मोदी के सुझाव मजबूरी मान कर नहीं, नीतिगत बदलाव के रूप में स्वीकार किए जाने चाहिए

नरेन्द्र मोदी ने सोना न खरीदने, विदेश न जाने, पेट्रोल-डीजल का कम इस्तेमाल करने, खाद का इस्तेमाल कम करने, खाने के तेल का प्रयोग कम करने, मेट्रो का प्रयोग करने व घर पर रह कर ही काम करने के सुझाव देकर भारतीय समाज में एक हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक विपक्ष आरोप लगा रहा है कि यह मोदी की नीतियों की विफलता की स्वीकारोक्ति हैं तो अर्थशास्.त्री कह रहे हैं कि इन कदमों से भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। ट्रकार्बन उत्सर्जन व उसके कारण जलवायु परिवर्तन को हममें से अब अधिकांश लोग मानव जाति के अस्तित्व के लिए एक चुनौती मान रहे हैं। दुनिया के ज्यादातर देश कार्बन उत्सर्जन कम करने का और कार्बन शून्य बनने का संकल्प ले रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन बढ़ने का कारण हमारी उपभोगतावादी जीवन शैली है। यदि जीवाश्म ईंधन, जिसमें पेट्रोल-डीजल और कोयले से बनने वाली बिजली और उससे चार्ज होने वाली बैट्री भी शामिल है, से संचालित निजी वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए और सार्वजनिक वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए तो निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन कम होगा। हां, आपातकाल के लिए, बूढ़े, विक्लांग व बीमार के लिए टैक्सी की सेवा उपलब्ध रह सकती है। टैक्सी में भी पशु द्वारा खींचे जाने वाले वाहनों का प्रचलन बढ़ना चाहिए। स्वास्थ्य व पुलिस विभाग को छोड़ और अन्य सरकारी विभागों को वाहन रखने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मंत्री, जन-प्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी सब सार्वजनिक यातायात या साइकिल का इस्तेमाल कर सकते हैं।
हवाई सफर तो सबसे ज्यादा प्रदूषण उत्पन्न करता है। दुनिया की जानी मानी जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठाने वाली स्वीडन की ग्रेटा थुनबर्ग ने हवाई जहाज से यात्रा न करने का संकल्प लिया हुआ है। अतः सिर्फ विदेश यात्राएं ही नहीं देश के अंदर भी हवाई यात्राओं पर रोक लगनी चाहिए। 1000 किलोमीटर से कम की यात्रा पर तो पूर्णतया प्रतिबंध लगना चाहिए। हवाई यात्रा सिर्फ आपातकालीन परिस्थिति में ही होनी चाहिए।
अमीर व उच्च मध्यम वर्ग वातानुकूलित जीवन का आदी बन गया है जिसके बारे में प्रधान मंत्री ने कुछ नहीं कहा। वातानुकूल करने वाली मशीनें प्रदूषण का ब़ड़ा कारण हैं। देर-सबेर हमें इनका इस्तेमाल बंद करना ही होगा। रेल में मात्र एक श्रेणी के गैर-वातानुकूलित यान होने चाहिए। सिर्फ ज्यादा पैसे होने के कारण किसी की यात्रा ज्यादा आरामदायक बनाई जाए यह तो लोकतंत्र में बराबरी के सिद्धांत के भी खिलाफ है। सभी यात्रियों के लिए एक जैसी आरामदायक सुविधा होनी चाहिए। यदि यात्रियों की संख्या गाड़ी की क्षमता से ज्यादा है तो तत्काल अतिरिक्त रेलगाड़ी या यानों की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी की मदद ली जा सकती है। इंसान को पशु की तरह यात्रा नहीं करनी चाहिए।
खेती में रासायनिक खाद एवं कीटनाशक का इस्तेमाल मानव, पशु, प्रकृति के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है यह बात तो अब सभी को समझ में आ गई है। अतः इनके इस्तेमाल को तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए। जो लोग रासायनिक खाद या कीटनाशक बनाने के काम में लगे हैं उन्हें जैविक खाद या कीटनाशक बनाने अथवा प्राकृतिक खेती के काम में लग जाना चाहिए।
यदि अरुणांचल प्रदेश में आदि आदिवासियों के घर जाएं तो वहां उबला हुआ खाना ही मिलेगा जिसमें मसाले व नमक का प्रयोग भी नहीं होता। तेल की मात्रा खाने में कम ही रहे तो स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। नरेन्द्र मोदी ने सोना कम खरीदने की बात की है। असल में उन्हें कहना चाहिए था कि हम उपभोगतावादी जीवन शैली छोड़ें। शादी समारोह के मौके पर शामिल होने वाले लोगों की संख्या व खर्च पर सीमा तय की जानी चाहिए ठीक वैसे ही जैसे चुनावों के खर्च पर सीमा तय होती है। किंतु चुनावों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के खर्च पर तो सीमा होती है लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई सीमा तय नहीं है। यह तो बेईमानी है। सारे हेलिकाॅप्टरों का खर्च दल के हिस्से में डाल कर उम्मीदवार बच जाते हैं। चुनावों में भी हवाई जहाज व हेलिकाॅप्टरों के इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए।
उपभोगतावादी जीवन शैली को छोड़ने के लिए प्राकृतिक एवं मानव निर्मित संसाधनों का बड़ी समझदारी से इस्तेमाल की आवश्यकता है। इस्तेमाल कर फेंकने वाली चीजों जैसे प्लास्टिक के उत्पादन पर ही रोक लगनी चाहिए। पुर्नउपयोग एवं चक्रीय इस्तेमाल की जा सकने वाली चीजों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। निर्माण में सीमेण्ट के इस्तेमाल पर रोक लगनी वाहिए क्योंकि इसके उत्पादन में काफी प्रदूषण होता है। सीमेण्ट के बजाए स्थानीय ऐसे विकल्प ढूंढे जाने चाहिए जो प्रकृति के ज्यादा अनुकूल हों। जो काम घर से हो सकें वे घर रह कर ही करने चाहिए। कक्षाएं, बैठकें जो आॅनलाइन हो सकें वे आॅनलाइन ही होनी चाहिएं। इससे बैठकों, विद्यालयों तक आने जाने के खर्च, प्रदूषण से हमें छुटकारा मिलेगा। जहां बड़े पैमाने पर खाना बनता है वहां बरबादी भी होती है। इससे भी हम बचेंगे। इसमें सिर्फ इस बात का ध्यान रखना होगा कि जो व्यक्ति आर्थिक स्थिति के कारण बेहतर प्रौ़द्योगिकी का इस्तेमाल नहीं कर सकते उनके लिए सरकार ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि हर कोई आॅनलाइन बैठकों में अपनी पूरी भागीदारी सुनिश्चित कर सके।
अतः नरेन्द्र मोदी जो कह रहे हैं वे बातें बिल्कुल होनी चाहिएं लेकिन ऐसा मान कर नहीं कि ये तेल के तत्कालीन संकट से निपटने के लिए हैं। ये बातें हमें सोची समझी दीर्घ कालिक नीति के रूप में अपनानी चाहिए। कोरोना काल ने यह दिखा दिया है कि इनमें से बहुत सारी चीजें सम्भव हैं। येे सबक तो हमें करोना काल से ही सीख लेने चाहिए थे। किंतु हमारी उपभोगतावादी संस्कृति व सोच ने हमें वापस उन्हीं तौर तरीकों पर ला दिया जिनके हम आदी बन चुके हैं या जो बाजार के अनुकूल हैं। अब हमें बाजार व अर्थव्यवस्था पर इन निर्णयों का क्या प्रभाव पड़ेगा इस चिंता से मुक्त होकर इस लेख में वर्णित निर्णय लेने चाहिए क्योंकि बाजार तो तात्कालिक फायदे के लिए काम करता है और हमारे सामने चुनौती मानव जाति के अस्तित्व को बचाने की है। सवाल दीर्घकालिक नीतियों व अल्पकालिक फायदे के बीच चुनाव का है।

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