सियासत : तेजस्वी और कांग्रेस को परिवारवाद पर आईना दिखाने लगे मुकेश सहनी

एनडीए में वापसी की चर्चा तेज

दीपक कुमार तिवारी

पटना। विकासशील इंसान पार्टी के नायक मुकेश सहनी अपनी राजनीतिक बयानों से या फिर व्यक्तिगत संबंधों से हमेशा दो ध्रुवों की राजनीति करते रहे हैं। एक बार फिर मुकेश सहनी ने बयानों के जरिए राजनीतिक निशाना साधने की कोशिश की है। पर इस निशाने से महागठबंधन के साथी हतप्रभ हैं तो एनडीए के दलों में फिर उम्मीद की किरण जगी है। और मुकेश सहनी ने ऐसा कोई पहली बार नहीं किया है। सियासी जानकारों की मानें, तो मुकेश सहनी का आरजेडी से मोह भंग हो गया है। वो कभी भी पलटी मार सकते हैं।
वीआईपी के नायक आज परिवारवाद की राजनीति पर इशारों में जम कर बरसे। एक जनसभा को संबोधित करने के दौरान उन्होंने कहा कि वे राजनीति में भाई भतीजावाद करने नहीं आए हैं। उनकी राजनीति का उद्देश्य अपने परिवार के सदस्यों को विधायक और सांसद बनाना नहीं है। वीआईपी को सभी जातियों के लोगों का साथ मिला है। यह सच है कि वीआईपी का आधार वोट निषाद है पर उन्हें सभी जातियों के लोगों को मत मिलता है और वे चुनाव में टिकट भी उन्हे देते हैं।
बिहार की राजनीति की बात करें तो वीआईपी नेता मुकेश सहनी स्थानीय पार्टियों की तरह इधर-उधर झांकते रहे हैं। एक नजर डाले तो राज्य के लगभग प्रमुख पार्टियों का साथ निभा चुके हैं। मसलन, भाजपा के साथ राजनीति में कदम रखने वाले मुकेश सहनी जेडीयू, लोजपा के साथ कदमताल कर चुके हैं। मतलब एनडीए के अलावा महागठबंधन में उनका पहले से आना-जाना लगा रहा है।
हाल ही में वीआईपी नेता मुकेश सहनी ने अपनी डीपी बदल दी। यह डीपी बदलना एनडीए में उम्मीद जगा गया और लगा कि महागठबंधन से मोह समाप्त हो गया है। इस तरह की चर्चा इसलिए शुरू हो गई कि मुकेश सहनी ने हाल ही में अपने एक्स मीडिया में प्रोफाइल फोटो बदल कर तिरंगे की फोटो लगाई। हलचल इसलिए मची कि डीपी पर तिरंगा लगाने का अनुरोध पीएम नरेंद्र मोदी का था। मोदी की उस अपील के बाद डीपी बदलने को लेकर मुकेश सहनी एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का केंद्र बने।
एक बार नीतीश सरकार के मंत्री अशोक चौधरी जब मुकेश सहनी से मिलने गए तो राजनीतिक जगत में फिर हलचल हुई। मीडिया से बात करने पर अशोक चौधरी ने बताया कि मुकेश चौधरी मेरे मित्र हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सम्मान करते हैं। जाहिर है मुकेश सहनी भी नीतीश कुमार की तरह हमेशा दबाव की राजनीति करते हैं। सदन में संख्या बल चाहे जो हो सीएम वही रहेंगे। सरकार एनडीए की हो या महागठबंधन की। ठीक उनकी राह पर चलते भी दबाव की राजनीति बना कर रखते हैं। इस बहाने ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की राह बनाना उनकी आदत है। अभी तो बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का यह प्रारंभ काल हैं। आगे आगे देखिए होता है क्या?

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