रिश्तों की हत्या का आधुनिक ट्रेंड : नौकरी लगते ही पतियों को छोड़ रही हैं आधुनिक औरतें

“रोज़गार मिला, रिश्ते छूटे,जिसने पढ़ाया, वही पराया हो गया”

विवाह अब त्याग और समर्पण की बजाय स्वार्थ और स्वतंत्रता की शरण में चला गया है। अनेक मामले सामने आ रहे हैं जहाँ पति ने पत्नी को पढ़ाया, नौकरी लगवाई, पर जैसे ही वह आत्मनिर्भर हुई, पति को ठुकरा दिया। यह आधुनिक सोच रिश्तों को तोड़ रही है। शिक्षा और कानून महिलाओं को अधिकार तो दे रहे हैं, पर जिम्मेदारी से दूर कर रहे हैं। सशक्तिकरण तब तक अधूरा है जब तक वह रिश्तों का सम्मान न सिखाए। समाज को अब ऐसे स्वार्थी दृष्टिकोण के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए जो परिवार को तोड़ने का कारण बन रहा है।

डॉ. प्रियंका सौरभ

एक समय था जब पति-पत्नी का रिश्ता त्याग, प्रेम और परस्पर समर्पण का प्रतीक होता था। विवाह सिर्फ सामाजिक अनुबंध नहीं, एक गहरी भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा मानी जाती थी। लेकिन आज की आधुनिकता, शिक्षा और तथाकथित “अधिकार चेतना” ने इस पवित्र रिश्ते को भी स्वार्थ की भट्ठी में झोंक दिया है। आज देश में तेजी से बढ़ते ऐसे मामलों पर चिंता ज़ाहिर हो रही है जहाँ एक पति सालों मेहनत करके, मजदूरी करके अपनी पत्नी को पढ़ाता है, उसके सपनों को पंख देता है, और जैसे ही उसकी सरकारी नौकरी लगती है — वह उसी पति से कहती है: “आप कौन जी?”

यह सवाल अकेले एक पुरुष से नहीं पूछा जा रहा, यह सवाल उस समूचे त्याग से पूछा जा रहा है, जो एक रिश्ते को निभाने में लगाया गया था। यह सवाल उस व्यवस्था पर भी है, जिसने शिक्षा को अधिकार तो दिया, मगर ज़िम्मेदारी नहीं सिखाई। यह सवाल कानून से भी है, जिसने स्त्री को संरक्षण तो दिया, पर रिश्तों को निभाने की नैतिकता सिखाने का प्रयास नहीं किया।

आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ एक और विचारधारा ने समाज में गहराई से जड़ें जमा ली हैं — “खुद को पहले रखो”, “रिश्ते बोझ हैं”, “स्वतंत्रता का अर्थ है किसी भी बंधन से मुक्त होना”। यह सोच, विशेषकर महिलाओं को यह सिखा रही है कि विवाह, पति, परिवार केवल एक सामाजिक औपचारिकता हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर त्यागा जा सकता है। और जब शिक्षा, कानून और समाज का एक वर्ग इस सोच को बढ़ावा देता है, तो परिणाम होता है — घर टूटते हैं, विश्वास बिखरता है और पुरुषों का त्याग मज़ाक बन जाता है।

एक गरीब पति जिसने ईंटें ढोकर, दिहाड़ी लगाकर अपनी पत्नी को पढ़ाया, उसका फॉर्म भरा, उसकी फीस दी, परीक्षा केंद्र तक छोड़ा, उसके चयन के बाद मिठाई बांटी — वही पति जब दरवाज़े पर खड़ा होता है तो पत्नी कहती है — “अब आपकी कोई ज़रूरत नहीं रही।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं, यह उस संघर्ष की मौत है जिसमें रिश्ते सांस लेते थे। यह आधुनिकता का वह चेहरा है, जो चमकता तो है, पर भीतर से खोखला है।

बिना किसी कारण, बिना किसी उत्पीड़न के यदि कोई पत्नी केवल नौकरी लगने के बाद पति को अस्वीकार कर दे, तो यह न सशक्तिकरण है, न स्वतंत्रता — यह एक सामाजिक अपराध है। यह उन मूल्यों की हत्या है जो भारतीय समाज की नींव हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि हम उन स्त्रियों की बात नहीं कर रहे जो वाकई उत्पीड़न झेलती हैं, शोषित होती हैं या जिन्हें बचाव की आवश्यकता है। बात उन मामलों की हो रही है जहाँ कानून और अधिकारों का दुरुपयोग करके एक पत्नी अपने पति को केवल इसलिए छोड़ देती है क्योंकि अब वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई है।

कानून ने महिलाओं को जो संरक्षण दिया है, वह आवश्यक है और होना भी चाहिए, लेकिन वह संरक्षण तभी तक पवित्र है जब तक उसका उपयोग हो, दुरुपयोग नहीं। आज समाज में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ रही है जहाँ महिलाओं ने झूठे आरोप लगाकर न केवल अपने पतियों को, बल्कि उनके परिवारों को भी जेल भिजवा दिया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और आर्थिक रूप से तबाह कर दिया। क्या यही है “नवीन भारत” का पारिवारिक चेहरा?

जब एक लड़की कहती है, “अब मैं कमाती हूं, मुझे किसी की जरूरत नहीं”, तो यह स्वतंत्रता नहीं, आत्ममुग्धता है। क्या आत्मनिर्भरता का अर्थ यह है कि रिश्तों को छोड़ दिया जाए? क्या नौकरी लगते ही प्रेम और त्याग की कीमत शून्य हो जाती है? क्यों नहीं यह समझाया जाता कि सशक्त स्त्री वह है जो अपनी उड़ान में भी अपने घोंसले को संजोकर रखे, न कि उड़ते ही उसे जला दे?

शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि सोच में परिपक्वता लाना है। दुर्भाग्यवश आज की पढ़ाई ने यह परिपक्वता नहीं दी, बल्कि कई मामलों में आत्मकेंद्रित सोच को जन्म दिया है। आत्मनिर्भरता अगर स्वार्थ में बदल जाए, तो वह समाज के लिए एक खतरा बन जाती है। पढ़ाई के बाद यदि स्त्री अपने रिश्तों से पलायन करती है, तो यह प्रश्नचिन्ह है उस शिक्षा पर, उस सोच पर, और उस कानून पर जो उसे यह करने की छूट देते हैं।

कई बार जब पत्नी पति को छोड़ती है, तब समाज चुप रहता है। महिलाएं इसे अपना अधिकार मानती हैं, और पुरुषों के पास बोलने तक की जगह नहीं होती। अगर कोई पति यह कह दे कि “मैंने उसे पढ़ाया, बढ़ाया, उसका करियर बनाया”, तो उसे कहा जाता है कि “उसने तुम्हारे ऊपर कोई एहसान नहीं किया, वह अब स्वतंत्र है।” लेकिन जब कोई स्त्री अपने पति के बलिदान से आगे बढ़ती है, तो क्या उस त्याग की कोई कीमत नहीं होती? क्या उसकी कोई भावनात्मक मान्यता नहीं?

यह मानसिकता अब अदालतों तक पहुँच चुकी है। न्यायालयों में ऐसे हजारों केस लंबित हैं जहाँ पुरुष अपने वैवाहिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, अपने बच्चों से मिलने के लिए तरस रहे हैं, और वर्षों तक एक ऐसे रिश्ते का बोझ ढो रहे हैं जो केवल कागज पर बचा है। वे न तलाक ले सकते हैं, न नया जीवन शुरू कर सकते हैं, और न ही समाज उनकी पीड़ा समझता है।

कई मामलों में तो पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ बाहर से प्रेम संबंध जोड़ लेती हैं, पति से दूरी बना लेती हैं, और फिर कानूनी सुरक्षा के पीछे छिप जाती हैं। जब ऐसे मामलों पर कोई प्रश्न उठाता है, तो उसे “महिला विरोधी”, “संकीर्ण सोच वाला” या “पितृसत्तात्मक” कहा जाता है। लेकिन क्या एक समाज को इतना भी अधिकार नहीं कि वह रिश्तों की रक्षा करने वाले पुरुष की आवाज़ को सुने?

यदि यही मानसिकता चलती रही, तो आने वाले वर्षों में विवाह संस्था ही खोखली हो जाएगी। पुरुष विवाह से डरेंगे, परिवार टूटेंगे, और समाज में अविश्वास की दीवारें खड़ी होंगी। स्त्रियों को यह समझना होगा कि वे केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को निभाने के लिए भी उत्तरदायी हैं। जब कोई पति आपकी फीस भरता है, कोचिंग लगवाता है, हौसला देता है, तब वह केवल पति नहीं, एक मार्गदर्शक, एक सहायक, एक संरक्षक बनता है। और जब आप सफलता पाकर उसे छोड़ देती हैं, तो आप सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विश्वास को ठुकरा देती हैं।

यह समाज अब और अधिक झूठे केस, दिखावटी आज़ादी और स्वार्थ की आड़ में तोड़े गए रिश्ते नहीं झेल सकता। अब वक्त आ गया है कि शिक्षा में नैतिक मूल्य जोड़ें, कानूनों में संतुलन लाएं, और समाज में यह संदेश दें कि सशक्तिकरण का अर्थ जिम्मेदारी से भागना नहीं, बल्कि उसे ईमानदारी से निभाना है।

रिश्तों में अधिकार जितने ज़रूरी हैं, उतने ही ज़रूरी हैं कर्तव्य। सच्चा सशक्तिकरण वही है जो रिश्तों को तोड़े नहीं, उन्हें और मजबूत करे। क्योंकि अगर नौकरी लगते ही कोई पत्नी अपने पति को कहे — “आप कौन?” — तो यह केवल पति की नहीं, पूरे समाज की हार है।

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