वोटबैंक की राजनीति तक सिमटी आरक्षण व्यवस्था!

चरण सिंह राजपूत 

देश में आरक्षण ऐसा मुद्दा है कि जो समाज के उत्थान के लिए कम और राजनीति में ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। कभी दलित तो कभी ओबीसी बस आरक्षण के नाम पर राजनीतिक दलों को वोट चाहिए। वोटबैंक की राजनीति ने तो 10 फीसद आरक्षण सवर्णों के लिए भी करा दिया। मतलब इससे समाज का भला हो या न हो पर राजनीतिक दलों के लिए वोटबैंक की एक व्यवस्था जरूर हो जाती है। अब जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहा है तो देश के गृहमंत्री अमित शाह जाटों के आरक्षण की बात करने लगे हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश के पंचायत चुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र सिंह 27 फीसद आरक्षण देने की बात कर चुके हैं। वोटबैंक की राजनीति ने इतना बड़ा रूप ले लिया है कि प्रमोशन में भी आरक्षण की बात की जा रही है।
दरअसल आरक्षण नाम के कोढ़ ने देश को ऐसे चपेट में ले लिया है कि इस परिपाटी पर समय रहते अंकुश न लगा तो समाज जातियों में तो वैमनस्यता तो घोल देगा ही साथ ही यह व्यवस्था देश की प्रतिभा को चाट जाएगी। आरक्षण नामक इस कुप्रथा ने देश में वोटबैंक की राजनीति का रूप ले लिया है। इस व्यवस्था से देश की प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। आरक्षण को लेकर कभी जाटों का आंदोलन तो  कभी गुर्जरों का । कभी हरियाणा तो कभी गुजरात में आरक्षण के लिए आंदोलन होते ही रहे हैं।
इस व्यवस्था में योग्यता, प्रतिभा का जैसे कोई मतलब ही न रह गया हो। जहां राजनीतिक दल वोटबैंक के लिए आरक्षण की पैरवी करते रहे हैं वहीं जातीय आधार पर बने कुछ संगठन राजनीतिक चमकाने के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं। ये लोग आरक्षण की मांग कर अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की जगह पंगू बना रहे हैं। उनके मन में आरक्षण नाम की बैसाखी थमाने की बात कर रहे हैं।
देश में आरक्षण की बात की जाए तो 1949 में जातीय विषमता को दूर करने के लिए दलितों के लिए की गई आरक्षण की व्यवस्था ने वोटबैंक का ऐसा रूप लिया है कि अब यह व्यवस्था विषमता मिटाने की जगह उसे और बढ़ा रही है। यह सब आरक्षण के लिए बनाई गई प्रारूप समिति के अध्यक्ष भीम राव अम्बेडकर ने भी महसूस किया था। यही वजह थी कि उन्होंने उस समय ही स्पष्ट कर दिया था कि अनुसूचित जाति तथा जनजाति को आरक्षण का प्रावधान केवल दस वर्ष तक के लिए ही होगा। हालांकि इसी बीच डॉ. अम्बेडकर का निधन हो गया। वह राजनीति का बदलता स्वरूप ही था कि एक दशक बाद जब धारा 335 के नवीनीकरण का प्रस्ताव आया तब तक आरक्षण वोटबैंक का रूप ले चुका था, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू आरक्षण से मिल रहे कांग्रेस के फायदे को समझ चुके थे। अब मुसलमान अल्पसंख्यक व ब्रााह्मणों के साथ ही दलित भी कांग्रेस का वोटबैंक बन चुका था। इसलिए उन्होंने आरक्षण की समय सीमा आैर बढ़ा दी।
आज के दौर में भले ही समाजवादी नेता पिछड़ों के आरक्षण की राजनीति कर रहे हों पर जगजाहिर है कि 60 के दशक में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस की मुस्लिम, ब्रााह्मण व दलित वोटबैंक काट के लिए पिछड़ी जातियों का गठजोड़ बनाया था। वह आरक्षण और  जातिवाद, परिवारवाद के घोर विरोधी थे। आरक्षण समय सीमा पर निर्णय लेने का समय फिर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आया  तो उन्होंने भी अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू के पदचिह्नों पर चलते हुए अनुसूचित जाति के आरक्षण वाली धारा 335 को अम्बेडकर की राय के खिलाफ जाकर फिर बढ़ा दिया। देश में आरक्षण का कार्ड खेला जाता रहा है। 1989 में जब समाजवादियों की सरकार बनी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने पिछड़ों को रिझाने के लिए मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू कर दिया। वह बात दूसरी है कि यह पासा वीपी सिंह को उल्टा पड़ गया। आरक्षण के विरोध में लामबंद हुए सवर्ण छात्रों के आक्रोश ने ऐसा रूप लिया कि देश में बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। तब इस माहौल को भाजपा कैस करा ले गई। अब तक आरक्षण की मांग राजनीतिक दल ही करते रहे हैं अब कुछ जातीय संगठन भी आरक्षण की मांग की आड़ में अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।
हमें यह भी देखना होगा कि आज के हालात में भले ही वोटबैंक के चलते कुछ दल आरक्षण की पैरवी कर रहे हों पर आरक्षण को लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. भीम राव अम्बेडकर का मानना था कि आरक्षण एक बैसाखी है और लम्बे दौर में यह  आरक्षण का लाभ लेने वाले लोगों को पंगु बना डालेगी। आज भले ही अम्बेडकर के नाम पर कई दल राजनीति कर रहे हों पर वह बड़े तार्किक थे, यही वजह थी कि उन्होंने आरक्षण की समय सीमा तय की थी। वह नहीं चाहते थे कि देश में किसी भी तरह की विषमता पनपे, पर वह वोटबैंक की राजनीति ही थी कि नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस पार्टी ने अम्बेडकर के चिंतन को नकार कर आरक्षण को राजनीति का मुद्दा बना दिया। यह राजनीति का बदला हुआ रूप ही है कि महात्मा गांधी ने जिस आरक्षण को दलित कल्याणकारी योजना बनाया था, आजकल नेता इस पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। देश में अयोग्यता को बढ़ावा दे रहे हैं।
आज के परिवेश में हम आरक्षण पर वैज्ञानिक तथा समाजशास्त्रीय विश्लेषण करें तो पूरा दृश्य समाने आ जाता है। दरअसल आजादी मिलने के बाद देश में ऐसा महसूस किया गया कि दलितों के साथ हुए अत्याचारों और अन्याय को रोका जाए। उस समय लोकशाही के लिए जरूरी था कि यह विषम स्थिति किसी भी तरह से खत्म की जाए और सभी जातियों की विकास करने के लिए समान अवसर प्रदान किए जाएं। यही सब कारण थे कि गणतीय संविधान में धारा 335 को सम्मिलित किया गया पर क्या पता था कि समानता के सोशलिस्ट प्रयास में ही विषमता का बीज छिपा हुआ था। आज स्थिति यह है जहां गरीब दलित आज भी आरक्षण का कोई खास फायदा नहीं उठा पा रहे हैं वहीं काफी सम्पन्न दलित परिवार आरक्षण का लाभ पाकर सर्वशक्ति मान हो गए हैं। इसके विपरीत सवर्णांे में बड़े स्तर पर लोग आर्थिक कमजोर होेते जा रहे हैं।ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या गरीब दलितों व पिछड़ों में ही हैं, सवर्णों में नहीं हैं क्या ? या क्या व्यवस्था से दलित, पिछड़ों व सवर्ण युवाओं में द्वेष भावना नहीं पनप रही है ? हमें यह भी देखना होगा कि आरक्षण के चलते अनुसूचित जातियों में सम्पन्नता तो आ गई पर उनमें पारस्पिरिक सामूहिक सामजस्य नहीं आ पाया है। जैसे मोची आज भी पासवान अथवा खटीक जाति के लोगों से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखता है।  दलित समाज आज भी अनेक उप जातियों में विभक्त है और  उनमें आपस में परस्पर है। आरक्षण की पैरवी करने वाले नेताओं को यह देखना चाहिए कि इतने वर्षों बाद भी धारा 335 समतामूलक समाज बनाने में कारगर क्यों नहीं हुई ? आज भी आरक्षण का फायदा संपन्न दलित व पिछड़े ही उठा रहे हैं। जरूरतमंद लोग तो आज भी आरक्षण से वंचित रह जा रहे हैं।
हमें यह भी देखना होगा कि आजादी के बाद से ही मुस्लिमों को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही कांग्रेस ने उनके लिए कितने आरक्षण की व्यवस्था की। इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस ने समय-समय आरक्षण का लॉलीपॉप दिखाकर मुस्लिमों का वोट हथियाया है, पर देने के नाम पर मात्र झुनझुना ही थमाया है।मुजफ्फरनगर दंगों के बाद गड़बड़ाए समीकरणों को कैस कराने के लिए कांग्रेस को केंद्रीय सेवाओं में भी जाटों आरक्षण देने की चिंता तो होने लगी थी पर मुस्लिमों को आरक्षण देने के उसके वादे का क्या हुआ ? जाटों को तो कई प्रदेश की नौकरियों में भी आरक्षण मिला हुआ है। यह देश की विडम्बना ही है कि जब आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की बात आती है तो कई दल दलितों व पिछड़ों के नाम पर सियासत करने लगते हैं। पिछले दशकों में आरक्षण के चलते कई जातियां विपन्न, असहाय और दरिद्र हो गई हैं। वैसे होना यह चाहिए कि यदि आरक्षण देना है हर जाति की दयनीय आर्थिक दशा पर भी विचार हो और उनकी मदद की जाए, जहां चयन की बात आए वहां मापदंड योग्यता ही होनी चाहिए, जबकि आरक्षण के चलते योग्य युवा पिछड़े जाते हैं और अयोग्यों को आगे बढ़ने का मौका मिल जाता है। क्या इससे व्यवस्था पर असर नहीं पड़ता ? क्या विकास प्रभावित नहीं होता ? देश में व्यवस्था ऐसी हो कि आकृष्ट बहुलतावादी समाज को सशक्त बनाया जाए न कि जातिगत, विषमता को भरमाया जाए। यह राजनीतिक का गंदा रूप ही है कि जातिवादी प्रकृति का यह विकृत और भोंडा स्वरूप हमारे इतिहास और संविधान की विभूतियों को भी उनके जातीय उपमान से पहचाना जा रहा है। जैसे महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया को बनिया, सरदार बल्लभ भाई पटेल को कुर्मी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और लोकनायक जयप्रकाश नारायण व राजेंद्र बाबू को कायस्थ, राजनारायण, चंद्रशेखर, वीपी सिंह को ठाकुर, चौधरी चरण सिंह जाट व भीम राव अंबेडकर को दलित नेता की संज्ञा दे दी गई है।

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