कंपनियों से अधिक शोषण निजी स्कूलों में!

शिक्षकों के खाते में भेजा जाता है अधिक वेतन और मिलता है कम

कैश के रूप में वापस करना होता है आधे से भी अधिक पैसा

विभिन्न कंपनियों और स्कूलों में शोषण का शिकार हो रहे हैं अधिकतर युवा

यूनिफॉर्म, किताबें भी खरीदनी पड़ती हैं स्कूलों से

फीस लेट होने पर जलील किया जाता है बच्चों और अभिभावकों को

चरण सिंह 
एनसीआर में भड़के श्रमिकों के आंदोलन से यह तो समझ में आ गया कि कम्पनियों में जमकर शोषण और दमन का खेल चल रहा है। समझने की जरूरत यह भी है कि कंपनियों से अधिक शोषण तो निजी स्कूलों में हो रहा है। शिक्षक 5-7-8-10-12-15 हजार रुपए में नौकरी करने को मजबूर हैं। अधिकतर इंटरमीडिएट स्कूलों में वेतन कम मिलता है पर हस्ताक्षर अधिक पर कराए जाते हैं। इस खेल में शासन-प्रशासन को दिखाने के लिए शिक्षकों के खाते में ठीक ठाक वेतन डाला जाता है पर आधे से अधिक रुपए कैश के रूप में वापस ले लिए जाते हैं। यदि सरकार बड़े निजी स्कूलों की जांच कराए तो पता चल जाएगा की एनसीआर में निजी स्कूलों में कितने बड़े स्तर पर शोषण हो रहा है। शिक्षकों का और अभिभावकों दोनों का।
जानकारी मिल रही है कि अधिकतर स्कूलों में शिक्षकों के बैठने की कुर्सी भी हटा दी गई है। उन्हें खड़े होकर ही पढ़ाना होता है। इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का भी यही हाल होता है। इन बच्चों को किताब भी स्कूल से ही खरीदनी होती है। यूनिफॉर्म भी और सलेबस भी हर साल बदल दिया जाता है। फीस थोड़ी भी लेट हो जाए तो अभिभावकों और बच्चों दोनों को जलील किया जाता है। निजी स्कूल पढ़ाई सेंटर कम धंधा केंद्र ज्यादा हो गए हैं।

दरअसल नोएडा गुरुग्राम, मानेसर, फरीदाबाद और दिल्ली में वेतन और दूसरी समस्याओं को लेकर हो रहे आंदोलन को भले ही श्रमिकों की हक़ की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा हो पर यह आंदोलन युवाओं से जुड़ा है। दरअसल इस आंदोलन में श्रमिकों के साथ वे पढ़े लिखे युवा भारी तादाद में हैं जो विभिन्न कोर्स कर 10-12 की नौकरी कर रहे हैं। इन युवाओं से 10-12 घंटे तक काम लिया जाता है। चाहे स्कूलों का मामला हो या फिर कंपनियों का या फिर अन्य जगहों का। हर जगह युवाओं का शोषण हो रहा है। इन युवाओं की पढाई लिखाई पर इनके अभिभावक मोटी रकम खर्च करते हैं। कितने अभिभावक तो कर्जदार भी हो जाते हैं। जब जॉब लगने की बात आती है तो 10-12 हजार रुपए प्रति माह ही मिलता है।

मजदूरों को तो ओवरटाइम मिल भी जाता है पर इन पढ़े लिखे युवाओं से काम लिया जा रहा है उसमें ओवर टाइम भी नहीं है। नौकरी जाने के डर से इन युवाओं से काम तो 10-12 घंटे लिया जाता है। दरअसल बेरोजगारी की बढ़ती समस्या में पढ़े लिखे युवा काम पैसों में काम करने को  तैयार हो जाते हैं फिर इनका जमकर शोषण होता है। जो युवा शोषण का विरोध करते हैं उनको गेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

ये जो आंदोलन विभिन्न शहरों में भड़का है यह पीड़ा एक दो दिन की नहीं है। यह 10-12 साल का आक्रोश है। श्रमिकों का शोषण तो लम्बे समय से चला आ रहा है पर जब से केंद्र में मोदी सरकार बनी है तब से श्रमिक की कोई सुनने को तैयार नहीं। क्योंकि अधिकतर कंपनियां बीजेपी से जुड़े लोगों की है तो स्वाभाविक है कि वर्करों की कहीं नहीं सुनी जाएगी। यह लम्बे समय से चल रहा था।
कंपनियों के कर्मचारी शिकायत करते करते थक जाते थे पर उनकी कोई सुनने को तैयार नहीं था। स्थिति यहां तक पहुँच गई थी कि मीडिया में भी जमकर शोषण हो रहा था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड नहीं मिला। दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर समेत कितने अख़बारों के कर्मचारी इसलिए निकाल दिए गए क्योंकि वे मजीठिया वेज बोर्ड मांग रहे थे। जब पत्रकारों की नहीं सुनी गई तो फैक्ट्रियों में काम करने वाले बेचारे कर्मचारियों की कौन सुनता ?
दरअसल बीजेपी हिन्दू मुस्लिम में युवाओं को उलझाए रखे रही। रोजगार पर ध्यान नहीं दिया गया। यदि रोजगार मिला तो शोषण नहीं रुका। बीजेपी राज में तो यह नौबत आ गई है कि युवाओं से कम पैसों में अधिक काम लेने की प्रवृत्ति कंपनी मालिकों में पनपने लगी। कंपनी मालिक बीजेपी से सांठगांठ कर कर्मचारियों का जमकर शोषण कर रहे हैं। बड़ी से बड़ी कम्पनी में ईएल,सीएल,पीएल,एमएल को कर्मचारी भूलते जा रहे हैं। कई कंपनी तो साप्तहिक अवकाश भी देने को तैयार नहीं।
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