देश में जहाँ जहाँ भी अंगिका भाषी हैं उन तक रामावतार राही की कविता आज भी बनी हुई हैं जीवंत : पारस कुंज

द्वितीय पुण्य-स्मृति पर शब्दयात्रा ने किया ऑनलाइन भावांजलि कार्यक्रम

नेपाली शहादत-भूमि भागलपुर सिटी बिहार । शुक्रवार २३ मई २०२५ के पूर्वाह्न स्थानीय जयप्रभा पथ अवस्थित सीता निकेत में शब्दयात्रा भागलपुर द्वारा हास्य-व्यंग्य कवि रामावतार राही की द्वितीय पुण्य-स्मृति-पर्व पर ऑनलाइन भावांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें कोलकाता, गुवाहाटी,‌‌ पाकुड़, पटना,‌ पूर्णियाँ, बाँका, गनगनियां, अजगैबीनाथ धाम सहित भागलपुर के विद्वान साहित्यकारों ने अपने शब्दों की अंजलि उन्हें प्रदान की ।

अध्यक्षता करते हुए शब्दयात्रा के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार कवि लघुकथाकार श्री पारस कुंज ने कहा – ‘रामावतार राही अंत:हृदय से कवि थे, सहज भाषा में कविताओं का सृजन करना उनकी मौलिकता थी । सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में जहाँ जहाँ भी अंगिका भाषी हैं उन तक, उनके मस्तिष्क में आज भी इनकी कविता जीवंत बनी हुई हैं !’

इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कृष्ण भक्ति के मर्मज्ञ डॉ तपेश्वरनाथ ने कहा – ‘राही जी अंग के जीवन थे, उन्होंने बिहार झारखंड से बाहर जाकर भी भागलपुर का सुयश बढ़ाया !’

शब्दयात्रा भागलपुर के महामंत्री कुमार भागलपुरी कहते हैं – ‘देखन मैं छोटे लगे, घाव करे गंभीर को चरितार्थ करते हुए उनकी सहज बातों में भी हास्य के पुट हुआ करते थे !’

बिहार अंगिका अकादमी के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ लखनलाल सिंह आरोही ने उन्हें – ‘हिंदी व्यंग्य को अपने तेजाबी व्यंग्य से समृद्ध कर भागलपुर की अस्मिता गौरवान्वित करने वाले आलोक स्तम्भ !’ बताया ।

पाकुड़ से कवयित्री सरिता पाण्डेय ने अपनी कविता में कहा – ‘राही हीरा जानिए, व्यंग्य मुकुट बिच भाई / अंगभूमि‌ गदगद भई, ऐसी संतति पाई !’

वरिष्ठ साहित्यकार श्री विकास पाण्डेय ने बताया – ‘मंचों पर पढ़ी गई उनकी कविताओं को लोग टेप कर, घरों में भी जाकर सपरिवार सुना करते थे !’

वरिष्ठ साहित्यकार साथी सुरेश सूर्य कहते हैं – उनकी पोस्टमार्टम पुस्तक पढ़कर पता चला कि राही जी सचमुच में एक सर्जन थे, जिन्होंने इस सड़ी गली मरी व्यवस्था का पोस्टमार्टम हास्य-व्यंग्य के तौर पर किया है !’

संत-साहित्यकार बाबा छोटेलाल दास‌ ने बताया – ‘वे हमेशा विश्वासघात के शिकार होते रहे, तभी तो उनकी कविताओं में उनके जीवन की झलकियाँ भी मिलती थी !’

पूर्व सूचना उपनिदेशक शिवशंकर सिंह पारिजात ने कहा – ‘जीवन के रोजमर्रे की घटनाओं को देखने की उनकी नजर बड़ी पैनी थी, जिसे धारदार लहजे में अपनी लेखनी में उतार देते थे !’

गुवाहाटी से दैनिक पूर्वोदय के सम्पादक रविशंकर रवि ने कहा – ‘वे हमेशा नये कवि को उत्साहित कर आगे बढ़ाते रहे । मैं आज जो कुछ भी हूँ, उसमें उनका योगदान है !’

पूर्णयाँ से कवयित्री मंजुला उपाध्याय मंजुल ने कहा – ‘उनकी हास्य-व्यंग्य रचनाएँ खूब हँसने और बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती थी !’

कोलकाता से पत्रकार दीपक सान्याल कहते हैं – ‘तंगी और परेशानियों के बावजूद वे मस्त रहा करते, कोलकाता में मेरे संग खूब घूमते और मस्ती करते थे !’

कवि मुरारी मिश्र ने उन्हें याद किया – ‘वह हास्यमेव-जयते, कहता था हम सबों को / सबको हँसाने‌ वाला,‌ खुद रोता था बेचारा !’

कोलकाता से वरिष्ठ साहित्यकार डॉ पंकज साहा ने बताया – ‘अपनी रचनाओं से लोगों को हँसाते हँसाते लोटपोट कर देने वाले राही जी जिस भी मंच पर जाते वहाँ उनकी धाक जम जाती !’

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