बिलकिस बानो, मलियाना, नरोदा, मेरठ दंगों के आरोपियों की रिहाई के मायने

लोग मानने लगे हैं कि अब अदालतों में भी न्याय मिलना मुश्किल, लोकतंत्र के चौथे.  खंबे पर सत्ता दल का हमला तो यही बताता है*

रामस्वरूप मंत्री
देश में लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप न्यायपालिका को माना जाता है लेकिन अब उस न्यायपालिका की हालत भी यह हो गई है कि वह सत्ताधारी दल की ना केवल चाटूकार बन गई है बल्कि सरकार के इशारे पर सीधे-सीधे अपराधियों को बरी करने और सजा पाए लोगों को छोड़ने का काम करती है मेरठ, मलियाना , मुजफ्फरपुर ,गुजरात के नरोदा हो या दाहोद सभी जगह के दंगों के आरोपियों को एक-एक कर छोड़ा जा रहा है ।बिलकिस बानो के सामूहिक रेप और वहां हुए दंगों के आरोपियों को भी सजा के बाद छोड़ दिया जाता है । अदालतों से अपराधियों की रिहाई के बाद इनका एक हीरो की तरह भगवा ब्रिगेड द्वारा स्वागत किया जाना भी कहीं ना कहीं न्याय प्रिय लोगों के मन में न्यायपालिका के प्रति भरोसे को डिगाता है । आखिर सामूहिक नरसंहार, सांप्रदायिक दंगों के आरोपियों को बाकायदा निर्दोष साबित करने के लिए न्यायालयों के ये फैसले क्या न्यायपालिका से लोगों का भरोसा खत्म नहीं करेगे । देश की तमाम अदालतों में चाहे वह हाई कोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट या निचली अदालतें ,इनमें पिछले दिनों जिस तरह से अपराधियों को सजा मुक्त करने का काम हुआ है ,वह न्यायपालिका से भरोसा उठा रहा है । हालांकि केंद्र की ओर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों की हरकतों से लोगों ने मान लिया है कि अब अदालतों में भी सच की सुनवाई मुश्किल है। इसलिए अब जरूरी है की जनता सड़कों पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म किए जाने की कोशिशों के खिलाफ लामबंद हो ।
1947 के बाद से देश में हज़ारों साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं जिनमें हज़ारों लोग मारे गये हैं और लाखों परिवार तबाह हुए हैं। दंगों में हुए जानोमाल के नुक्सान के ज़ख़्म तो वक़्त के साथ भरने भी लगते हैं, लेकिन इंसाफ़ न मिलने और हत्यारों व बर्बर अपराधियों को बार-बार बचा लिये जाने के ज़ख़्म कभी नहीं भरते हैं।
वैसे तो अधिकांश दंगों में पुलिस-पीएसी और प्रशासन की भूमिका सन्दिग्ध रही है या खुल्लमखुल्ला बहुसंख्यक दंगाइयों के पक्ष में रही है, लेकिन कुछ ऐसी शर्मनाक घटनाएँ रही हैं जो “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र” होने का दम भरने वाले इस देश की शासन व्यवस्था पर हमेशा एक भद्दे कलंक की तरह बनी रहेंगी। इनमें से एक है मलियाना की घटना जिसका एक और शर्मनाक अध्याय हाल में लिखा गया है।
पिछले तीन दशकों के दौरान चले “न्याय के नाटक” के दौरान 800 से भी ज़्यादा सुनवाइयों के बाद मेरठ के ज़िला न्यायालय ने इस सामूहिक हत्याकाण्ड के सभी 40 अभियुक्तों को “अपर्याप्त सबूतों के अभाव में” बरी कर दिया। मलियाना मामले में मूल रूप से 93 अभियुक्त शामिल थे। बाद के 36 वर्षों में कई अभियुक्तों की मृत्यु हो गई, जबकि कई अन्य का “पता नहीं लगाया जा सका” और अब इन बचे हुए 40 को भी छोड़ दिया गया है। फिर वही कहानी दोहरायी जा रही है कि मलियाना के 72 मुसलमानों को “किसी ने भी नहीं मारा!”
हालाँकि, न्याय के नाम पर इस अश्लील मज़ाक की शुरुआत तो 36 साल पहले फ़र्ज़ी एफ़आईआर लिखे जाने के साथ ही हो गयी थी!
22 मई को मेरठ के हाशिमपुरा मुहल्ले में पीएसी पहुँची और बड़ी संख्या में लोगों को ट्रकों में भरकर ले गयी और घरों और दुकानों में लूटपाट करके आग लगा दी। उठाये गये कुछ लोगों को मेरठ और फ़तेहगढ़ की जेलों में भेज दिया गया, लेकिन 42 मुसलमानों को गाज़ियाबाद के मुरादनगर में ऊपरी गंगा नहर और उत्तर प्रदेश-दिल्ली सीमा के पास हिंडन नदी के पास ले जाकर गोली मार दी गयी और उनके शवों को पानी में फेंक दिया गया। इस बीच मेरठ और फ़तेहगढ़ जेल में बन्द 11 लोगों की पिटाई से हिरासत में मौत हो गयी।
अगले दिन पीएसी पास के मलियाना में पहुँची। कई चश्मदीद गवाहों ने कहा है कि 44वीं बटालियन के कमाण्डेण्ट आर.डी. त्रिपाठी समेत वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में पीएसी ने 23 मई, 1987 को दिन के लगभग 2.30 बजे मलियाना में प्रवेश किया और 72 मुसलमानों को मार डाला। पीएसी की टुकड़ी के साथ बंदूकों और तलवारों से लैस सैकड़ों स्थानीय लोग भी थे। क़त्लेआम मचाने से पहले इलाक़े में आने-जाने के सभी पाँच रास्तों को बन्द कर दिया गया था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, “हर तरफ़ से मौत बरस रही थी। हत्यारों ने बच्चों और महिलाओं सहित किसी को भी नहीं बख्शा।”
जब ख़ुद पुलिस इस बर्बरता में शामिल थी तो एफ़आईआर लिखे जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था।
जिस ढंग से यह मुक़दमा चल रहा था और जिस ढर्रे पर ऐसे तमाम हत्याकाण्डों के मुक़दमे चलते रहे हैं, उसमें देरसबेर सब बरी हो जाते तो कोई हैरानी नहीं होती। लेकिन इस वक़्त आनन-फ़ानन में लाया गया यह फ़ैसला आरएसएस और भाजपा सरकार के दबाव में हुआ है, यह सन्देह करने के पर्याप्त आधार हैं। यह उसी सिलसिले की एक और कड़ी है जिसके तहत गुजरात में बिलकिस बानो बलात्कार और हत्याकाण्ड के अभियुक्तों को बरी किया गया और देशभर में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अपराधों में लिप्त लोगों को छोड़ा और बचाया जा रहा है। इस सबके ज़रिए भाजपा अपने समर्थकों को क्या संकेत दे रही है समझना क़तई मुश्किल नहीं है।
मलियाना का मुक़दमा 36 साल से घिसट-घिसटकर चल रहा था लेकिन अभी जब अचानक यह फ़ैसला सुनाया गया तब तक कानूनी कार्रवाई ही पूरी नहीं हुई थी। 36 पोस्टमार्टमों पर सुनवाई नहीं हुई थी और दण्ड विधान की धारा 313 के तहत अभियुक्तों से जिरह भी नहीं हुई थी। यहाँ तक कि गवाहों से पूछताछ भी पूरी नहीं की गयी थी। 10 से भी कम चश्मदीद गवाहों को अदालत में पेश किया गया था जबकि कुल 35 गवाह मौजूद थे। सरकारी वकील के मुताबिक़ सबको बरी किये जाने का आधार यह था कि पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान परेड तक नहीं करायी थी,
अप्रैल 2021 में वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली और पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके 23 मई 1987 की घटनाओं के लिए विशेष जाँच टीम गठित करने और निष्पक्ष तथा त्वरित सुनवाई कराये जाने की अपील की। इस याचिका के अनुसार एफ़आईआर सहित मुकदमे के कई ख़ास दस्तावेज़ रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो चुके हैं और पुलिस तथा पीएसी के लोग पीड़ितों और गवाहों को बार-बार धमकाते रहे हैं। हाशिमपुरा हत्याकाण्ड के मुक़दमे में 2018 में आये फ़ैसले में 16 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया था और उसमें मारे गये 42 मुसलमानों के परिवारों को 20-20 लाख रुपये मुआवज़ा मिला था। लेकिन मलियाना के हत्याकाण्ड में तो पुलिस का नाम भी नहीं आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को जवाबी हलफ़नामा दायर करने का आदेश दिया था। हालाँकि जनहित याचिका अभी भी हाई कोर्ट में लम्बित है लेकिन अब मेरठ की अदालत द्वारा सभी अभियुक्तों को बरी किये जाने के बाद पूरी सम्भावना है कि राज्य सरकार उच्च न्यायालय से यह मामला बन्द करने के लिए कहेगी।इसी तरह 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुए नरोदा कांड के सभी 67 आरोपियों को अहमदाबाद की सेशन कोर्ट ने बरी कर दिया। 21 साल बाद आए फैसले में कोर्ट को आरोपियों का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले।  28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद शहर के पास नरोदा गांव में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 11 लोग मारे गए थे।
अदालतों और जाँच आयोगों की रिपोर्टों में दफ़ना दिये गये अनेक मामलों की तरह मलियाना, नरोदा, हाशिमपुरा,या बिलकिस बानो   मामले  भले ही बन्द कर दिये जाये, मगर  इस देश के इंसाफ़पसन्द लोग कभी भी ऐसे झूठे फ़ैसलों को स्वीकार नहीं करेंगे। ये मामले एक बार फिर हमें याद दिलाते है किसी भी रंग के झण्डे वाली चुनावबाज़  पार्टियाँ न तो साम्प्रदायिक दंगों को रोक सकती हैं और न ही उनके आरोपियों को सज़ा दिला सकती हैं।  जनता का आन्दोलन ही इसके लिए दबाव बना सकता है और सच्चे सेक्युलर आधार पर समाज के नवनिर्माण का रास्ता खोल सकता है।
(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार एवं सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष हैं)
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