झारखंड में जिसने डुबोई रघुवर दास की ‘नैया’,उस दिग्गज से नीतीश कुमार ने की मुलाकात

 मिल गया बीजेपी के खिलाफ मंत्र?

दीपक कुमार तिवारी

पटना। झारखंड में रघुवर दास को पराजित कर चर्चा में आए निर्दलीय विधायक सरयू राय ने हाल ही में बिहार के सीएम नीतीश कुमार से पटना जाकर मुलाकात की। दोनों क्लासमेट रहे हैं। कालेज जीवन में दोनों साथ भी रहे। इसलिए दोनों की मुलाकात को सामान्य ही माना जाना चाहिए। पर, बदले सियासी हालात में दोनों की मुलाकात को सिर्फ दोस्ती तक सीमित रखना भी समझदारी नहीं होगी। यह स्वाभाविक भी है कि जब दो पॉलिटिशियन मिलते हैं तो सिर्फ दोस्ती-यारी या कुशल-क्षेम तक उनकी बातें सीमित नहीं रहतीं। राजनीति की बातें भी खूब होती हैं। यह अलग बात है कि उनकी बातें सार्वजनिक नहीं बहो पाती, लेकिन अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। अनुमान लगाने के लिए सियासत की इधर-उधर बिखरी कड़ियों को जोड़ना पड़ता है। तो, हम भी आज ऐसी ही बिखरी कड़ियों को जोड़ कर मुलाकात के मायने तलाशने का प्रयास करते हैं।

मूल रूप से बिहार से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले सरयू राय ने बंटवारे के बाद झारखंड को अपनी कर्मस्थली बना ली। जाहिर है कि आरएसएस का बैकग्राउंड होने के कारण सरयू राय ने भाजपा को अपना सियासी ठिकाना बनाया। छात्र आंदोलन से जेपी मूवमेंट तक नीतीश और सरयू साथी रहे हैं। हालांकि दोनों की विचारधारा में कोई समानता नहीं रही है। नीतीश कुमार ने सियासत में समाजवाद की राह पकड़ी तो सरयू राय ने भाजपा की। झारखंड में सरयू राय जमशेदपुर पूर्वी से 2014 में भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए। रघुवर दास के नेतृत्व में बनी सरकार में उन्हें खाद्य आपूर्ति मंत्रालय की जिम्मेवारी सौंपी गई। पर, सरयू राय को कभी भी रघुवर दास के कामकाज की शैली रास नहीं आई।
दोनों में अनबन शुरू हो गई। अनबन इस हद तक बढ़ी कि सरयू राय ने कैबिनेट की शुरआती कुछ बैठकों में शामिल हने के बाद जाना ही बंद कर दिया। सरकार के कार्यकाल पूरा करने तक रघुवर दास से सरयू का रिश्ता ऐसा ही रहा। रघुवर दास को नीचा दिखाने या गलत साबित करने का कोई भी मौका सरयू राय गंवाते नहीं थे। सार्वजनिक तौर पर वे अपनी सरकार की नीतियों की आलोचना करने से भी बाज नहीं आते थे।

राजनीतिक दुश्मनी व्यक्तिगत अदावत में बदलने लगी। दोनों एक दूसरे से बदला साधने की फिरका में रहने लगे। 2019 आते-आते दोनों के बीच की तनातनी इस कदर बढ़ गई कि सरयू राय को रघुवर के इशारे पर भाजपा ने टिकट ही नहीं दिया।दोनों के बीच शीत युद्ध असली अदावत में बदल गई। सरयू राय ने अपना चुनाव क्षेत्र बदल लिया। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में रघुवर दास के निर्वाचन क्षेत्र से ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।

निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उन्होंने रघुवर के निर्वाचन क्षेत्र जमशेदपुर पूर्वी से नामांकन भी कर दिया। रघुवर इस मुगालते में थे कि सीएम के रूप में उनकी ख्याति है। पहले बारी मतों से वे जमशेदपुर पूर्वी क्षेत्र से 2014 में जीत चुके हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का भी उन्हें वरदहस्त प्राप्त है। इसलिए जीत तो पक्की ही होगी। पाशा पलट गया।
रघुवर दास को सरयू राय ने पराजित कर दिया। रघुवर तो हारे ही, भाजपा की भी झारखंड में दुर्गति हो गई। पांच साल सत्ता में रही भाजपा अगली बार इतनी पीछे छूट गई कि जोड़-तोड़ से भी सरकार बना पाना उनके लिए संभव नहीं था।

रघुवर दास अभी ओड़िशा के राज्यपाल हैं। उनके राज्यपाल रहते ओड़िशा में भाजपा को इस बार भारी जीत भी मिली है। विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल (बीजद) की दो दशक पुरानी सरकार को पहली बार विपक्ष में बैठना पड़ा है। भाजपा बड़ी पार्टी बन कर उभरी और उसने सरकार बना ली। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को भारी जीत मिली। इसमें रघुवर दास की कितनी या किस तरह की भूमिका रही होगी, यह तो नहीं मालूम, लेकिन इसका श्रेय बाजपा ने उन्हें ही दिया है। अब चर्चा है कि रघुवर दास की झारखंड की राजनीति में वापसी हो सकती है। भाजपा ने 2019 की हार की मुख्य वजह आदिवासी समाज का भाजपा से दूर हो जाना रही। उसके बाद डैमेज कंट्रोल के तहत बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष और अर्जुन मुंडा को आदिवासी मामलों का केंद्रीय मंत्रालय देकर आदिवासियों के करीब जाने की भाजपा ने कोशिश की। पर, इसके बावजूद भाजपा को कोई लाभ नहीं मिला।

लोकसभा चुनाव में अर्जुन मुंडा खुद हार गए तो बाबूलाल मरांडी पिछली बार जितनी सीटें भी भाजपा को दिलाने में नाकाम रहे। पहले विपक्ष के पास राजमहल और सिंहभूम की सीटें थीं तो अब विपक्ष की लोकसभा में पांच सीटें हो गई हैं। ऐसे में रघुवर से भाजपा को उम्मीद दिखाई दे रही है।
रघुवर दास झारखंड की राजनीति में वापस होंगे, यह थोड़ा अजूबा तो लगता है, पर अविश्वसनीय कतई नहीं। इसलिए कि पहले भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जब राज्यपाल का पद छोड़ कर सक्रिय राजनीति में लोगों ने वापसी की है। महाराष्ट्र में राज्यपाल रह चुके सी विद्यासागर राव भाजपा की सदस्यता लेकर सक्रिय राजनीति लौट आए थे। राम नाइक ने भी राज्यपाल पद से मुक्त होने के बाद राजनीति महाराष्ट्र में राजनीति शुरू की थी। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और केसरी नाथ त्रिपाठी ने ऐसा ही किया था। इसलिए रघुवर दास अगर सक्रिय राजनीति में वापसी करते हैं तो यह कोई नई बात नहीं होगी।

बहरहाल, नीतीश कुमार से रयू राय की मुलाकात के बारे में जो अटकलें लगाई जा रही हैं, उससे तो यही लगता है कि कोई खिचड़ी दोनों पका रहे हैं। नीतीश कुमार और सरयू राय की नजदीकी इसी बात से समझी जा सकती है कि एक को ऐडजस्ट करने के लिए जेडीयू ने झारखंड में लोकसभा की एक सीट मांगी थी। बताते हैं कि वह सीट धनबाद थी, जहां से ढुलू महतो को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बना दिया था। तब यह चर्चा आम रही कि नीतीश धनबाद सीट ही अपने लिए चाहते थे, जहां से वे सरयू राय को अपना प्रत्याशी बना सकें। पर, बात नहीं बनी। उस वक्त एनडीए में नीतीश की हैसियत भी वैसी नहीं थी कि वे इसके लिए भाजपा पर दबाव बना सकें। भाजपा को लोकसभा में बहुमत न मिलने की स्थिति में इस बार नीतीश की औकात बढ़ी है। इसलिए उम्मीद है कि उनकी बात भाजपा अनसुनी नहीं करेगी।

चर्चा है कि सरयू राय ने नीतीश से मिल कर एक रणनीति बनाई है। रणनीति यह है कि रघुवर दास की सीट रही जमशेदपुर पूर्वी नीतीश कुमार अपने कोटे में मांग लें। मांगें ही नहीं, बल्कि इसके लिए बीजेपी से जिद्द करें। फिर सरयू राय को जेडीयू प्रत्याशी घोषित कर दें। नीतीश की बात अब शायद ही भाजपा नतृत्व काट पाए। ऐसा हुआ तो रघुवर दास को अपनी सीट बदलनी पड़ेगी। ऐसे में उनका फिर 2019 वाला हस्र हो जाए तो आश्चर्य नहीं। बहरहाल, यह दोनों की मुलाकातों के लब्बोलुआब का महज अनुमान है। सच इसके इतर भी हो सकता है। पर, बिना आग के धुआं तो निकलता नहीं! कहीं न कहीं इस चर्चा का कोई तो आधार होगा ही। समय का इंतजार करना चाहिए।

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