Sahara Group Case : चंद्रकांता उपन्यास के तिलिस्म से भी बड़ा है सुब्रत राय का तिलिस्म 

Sahara Group Case: देश के हर तंत्र को चुनौती दे रहे Subrata Roy’s Saharashree

चरण सिंह राजपूत 

Sahara Group Case : भले ही आज की तारीख में Sahara को डूबता जहाज माना जा रहा हो, भले ही निवेशकों के पैसे न लौटाने को लेकर सहारा के चैयरमेन Subrata Roy के खिलाफ देशभर में आंदोलन चल रहा हो, भले ही सहारा ग्रुप में कमर्चारी अपने वेतन का रोना रो रहे हों, भले ही सुब्रत राय पर पैसा न देने के मामले में देशभर में एफआईआर दर्ज की जा रही हों, भले ही लोग सुब्रत राय को कानून के शिकंजे में फंसता बता रहे हों पर सुब्रत राय लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाये गए हर तंत्र को चुनौती देते हुए खुद को सही साबित करने में जुटे हैं। (Sahara Group Case) Also Read : सहारा निवेशकों का भुगतान न मिलने तक जारी रहेगी लड़ाई : दिनेश चंद्र दिवाकर 

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अब इसे Subrata Roy’s Saharashree की राजनीतिक पकड़ कहें या फिर पैसा का रुतबा कि सेबी, ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई की तो क्या पार बसाएगी सुब्रत राय हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बस में भी नहीं आ पा रहे हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो फिर गैर जमानती वारंट लेकर उत्तर प्रदेश की राजधानी में स्थित सुब्रत राय के आवास पर गैर जमानती वारंट लेकर पहुंची मध्य प्रदेश की पुलिस को बैरंग क्यों लौटना पड़ा ? कैसे सुब्रत राय 6 साल से पैरोल पर जेल से बाहर घूम रहे हैं ? भुगतान न होने से तमाम सहारा एजेंटों और कर्मचारियों के आत्महत्या करने के बावजूद, तमाम एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही है ?

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दरअसल Subrata Roy’s Saharashree का तिलिस्म चंद्रकांता के उपन्यास पर बने Chandrakanta Serial से भी बड़ा है। सुब्रत राय के अय्यार चंद्रकांता के अय्यारों से भी बड़े कारनामे करने में माहिर माने जाते हैं। दरअसल सुब्रत राय का सबसे बड़ा अय्यार उनके बाद सहारा में दो नंबर की हैसियत रखने वाले ओपी श्रीवास्तव को माना जाता है।

हालांकि आज की तारीख में सहारा समय के एडिटर इन चीफ उपेंद्र राय उनके  सबसे विश्वसनीय अय्यार माने जा रहे हैं। बताया जाता है कि सुब्रत राय के लिए वह जेल तक हो आये हैं।

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सुब्रत राय के अय्यारों की सहारा में लंबी लिस्ट रही है। पैराबैकिंग में OP Srivastava के अलावा प्रशांत वर्मा, डीके श्रीवास्तव, गोविंद तिवारी, अब्दुल दबीर जैसे कितने अय्यार रहे हैं तो मीडिया में राजीव सक्सेना, गोविंद दीक्षित, उपेंद्र राय, रणविजय सिंह, स्वतंत्र मिश्रा, विजय राय, मनोज राय और तोमर जैसे बहुत से लोग सुब्रत राय के  मुख्य अय्यार माने जाते रहे हैं। सुब्रत राय की अपनी टीम में विनीत मित्तल का बड़ा नाम रहा है।

आज सुब्रत राय ने भले ही अपनी पैसा लेकर वापस न करने की नीयत से अपनी छिछालेदार करा रखी हो पर एक समय था कि जनसत्ता जैसे धारदार अखबार से  कुमार आनंद, मनोहर नायक जैसे पत्रकार जनसत्ता छोड़कर Support Time साप्ताहिक अखबार में काम कर चुके है।

वरिष्ठ साहित्कार मंगलेश डबराल भी सहारा में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। यहां तक हिंदी के बड़े आलोचक प्रो. नामवर सिंह भी सुब्रत राय के यहां पानी भर चुके हैं। आज की तारीख में भले ही सुधीर चौधरी, चित्रा त्रिपाठी, स्वेता सिंह, सईद अंसारी की गिनती देश के बड़े एंकरों में हो रही हो पर इनका शुरुआती दौर सुब्रत राय के संरक्षण में ही बीता है।

Subrata Roy’s Saharashree की घुसपैठ ऐसी है कि शासन और प्रशासन की हर खबर सुब्रत राय के पास होती है। आज भले ही निवेशक और एजेंट दो लाख करोड़ से ऊपर के भुगतान को लेकर सहारा इंडिया सहारा इंडिया के खिलाफ सड़कों पर हों पर सुब्रत राय ने जनता के खून पसीने की कमाई को संबंध बनाने और रुतबा बढ़ाने में दोनों हाथों से लुटाया है।

आज योग गुरु बाबा राम देव भले ही देश के बड़े कारोबारी माने जा रहे हैं, टीवी पर छाये रहते हों पर हरिद्वार में पतंजलि योग पीठ की स्थापना के समय सुब्रत राय ने 100 करोड़ रुपए बाबा राम देव को दिए थे। यह सब पैसा निवेशकों का ही रहा है। इसे सहाराकर्मियों की अंधभक्ति कहें, अंध लगाव कहें या फिर सुब्रत राय का शातिराना अंदाज कि न केवल

उन्होंने कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को आर्थिक सहयोग देने के नाम पर अपने कर्मचारियों को दस साल तक ठगा बल्कि जेल से छुड़ाने के नाम पर भी उनसे बड़ी ठगी कर ली।

सुब्रत राय Sahara Parivar Magazine ( Sahara Media & Entertainment) में जो अपनी महिमामंडन कराते थे, उसके नाम पर भी भी वह कर्मचारियों से प्रतिमाह पैसे वसूलते थे। इसे बेशर्मी की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि अपने को संस्था का अभिभावक कहने वाले सुब्रत राय ने सहारा को बुलंदी पर पहुंचाने वाले कर्मचारियों, एजेंटों और निवेशकों को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया है।

आज सहारा में स्थिति यह है कि निवेशक और एजेंट तो अपने भुगतान का रोना रो रहे हैं। जहां रिटायर्ड कर्मचारियों को उनका बकाया भुगतना नहीं मिला है वहीं संस्था में काम कर रहे कर्मचारियों को वेतन  के लिए धरना देना पड़ रहा है।

अपने में ठगी के अनगिनत किस्से समेटे सुब्रत राय की सियासत के क्षेत्र में यह मजबूत पैठ ही है कि जब मोदी सरकार सब कुछ ठीक करने का दावा करती घूम रही है वहीं छह साल से पैरोल पर जेल से बाहर घूम कर अपने कर्मचारियों को ही धमका रहे सुब्रत राय पुलिस प्रशासन, सेबी, ईडी, सीबीआई, सरकार और यहां तक Judiciary को अपनी ताकत का एहसास करा रहे हैं। यह सुब्रत राय का हर तंत्र पर हावी होना ही कहा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के तमाम दावे के बावजूद सहारा की एक पैसे की संपत्ति नीलाम नहीं हो सकी है।

दरअसल सुब्रत राय ने प्री प्लानिंग कर अधिकतर संपत्ति या तो लीज पर ले रखी है या फिर अपने कर्मचारियों और अधिकारियों की समिति बनाकर उनके नाम पर ले रखी है। मतलब सहारा की फेयर सम्पति न के बराबर है। आज की तारीख में लोग प्रधानमंत्री को बातों का जादूगर कहते हैं पर यदि आप सुब्रत राय भाषण सुन लें या फिर आपकी उनसे मुलाकात हो जाए तो आप भी उनकी बातों में आये बिना नहीं रहे पाएंगे।

सुब्रत राय शायद किसी संस्था के ऐसे पहले चैयरमेन होंगे जो अधिकारियों के खिलाफ अपने कर्मचारियों को उकसाते हैं और जब कोई कमर्चारी किसी अधिकारी की शिकायत कर दे तो उसी को उसकी जांच सौंप देते थे।

सहारा देश की पहली संस्था रही है जिसमें कर्मचारियों की समस्या सुनने के लिए कर्तव्य काउंसिल की स्थापना की गई थी। चुनाव प्रक्रिया में सुधार करने वाले टीएन शेषण भी कर्तव्य काउंसिल से जुड़े रहे हैं। वह बात दूसरी है कि सुब्रत राय द्वारा बनाई गई इस कर्तव्य काउंसिल से किसी कर्मचारी को कभी कोई न्याय नहीं मिल पाया।

बल्कि उल्टे यदि किसी कर्मचारी ने कोई शिकायत किसी अधिकारी की कर भी दी तो उसको उसका नुकसान ही उठाना पड़ा। उदाहरण के तौर पर 2000 के आसपास जब सहारा प्रिंट मीडिया के ग्रुप एडिटर गोविंद दीक्षित के खिलाफ कर्त्तव्य काउंसिल बैठी तो बोरे में भरकर गोविन्द दीक्षित के खिलाफ शिकायतें गई थीं पर बाद पता चला कि उन सब शिकायतों की जांच गोविन्द दीक्षित को सौंप दी गई।

सुब्रत राय के बारे में कर्मचारियों में बड़ी गलतफहमी थी। कर्मचारी यह मानकर चलते थे कि सहारा के अधिकारियों की कारस्तानी Subrata Roy को मालूम नहीं है। इस गलतफहमी का बड़ा कारण यह था कि सुब्रत राय विभिन्न सहारा की विभिन्न मीटिंगों में अधिकारियों से ज्यादा कनिष्ठों को तवज्जो देने का दिखावा करते हैं।

हालांकि आज की तारीख में कमर्चारियों की समझ में पूरी तरह से आ गया है कि  सहारा में हर खेल के सूत्रधार खुद सुब्रत राय ही हैं। एक ओर वह निवेशकों के साथ ही अपने ही कर्मचारियों को ठगते रहे और दूसरी ओर देशभक्ति का दिखाया करते रहे। शायद सहारा देश का पहला संस्थान होगा जहां पर किसी भी कार्यक्रम के शुरू होने से पहले भारत माता की पूजा होती है।

सुब्रत राय ने Patriotism को लेकर संस्थान में इतने तामझाम कर रखे हैं कि अच्छे से अच्छा आदमी गच्चा खा जाये। एक समय था कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर सहारा की बिल्डिंगों को दुल्हन की तरह सजाया जाता था। दरअसल सहारा में राष्ट्रीय पर्वों को Bharat Parv के रूप में मनाता जाता रहा है।

यह सब सुब्रत राय की स्क्रिप्ट का एक हिस्सा रहा है। यह भी अपने आप में दिलचस्प है कि सहारा संस्थान में जब भी कभी कर्मचारियों के शोषण या फिर निवेशकों के पैसे मारने की बात आती थी तो कर्मचारी यह समझते थे कि शायद उनके चेयरमैन सुब्रत राय को गुमराह कर अधिकारी वर्ग ऐसा कर रहे हैं।  पर अब सहारा के कर्मचारी भी सुब्रत राय का दोगला चेहरा देख चुके हैं।

ये सहारा कमर्चारी और एजेंट ही हैं जो विभिन्न शहरों में सुब्रत राय के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, सुब्रत राय को चोर ठहरा रहे हैं।

कर्मचारियों और अधिकारियों पर अपनी बात थोपने वाले सुब्रत राय की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आय जब उन्हें अपने ही कमर्चारियों के जबरदस्त आक्रोश को झेलना पड़ा। वह भी आमने सामने। दरअसल जब सुब्रत राय तिहाड़ जेल में बंद थे तो 2015 में 4-5 महीने के बकाया वेतन भुगतान के लिए सहारा मीडिया में आंदोलन शुरू हो गया।

उस समय सुब्रत राय ने आंदोलन कर रहे कर्मचारियों में से 12 कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल को Tihar Jail में ही मिलने के लिए बुलाया था। उस मीटिंग में पहले तो उन्होंने धमकी देने के लहजे में प्रतिनिधिमंडल से कहा कि ‘सहारा में एक ही नेता है और वह मैं हूं’। पर जब प्रतिनिधिमंडल ने उनसे तर्कों के साथ बात की तो वह अपनी किसी बात पर न टिक सके।

दरअसल उस समय सुब्रत राय को सेबी को 500 करोड़ रुपये देने थे और सुब्रत राय के जेल छुड़ाने के लिए अपनी कर्मचारियों को भेजे गए पत्र पर साढ़े 1200 करोड़ रुपए जमा होने की बात सामने आई थी। जब इस प्रतिनिधिमंडल ने इन साढ़े 1200 रुपए का हवाला दिया तो उन्होंने बड़ी बेशर्मी के साथ किसी दूसरे मद के लिए ये पैसे जमा कराने की बात कही। मतलब सुब्रत राय ने जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से साढ़े 1200 रुपए ठग लिए।

सहारा में सुब्रत राय ने अनुशासन के नाम पर सहारा में ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि कर्मचारी किसी अधिकारी की शिकायत करते हुए भी डरते थे। यदि किसी ने कुछ बोला तो उसका दूर के किसी शहर में ट्रांसफर कर दिया जाता था। यदि किसी कर्मचारी को निकालना होता था तो उसका ट्रांसफर किसी ऐसी जगह किया जाता था, जहां पर सहारा का ऑफिस होता ही नहीं था।

दरअसल सहारा का तिलिस्म चंद्रकांता उपन्यास से कहीं कम नहीं है। ज्यों ज्यों इसकी परतें खुल रही हैं त्यों-त्यों रहस्य गहराता जा रहा है। देश में कानून को लेकर बड़ी बड़ी मिसाल दी जाती है पर बिहार में नटवरलाल के नाम से प्रसिद्ध सुब्रत राय ने देश के कानून को भी ठेंगा दिखा रखा है।

सहारा की स्थिति यह है कि कर्मचारी, एजेंट और निवेशक सभी मारे-मारे फिर रहे हैं और सहारा के कर्णधार सुब्रत राय, ओपी श्रीवास्तव, जेबी राय और स्वप्ना राय और उनके परिवार के बारे में किसी को स्पष्ट रूप से मालूम नहीं है कि ये लोग कहां हैं और क्या कर रहे हैं ? बताया जा रहा है कि सहारा के अलावा सबने अपने अपने धंधे जमा लिए हैं। ओपी श्रीवास्तव के बाबा राम देव के साथ मिलकर धंधा कर करने की बात सामने आ रही है तो जेबी राय ने अपना पानी का धंधा कर रखा है।

सुब्रत राय ने अपने बच्चों को विदेश में स्थापित कर दिया है। यह भी अपने आप में रहस्य है कि इस जानकारी के पीछे कोई मजबूत आधार नहीं है। सहारा के बारे में लोगों मन में संदेह पैदा होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सहारा ने अपनी किसी कम्पनी को कभी प्रॉफ़िट में नहीं दिखाया। तो फिर 2000 रुपए से शुरू किया गया व्यवसाय ढाई लाख करोड़ तक कैसे पहुंच गया यह अपने आप में आश्चर्य है।

यही कारण है कि सहारा में ब्यूरोक्रेटस, नेता और अभिनेताओं का पैसा लगा होने की बातें बाजार में बीच बीच में आती रही हैं।सहारा इंडिया ग्रुप और मार्केट रेग्युलेटर सेबी के बीच चल रही कानूनी लड़ाई अब जगजाहिर हो चुकी है। यह भी अपने आप में रहस्य है कि कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।

इसे लेकर बड़े कानूनी जानकारों में भारी कौतूहल है। वैसे सहारा पर आरोप तो लोग दबी जुबान में लगाते ही रहते थे पर मार्च 2014 में जब Sahara Group सरगना सुब्रत राय को सुप्रीम कोर्ट ने जेल भेजा तो लोगों का ध्यान इस ओर गया।

सुब्रत राय पर निवेशकों के पैसे नहीं लौटाने का आरोप है। सहारा ग्रुप पर Sahara India Real Estate Corporation और सहारा हाउसिंग इनवेस्ट कॉरपोरेशन नाम की दो कंपनियों के जरिए अवैध रूप से डिबेंचर जारी करने का आरोप है। यही वजह रही कि सहारा ग्रुप की इन दोनों कंपनियों की ओर से जारी किए गए पब्लिक इश्यू को सेबी ने अगस्त 2012 में ही अवैध करार दे दिया था।

6 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सहारा ग्रुप को उस समय भारी झटका दिया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने धरती का कृतिम स्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध सहारा ग्रुप की सबसे महत्वाकांक्षी हाउसिंग प्रोजेक्ट एंबी वैली को अटैच करने का आदेश दे दिया। ज्ञात हो कि मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर मौजूद एंबी वैली प्रोजेक्ट 39000 करोड़ की लग्जरी टाउनशिप है।

सुब्रत राय ने बड़ी शौक से इसे बनवाया था। यह अपने आप में दिलचस्प है कि सुब्रत राय कहते हैं कि हमें सेबी को देना नहीं बल्कि लेना है। यही वजह रही कि सहारा ने कई बार SEBI के खिलाफ आंदोलन भी किया है।

यह भी जमीनी हकीकत है कि सुप्रीम कोर्ट के तमाम दावे के बावजूद भुगतान मामले में जमीनी स्तर पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। यह भी अपने आप में रहस्य है कि सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई किसी की समझ में नहीं आ रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यह भी कोई नहीं जानता है कि किस कानून के तहत सुब्रत राय की गिरफ्तारी हुई थी।

यह अपने आप में दिलचस्प है कि एक ओर कांग्रेस पर ही सुब्रत राय को फंसाने का आरोप लगाया जाता है तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता पेशे से वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तो सुब्रत राय को जेल भेजने के आदेश पर ही सवाल खड़े कर दिए थे।

ऐसा भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट इस बात को समझ नहीं रहा है। सुप्रीम कोर्ट को पता है कि सहारा ग्रुप धड़ल्ले से अपनी मेंबर कंपनियों के बीच फंड को मूव करती है। कहा तो यहां तक जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप की दो दोषी कंपनियों- सहारा इंडिया रियल इस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्ट कॉरपोरेशन को अकेले सबक सिखाने का ही मन नहीं बनाया है बल्कि सर्वोच्च अदालत ने पूरे ग्रुप के कामकाज पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर रखा है।सहारा, सेबी और सुप्रीम कोर्ट का खेल गजब मोड़ पर पहुंच चुका है।

निवेशक, एजेंट और कर्मचारी आंदोलन पर हैं। सुब्रत राय ने अपने समर्थकों और कर्मचारियों में यह संदेश दे रहे हैं कि कोई दावेदार न होने की वजह से ग्रुप को सेबी को जमा किया गया पैसा वापस मिलने वाला है। अब कोई दिक्कत सहारा के सामने नहीं रहेगी।

उधर सुप्रीम कोर्ट के पूरे सहारा ग्रुप और उसके चतुर प्रमोटरों को उन्हीं की चाल में मात देने की रणनीति की जानकारी मिल रही है।

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रख्यात वकील कपिल सिब्बल की पैरवी पर पटना हाई कोर्ट के सुब्रत राय के खिलाफ जारी किये गैर जमानती वारंट को न केवल रद्द किया बल्कि पटना हाई कोर्ट को फटकार भी लगाई हो पर सर्वोच्च न्यायालय ने 6 फरवरी 2017 को Kapil Sibabl के उस फरियादी याचिका को भी दरकिनार कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने भी इन दोनों दोषी कंपनियों के 85 फीसदी निवेशकों को सही बताया है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट सेबी की जांच पर ज्यादा भरोसा जता रहा है, जिसमें बताया गया है कि सहारा के ज्यादातर Investor बेनामी और काल्पनिक हैं। सहारा ग्रुप भी इस बात को अब तक साबित नहीं कर पाया है कि उसने निवेशकों को बैंकिंग चैनल के जरिए ही पैसा वापस किया है।

यही वजह है कि काफी लोग सहारा को हिन्दुस्तान का स्विस बैंक बताते रहे हैं। यही वजह थी कि कपिल सिब्बल के इस तर्क कि कोई भी ऐसा बैंक या निवेशक नहीं है जो पैसे वापस करने की मांग कर रहा हो, को भी सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया था। यह इसलिए भी माना जाता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि सहारा ग्रुप मनी लांड्रिंग की भूमिका अदा कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट भी जानता है कि इस पूरे खेल के पीछे के और भी बड़े खिलाड़ी हैं जो सामने नहीं आ पा रहे हैं। शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट जैसे सर्वोच्च संस्था भी सहारा के सामने बेबस नजर आ रही है। दरअसल Supreme Court सहारा ग्रुप के उस क्लाइंट की सूची के बारे में जानना चाहता है, जिसमें विशिष्ट और ऊंचे लोगों के नाम शामिल हैं, जिसमें अमीर, मशहूर, फिल्म कलाकार, क्रिकेटरों के साथ-साथ नेता भी शामिल बताये जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह बेनामी संपत्ति के खिलाफ चोट करने की एक बड़ी रणनीति भी हो सकती है।

वैसे भी मोदी सरकार की बेनामी संपत्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की घोषणा बहुत पहले हो चुकी है। यह भी कडुवी सच्चाई है कि भले ही सुब्रत राय पैरोल पर जेल से बाहर आकर मजे लूट रहे हों पर जेल की तलवार उन पर अभी भी लटक रही है।

सहारा निवेशक भुगतान को लेकर आंदोलन तो कर ही रहे हैं। साथ में लीगल कार्रवाई भी कर रहे हैं। सेंट्रर रजिस्टार के यहां शिकायत दर्ज कराने के अलावा सुप्रीम कोर्ट में PIL भी डालने की तैयारी है। निवेशकों और एजेंटों के आंदोलन के अलावा अब सहारा में काम कर रहे कमर्चारी भी आंदोलन का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। नोएडा सहारा मीडिया में फिर से आंदोलन होने लगा है।

दरअसल Sahara India के Subrata Roy’s Saharashree का खेल यह है कि वह राजनीतिक दलों को तो चंदा देते ही हैं साथ ही मीडिया हॉउसों को भी विज्ञापन देते रहते हैं। आंदोलन की अगुआई कर निवेशकों के एक नेता ने बताया कि जब वे सहारा के खिलाफ खड़े हुए तो नोएडा में रह रहे सुब्रत राय के एक करीबी ने उनसे कहा कि सहारा ने सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी को 2019 में 1000 करोड़ रूपए चंदा दिया है।

केंद्र सरकार सहारा का साथ देगी या फिर निवेशकों का  ? शायद यही वजह है कि तमाम आंदोलनों के बावजूद, विधानसभाओं और संसद में मामला उठने के बावजूद न निवेशकों का पैसा मिल पा रहा है और न ही सुब्रत राय और उनके परिवार का कुछ बिगड़ पा रहा है।(Sahara Group Case)

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