर रखा है कि हर किसी की बात सुनी जाती है इसलिए कहीं से किसी तरह से बगावत होने का मतलब ही पैदा नहीं होता है। शायद सुब्रत राय का इस बात का एहसास नहीं था कि किसी को ज्यादा दिनों तक किसी को इमोशनल ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता है। जिन निवेशकों से वह पैसा जमा कराते रहे उनका वह पैसा लौटाने की उन्होंने सोची ही नहीं। अब जब बड़े स्तर पर इन निवेशकों और जमाकर्ताओं का पैसा सहारा पर हो गया तो वह बचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगे। आज की तारीख में सुब्रत राय खुद अपनी ही चली चाल में फंस चुके हैं। अब देखना यह है कि सुब्रत राय इन परिस्थितियों में अपने को कैसे साबित कर पाते हैं।

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