नीतीश मौन, बीजेपी बेचैन!

 ताबड़तोड़ रणनीतियों के बीच बिहार की सियासत गरमाई

दीपक कुमार तिवारी

पटना(बिहार)। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का जादू और उनका प्रभाव अद्वितीय है। जातीय समीकरणों के दायरे से परे, नीतीश ने अपनी रणनीतियों, योजनाओं, और किस्मत के सहारे सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखी है। जहां 4% आबादी वाली जाति से आने वाले नेता के लिए यह संभव नहीं दिखता, वहीं नीतीश कुमार ने पिछले दो दशकों में मुख्यमंत्री के रूप में अपनी स्थिति को न सिर्फ कायम रखा, बल्कि इसे और मजबूत किया।

नीतीश की ताकत सिर्फ उनके जातीय समीकरण तक सीमित नहीं रही। उन्होंने महादलित, पसमांदा मुस्लिम, और महिलाओं के बीच अपनी लोकप्रियता को विस्तार दिया। सरकारी योजनाओं के माध्यम से हर तबके को लाभ पहुंचाने वाले नीतीश ने राजनीतिक समीकरण बदलने में महारत हासिल की।

नीतीश की रणनीति और बीजेपी की बेचैनी:

हाल ही में, बिहार में एनडीए के अगले सीएम को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की टिप्पणी से भाजपा में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। हालांकि, नीतीश कुमार ने इस मामले में मौन रहकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी। इसका असर भाजपा के नेताओं के बयानों में दिखा।

अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने पहले बिहार में भाजपा की सरकार बनाने की बात कही, लेकिन कुछ ही घंटों में सुर बदलते हुए नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार की बात दोहराई। यह भाजपा की रणनीतिक बेचैनी को उजागर करता है।

लालू-तेजस्वी की उम्मीदें और भाजपा का दांव:

विपक्ष में बैठी आरजेडी के लिए भी नीतीश उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 2015 और 2022 के चुनाव परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि लालू यादव और तेजस्वी यादव के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता नीतीश कुमार के बिना मुश्किल है।

भाजपा, जो केंद्र में मजबूत स्थिति में है, बिहार में अपनी जड़ें गहरी करने की कोशिश कर रही है। लेकिन, नीतीश कुमार की कुशल रणनीतियां और उनके पक्ष में खड़ी सामाजिक समीकरण भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं।

नीतीश: सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन का केंद्र

नीतीश कुमार ने अपने व्यवहार और सियासी कुशलता से सत्ता और विपक्ष दोनों को प्रभावित किया है। चाहे दलित-महादलित की राजनीति हो, महिला सशक्तिकरण की बात हो, या पसमांदा मुस्लिमों के लिए योजनाएं—नीतीश ने हर बार खुद को एक सक्षम नेता साबित किया है।

बिहार की मौजूदा राजनीति में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी विधानसभा चुनावों में नीतीश का मौन और भाजपा की बेचैनी क्या रंग लाती है।

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