जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन ‌ पर मेरा नज़रिया!

किसी भी इंसान की जान ‌ जब खतरे में हो तो इंसानियत का तकाजा है की सबसे पहले उसकी हिफाजत की जाए। सवाल है ‌ की क्या कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से बनी इस पार्टी का सदस्य अथवा इसका ‌ समर्थक बना जाए। मैंने अपना ‌सि़यासी सफर ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी,‌‌ डॉ राममनोहर लोहिया‌ की विचारधारा में ‌ आस्था रखते हुए अपने बाल्य काल से ही ‌ शुरुआत कर दी थी। 60 साल से अधिक हो गए सोशलिस्ट तहरीक‌ की परिधि से बाहर एक पल के लिए भी मैं कभी किसी अन्य विचारधारा अथवा पार्टी का सदस्य नहीं बना। आपातकाल के बाद विशेष परिस्थितियों में बनी जनता पार्टी जिसमें ‌ सोशलिस्ट पार्टी का भी‌ विलय हो गया था उसका सदस्य जरूर बना। सोशल मीडिया की मार्फत बनी एक अनजान पार्टी‌ का सदस्य एवं समर्थन में ‌ कदापि नहीं कर सकता। ‌ कुछ साथी तर्क देते हैं कि यह राजनीतिक पार्टी नहीं, ‌ तो फिर क्या है, पार्टी शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया। शिक्षा सुधार मोर्चा, नीट विरोधी‌ अन्याय के खिलाफ, ‌ वगैरा-वगैरा कोई अगर बैनर होता तो ‌ मुझे कोई एतराज नहीं होता। इसी तरह आप पार्टी बनी थी मेरे अधिकतर दोस्त, साथी उसके सदस्य बन गए थे, ‌ उस समय एक सैलाब आया हुआ था‌ जो साथी उसका सदस्य नहीं बन रह था‌ क्या तो उसको शक की निगाह से देखा जा रहा था,‌ अथवा मूर्ख समझा जा रहा था। परंतु में उस वक्त भी इसी मानसिकता का था‌ कि सोशलिस्ट‌‌ दायरे वाली पार्टी,‌ जो गांधी लोहिया जयप्रकाश‌ मैं यकीन रखती है उसको छोड़कर‌ किसी और पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।
जंतर मंतर पर ‌ चल रहा यह आंदोलन कितना राजनीतिक अथवा अराजनीतिक है साफ-साफ दिखाई दे रहा है। एक डेमोक्रेट होने के नाते मेरा पक्का विश्वास है की‌ लोकतांत्रिक मुल्क में हर एक को अपनी आस्था के मुताबिक पार्टी चुनने अथवा बनाने का हक है। कल कॉकरोच पार्टी के एक ‌ नुमाइंदे ‌ ‌ ने सार्वजनिक रूप से कहा‌ अगर यहां 20000 की भीड़ होती तो मैं ‌ सोनम वांगचुक जी को अनशन खत्म करने के लिए कहता अब किस मुंह से कहूं। मेरा सवाल है कि अगर 20000 की भीड़ वहां पहुंच जाती तो क्या आप अपनी पार्टी का‌ मेनिफेस्टो, पदाधिकारी, ‌ भर्ती अभियान‌ चालू नहीं कर देते? दूसरी एक और बात जो मुझे खटक रही है‌ कि प्रधानमंत्री का इस्तीफा ना मांग कर‌ एक मंत्री का इस्तीफा‌ क्यों मांगा जा रहा है? कॉकरोच जनता पार्टी के‌ प्रचार में‌ यह भी देखा जा रहा है कि जो राजनीतिक पार्टियों अथवा आदमी शामिल नहीं हो रहे,‌ है उन्हें सर्टिफिकेट बांटा जा रहा है। खास तौर से‌ राहुल गांधी के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाया जा रहा है कि वह क्यों नहीं आते। मैं राहुल गांधी की पार्टी का ना तो सदस्य हूं ना उनका समर्थक‌ परंतु सबसे पहले इस सवाल पर राहुल गांधी ने ‌ ही जद्दोजहद शुरू की थी,‌ यदा कदा यूथ कांग्रेस के लोग अभी भी उसके खिलाफ बिल्कुल बजाए रहते हैं।।
मेरे कहने का यह कदापि अर्थ नहीं कि मैं ‌‌ इस पार्टी‌ या मुहीम का विरोधी हूं,‌ परंतु में अपनी सोशलिस्ट ‌ आस्था को खत्म कर‌ अनजान लोगो के पीछे आंख मूंद कर चलूं यह भी मैं करने वाला नहीं। मैंने अपने जीवन में ऐसे अनेकों आंदोलन देखे हैं, ‌ शिक्षा के सवाल पर ‌ लोकसभा की गैलरी से नारा लगाते हुए ‌ गिरफ्तार होकर तिहाड़ ‌ जेल में‌ क्वॉरेंटाइन फांसी के कैदियों को बंद करने के सेल में बंदी रह चुका हूं। दिल्ली विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में अपनी डिग्री को फाड़ते ‌ यह नारा लगाते हुए ‌ कि डिग्री नहीं रोजगार चाहिए, बेकारों को काम दो या बेकारी का भत्ता दो‌ पर पुलिस द्वारा घसीटते हुए मुक्के मारने‌ के कारण मुंह से आ रहे खून को किसी गंदे कपड़े से मेरे मुंह में ठूस कर‌ तकरीबन ‌ अधनंगा करते हुए फोटो को हिंदुस्तान टाइम्स ने प्रकाशित किया था। दिल्ली के बाराखंबा रोड पर स्थित हिंदुस्तान के मशहूर‌ पब्लिक मॉडर्न स्कूल पर दिल्ली की‌ सोशलिस्ट पार्टी ने,‌‌ प्रदर्शन कर नारा लगाया ‘डॉक्टर लोहिया का अरमान सबको शिक्षा एक समान’, ‌ ‘राष्ट्रपति का बेटा हो या ‌ चपरासी की संतान,‌ सबको शिक्षा एक समान’। उस प्रदर्शन घेराव के कारण एक महीने की कैद हुई गर्मी के दिनों में तिहाड़ जेल के मोटे मच्छर रात भर सोने नहीं देते थे। ऐसे अनेकों उदाहरण है,‌ हम सोशलिस्टों ने शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार,‌ असमानता ‌ के विरुद्ध, ‌ ‌ हुनरमुखी‌ सस्ती शिक्षा ‌ सबको‌ समान रूप से मिल सके इसके लिए न जाने कितने बार धरने, प्रदर्शन, सत्याग्रह,‌ ‌ भूख हड़ताल की है।
नरेंद्र मोदी की सरकार से यह अपेक्षा करना कि वह ‌ अपने खिलाफ किसी नयी राजनीतिक पार्टी अथवा मोर्चे को सफल होने देगी‌‌ गलतफहमी का शिकार होना ही होगा। ‌ एक शक और बार-बार दिमाग में घूम रहा है कि जिस जंतर मंतर पर हमने अनेकों बार मोर्चे जमाए हैं,‌ वहां 5 घंटे से ज्यादा सभा प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं मिलती थी। किसी तरह का ‌ स्थायी शामियाना इस्तेमाल करने की इजाजत भी नहीं होती, ‌ लिखित में आवेदन करने पर गिनती के लोगों को धरने प्रदर्शन में शिरकत करने की इजाजत मिलती थी,‌ वहां इन नियमों में छूट क्यों दी गई, अनशनकारियों के बिगड़ते हुए स्वास्थ्य को देखकर तत्काल पुलिस दखल से उनको अस्पताल भिजवाकर उनका अनशन तुड़वा दिया जाता था इस बार सरकार का अलग रवैया क्यों हो रहा है,‌ उसकी क्या रणनीति है? समझ से परे है। ‌
मेरी पक्की राय और अपील है कि बिना एक क्षण गंवाए‌ अनशन पर बैठे सभी लोगों ‌ से ‌ अनुरोध कर भूख हड़ताल‌ समाप्त करवाकर‌ उनकी सेहत को बिगड़ने से बचाया जाए,‌ फिर जैसे भी हो संचालक अपने उद्देश्य‌‌ अपनी योजनानुसार ‌‌ आंदोलन को जारी रखें।
– राजकुमार जैन

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