साफ होनी चाहिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दिमागी गंदगी?

कानूनी कार्रवाई का मतलब सिर्फ व्यक्तियों को दंडित करना नहीं है; इसका उद्देश्य एक मिसाल कायम करना है कि कुछ चीजें स्वीकार्य नहीं हैं, चाहे लोग उन्हें कितना भी हास्यपूर्ण बताने की कोशिश करें। यदि वे सचमुच समाज को बेहतर बनाने के बारे में चिंतित हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि सांस्कृतिक पतन से लड़ना भी बड़े अपराधों से निपटने जितना ही महत्वपूर्ण है। यदि आप सोचते हैं कि हमें ऐसे घृणित ‘मजाक’ को नजरअंदाज कर देना चाहिए और केवल ‘वास्तविक अपराधों’ पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तो आप यह समझने में विफल हैं कि समाज कैसे काम करता है। विकृत और अपमानजनक हास्य को सामान्य मानने से नैतिक सीमाएं कमजोर होती हैं और लोग अस्वीकार्य चीजों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। कॉमेडी में बिना किसी परिणाम के कुछ भी कहने की छूट नहीं है – खासकर तब जब यह बहुत ही विचलित करने वाले क्षेत्र में प्रवेश कर जाए। यदि कोई मजाक अनादर, असंवेदनशीलता या नैतिक सीमाओं को लांघने पर आधारित है, तो यह सवाल उठना उचित है कि क्या यह समाज का उत्थान करता है या पतन करता है?आलोचना का मतलब ‘घटिया मानसिकता’ रखना नहीं है; यह संस्कृति पर विषय-वस्तु के प्रभाव को पहचानने के बारे में है। यदि कॉमेडी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता तो फिर वास्तव में संवेदनशील कौन है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी सामग्री का बचाव करना केवल यह साबित करता है कि समाज में क्या स्वीकार्य है, इसके प्रति लोग कितने असंवेदनशील हो गए हैं।

प्रियंका सौरभ

कुछ लोग ह्यूमर के नाम पर समाज में गंदगी फैला रहे हैं। ऐसा कंटेट प्रसारित कर रहे हैं जो चिंता का विषय है। विवाद बढ़ने के बाद ये अश्लील इंफ्लूएंसर अपनी करतूत पर माफी मांग लेते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या इनकी शर्मनाक हरकत पर इनका माफ़ी मांग लेना काफ़ी है या बड़ा एक्शन होना चाहिये? ऐसे लगों को कानूनी तौर पर तो सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही में जनता उनके सभी चैनलों का बहिष्कार करेगी तो यह उनके लिए सबसे बड़ी सजा होगी। इन लोगों को सजा मिलनी आवश्यक है तभी बाकी इस प्रकार के मानसिक दिवालिया वाले लोग सुधार पाएंगे। ऐसे सारे कार्यक्रम, ओटीटी, टीवी, आदि पर भी हैं। सब बंद होना चाहिए। ऐसा बलग़र कंटेंट्स हमारे देश की संस्कृति को खत्म कर देगी।.यह निंदनीय है और सभ्य समाज के लिए गलत भी। ऐसे लोग हमारा सनातन धर्म और हिंद संस्कृति का बेड़ागर्क कर रहे है। इनको सजा होनी चाहिए ताकि आने वाले समय ऐसी नीच हरकत और सोच रखने वाले ऐसी हरकत करने से पहले 10 बार सोचना पड़े। इस सब प्रकार की घिनौनी मानसिकता को देखना और सुनना आज के समाज का भी कसूर है। इन जैसे लोगों का समाज से बहिष्कार करना चाहिए। गंदी भाषा वाले बहुत सारे नाटक और फ़िल्में दिखाई जाती हैं। उन्हें भी बंद कर देना चाहिए। ओटीटी पर तो बहुत ज्यादा अश्लीलता परोसी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया की ‘इंडियाज गॉट लैटेंट’ पर ‘आपत्तिजनक’ टिप्पणियों की निंदा की।

सर्वोच्च न्यायालय ने अल्लाहबादिया के शब्दों के पीछे छिपे गहरे मुद्दों को उजागर करते हुए इसे “उनके दिमाग की गंदगी” कहा। अल्लाहबादिया के शब्दों की निंदा करते हुए कहा कि उसकी भाषा से माता-पिता और बहनों को शर्म आएगी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, अल्लाहबादिया की टिप्पणियों की विकृत प्रकृति से “पूरा समाज शर्मिंदा महसूस करेगा”। यह मामला डिजिटल युग में प्रभावशाली व्यक्तियों और सामग्री निर्माताओं की जिम्मेदारी के बारे में व्यापक चर्चा को जन्म देता है। वैसे भी सार्वजनिक हस्तियों को अपनी भाषा के प्रयोग के प्रति सचेत रहना चाहिए, क्योंकि इससे सामाजिक मूल्यों पर असर पड़ता है। समाज पर ऐसे युवा प्रतीकों के प्रभाव को कम आंकना मूर्खतापूर्ण होगा, विशेषकर युवा मस्तिष्कों और स्वस्थ समाज की बुनियादी संस्कृति पर। क्या यह काफी बड़ा नहीं है? यह पूछना कि शो का कोई प्रतियोगी किस चीज के लिए कितना शुल्क लेगा, क्या इससे युवाओं की एक पूरी पीढ़ी भ्रष्ट नहीं हो जाएगी? तर्कहीन ढंग से और समाज के प्रति किसी जिम्मेदारी के बिना कही गई बातें। क्या आपके बच्चे नहीं हैं और न ही आपको उनकी परवाह है। सच तो यह है कि ‘मजाक’ के माध्यम से ऐसी अश्लीलता को सामान्य बनाना उसी मानसिकता को बढ़ावा देता है जो वास्तविक अपराधों को बढ़ावा देती है। समाज रातों-रात नहीं बिखर जाता – इसकी शुरुआत असहनीय को सहन करने, घृणित को “सिर्फ हास्य” के रूप में नजरअंदाज करने और धीरे-धीरे नैतिक सीमाओं को खत्म करने से होती है।

कानूनी कार्रवाई का मतलब सिर्फ व्यक्तियों को दंडित करना नहीं है। इसका उद्देश्य एक मिसाल कायम करना है कि कुछ चीजें स्वीकार्य नहीं हैं, चाहे लोग उन्हें कितना भी हास्यपूर्ण बताने की कोशिश करें। यदि वे सचमुच समाज को बेहतर बनाने के बारे में चिंतित हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि सांस्कृतिक पतन से लड़ना भी बड़े अपराधों से निपटने जितना ही महत्वपूर्ण है। यदि आप सोचते हैं कि हमें ऐसे घृणित ‘मजाक’ को नजरअंदाज कर देना चाहिए और केवल ‘वास्तविक अपराधों’ पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तो आप यह समझने में विफल हैं कि समाज कैसे काम करता है। विकृत और अपमानजनक हास्य को सामान्य मानने से नैतिक सीमाएं कमजोर होती हैं और लोग अस्वीकार्य चीजों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। कॉमेडी में बिना किसी परिणाम के कुछ भी कहने की छूट नहीं है। खासकर तब जब यह बहुत ही विचलित करने वाले क्षेत्र में प्रवेश कर जाए। कानून गरिमा को बनाए रखने और बुनियादी शालीनता के क्षरण को रोकने के लिए मौजूद हैं। अगर आप ‘यह सिर्फ़ एक मज़ाक है’ के नाम पर इसका बचाव कर रहे हैं, तो शायद असली मुद्दा यह है कि आप इस तरह की सामग्री के प्रभाव के प्रति कितने सुन्न हो गए हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई करना बहुत ज़रूरी है। आपका यह तर्क कि हमें ‘मजाक के बजाय वास्तविक अपराधों और समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए’ मूर्खतापूर्ण और अपरिपक्व दोनों है। हास्य में शक्ति होती है और शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है।

‘मजाक’ कहलाने वाली हर बात हानि रहित नहीं होती। कुछ हास्य हानिकारक व्यवहार को सामान्य बना देता है। यदि कोई मजाक अनादर, असंवेदनशीलता या नैतिक सीमाओं को लांघने पर आधारित है, तो यह सवाल उठना उचित है कि क्या यह समाज का उत्थान करता है या पतन करता है। आलोचना का मतलब ‘घटिया मानसिकता’ रखना नहीं है; यह संस्कृति पर विषय-वस्तु के प्रभाव को पहचानने के बारे में है। यदि कॉमेडी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता तो फिर वास्तव में संवेदनशील कौन है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी सामग्री का बचाव करना केवल यह साबित करता है कि समाज में क्या स्वीकार्य है, इसके प्रति लोग कितने असंवेदनशील हो गए हैं। स्वतंत्रता का अभिप्राय है, सही समय पर सही यानि नैतिक कार्य करने की स्वतंत्रता। इसी प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिप्राय है- उचित समय पर उचित बात कहने की स्वतंत्रता। इसके विपरीत कुछ भी, कभी भी कह देने की स्वतंत्रता, स्वतंत्रता नहीं स्वच्छंदता है। स्वच्छंदता को ही अराजकता कहा जाता है। अतः स्वतंत्रता एक कानूनी प्रक्रिया है, इसके विपरीत स्वच्छंदता गैरकानूनी है। अतः अभिव्यक्ति की कानूनी स्वतंत्रता के तहत अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता की अनुमति गैरकानूनी है। अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता को प्रश्रय, सोशल मीडिया की गुणवत्ता की जगह मात्रा को अहमियत देने की व्यवस्था ने दिया है। लोग ज्यादा व्यूज के लिए सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं।

अगर यूट्यूब, मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करे, तो ऐसे ओछे प्रयास बंद हो जायेंगे। आजकल लोग किसी भी तरह से पैसा और शोहरत हासिल करना चाहते हैं। और इस तरह की उत्तेजना पैदा करने वाली बातें युवा वर्ग को आकर्षित करती हैं। इसलिए लोग इस तरह के भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। वृक्ष की पहचान उसके फल से होती है और माता पिता की पहचान उसके संतान से होती है। इनके माता-पिता का परिचय मिल गया है। कीड़े लगा वृक्ष, कीड़े लगा फल ही देगा। यह पैसा ही वह कारण है जो इन बेगैरत शोहदों को उनके माता-पिता द्वारा खुली छूट देने देता है। इनके माता-पिता को इनकी बेशर्म अदाओं पर कोई ऐतराज इसीलिए नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें इससे अच्छा खासा पैसा मिलता है। अगर इनके माता-पिता को ऐतराज होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती।

(लेखक रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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