मजदूर आंदोलन में सोशलिस्ट तहरीक की भूमिका        

तकरीबन 96 लाख मजदूरों कामगारों के संगठन ‘हिंद मजदूर सभा’ के वार्षिक अधिवेशन पर प्रकाशित स्मारिका में भारतीय मज़दूर आंदोलन के इतिहास पर प्रोफेसर राजकुमार जैन का एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख को अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हम इसे कई भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है इसका पहला भाग –

प्रोफेसर राजकुमार जैन

भाग (1)

सोशलिस्ट तहरीक में मजदूर किसान आंदोलन की अहमियत, अहम मुकाम रखती है। बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जंगे-आजादी की लड़ाई महात्मा गांधी की रहनुमाई तथा कांग्रेस पार्टी के झंडे के नीचे लड़ी गई थी। 1930 का दांडी मार्च तथा 1932 का सविनय अवज्ञा आंदोलन खत्म होने के कारण मायूसी का आलम छाया हुआ था। स्वराज पार्टी जैसी कई तंजीमें कांग्रेस को टकराहट की जगह अंग्रेजी हुकूमत से ले देकर समझौता कराने का प्रयास कर रही थी। ऐसे माहौल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना 17 मई  1934 को पटना में कांग्रेस पार्टी के अंदर ही की गई। कांग्रेस पार्टी का मकसद अंग्रेजी हुकूमत से निजात पाना था परंतु कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी आजादी के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक बदलावों से वर्ग और वर्ण के आधार पर मजदूर-किसानों पर होने वाली गैर-बराबरी, बेइंसाफी ,जुल्मो, शोषण को खत्म कर उनकी बेहतर जिंदगी के लिए, उनके हकों के लिए, सेवा शर्तों, कानूनी हिफाजत के लिए दबाव  बनवाना था।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के वक्त ही उसके गठन प्रस्ताव में लिखा गया था कि ‘केवल समाजवाद ही  शोषितों और पीड़ितों के अधिकारों की गारंटी दे सकता है। अतः जो लोग इस विचार से सहमत हैं उनके लिए यह अनिवार्य बन गया है कि वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर एक मंच पर आयें जिससे कांग्रेस को तेजी से एक समाजवादी संगठन के रूप में बदला जा सके और भारत की जनता के संघर्ष को नया रूप और नया विचार दिया जा सके’।

प्रस्ताव में कामगार और मजदूरों के लिए कहा गया कि कामगारों के आर्थिक संघर्षो में हिस्सेदारी और पार्टी के कार्यक्रम हेतु  उनके सक्रिय संगठन के लिए व्यवसायी, उद्योगो और यातायात के कामगारों का ट्रेड यूनियनों में  संगठन और जहां-जहां पहले से यूनियन है, उसमें जुड़ना तथा उनमें प्रवेश करना। सभी कामगारों को हड़ताल की आजादी,  कामगारों किसानों एवं अन्य जुझारू संगठनो, समूह की परिषदों का निर्माण,  कामगारों एवं किसानों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए सहकारी संगठनों का निर्माण और वर्तमान सहकारी संगठनों में प्रवेश। मजदूरों के संघर्षों की रहनुमाई, तथा उनकी मदद करना। इसी समय यह भी तय किया गया  कि आजादी मिलने के बाद कामगारों के लिए निम्नलिखित कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाया जाएगा।

1. न्यूनतम मजदूरी;

2. 8 घंटे का दिन;

3. बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी, दुर्घटना आदि का बीमा;

4. काम के लिए खुशनुमा स्वस्थ माहौल;

5. हड़ताल का अधिकार।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में समाजवाद के पितामह  आचार्य नरेंद्र देव ने कहा कि “भारत में श्रमिक आंदोलन शुद्ध ट्रेड यूनियन चरित्र से ऊपर उठ गया है। श्रमिक वर्गों में राजनीतिक चेतना धीरे-धीरे विकसित हो रही है। पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय श्रमिक अपने को संगठित कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि इस देश में अभी कामगार आंदोलन को लंबा रास्ता तय करना है। यह अंदरूनी  मतभेदों से क्षत-विक्षत और विभाजित है। अवसरवादी नेताओं ने इसमें  विभाजन कर दिया है, और श्रमिकों को दिग्भ्रमित कर दिया है। इस कारण श्रमिक वर्ग द्वारा की गई हड़ताल अक्सर विफल हुई है। फिर भी संगठनात्मक एकता प्राप्त करने और उसे पूर्ण बनाने का गंभीर प्रयास किया जा रहा है। कपड़ा कामगारों की मांग पूरी करवाने के लिए उनकी आम हड़ताल घोषित की गई है। अगर एकता की कोशिश सफल होती है और ठीक तरह का  नेतृत्व उपलब्ध होता है तो श्रमिक वर्ग का आंदोलन बढ़कर शीघ्र ही एक महान और शक्तिशाली बन जाएगा”.

जारी है।

‌ ‌‌
प्रोफेसर राजकुमार जैन, दिल्ली विश्वविद्यालय में 45 साल अध्ययन अध्यापन, सोशलिस्ट विचारधारा के अध्येता, लेखक, समीक्षक, दिल्ली विधानसभा के भूतपूर्व मुख्य सचेतक। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में विशेष रुचि https://raagdelhi.com/news/labour-movement-in-india-historical-perspective-by-prof-rajkumar-jain

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