आरजेडी में लालू कल्चर बीते जमाने की बात

 तेजस्वी ने स्टार्ट किया नया सियासी चैप्टर

 पार्टी कार्यकर्ता नहीं बांधेंगे मुरेठा

दीपक कुमार तिवारी

पटना। आरजेडी कार्यकर्ता अब अनुशासन में रहेंगे। किसी भी कार्यक्रम में गमछा नहीं लहराएंगे। मुरेठा बांधने की भी मनाही है। आरजेडी नेतृत्व को कार्यकर्ताओं के लहरिया कट बाइक चलाने पर भी रोक लगा दी गई है। लट्ठ लेकर सभाओं में जाना भी मना है। मुरेठा बांधने या गमछा लहराने से बचने के लिए हरे रंग की टोपी पहनने की पार्टी ने छूट दे दी है। तेजस्वी यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि यादव अब कोइरी समाज के लोगों से लड़ाई-झगड़ा बंद करें। सवाल उठता है कि अपनी स्थापना के तकरीबन साढ़े तीन दशक बाद आरजेडी को इस बदलाव की जरूरत क्यों महसूस होने लगी। पहले तो लालू प्रसाद यादव अपने कार्यकर्ताओं-समर्थकों की तेल पिलावन लाठी रैली करते रहे हैं!
एनडीए के नेता दो वजहों से सत्ता से करीब दो दशक से दूर रहे आरजेडी पर निशाना साधते हैं। पहली वजह लालू यादव और राबड़ी देवी के शासन में बेलगाम अपराध है। अपहरण ने उस वक्त अघोषित उद्योग का रूप ले लिया था। लूट, छिनतई, डकैती की घटनाएं का कुछ कहना ही नहीं। सड़क पर शाम होते ही लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था। यादव बिरादरी का हर व्यक्ति अपने को लालू यादव ही समझता था। दरवाजे पर किसी का वाहन खड़ा हो या शो रूम में वाहन सजे हों, रंगदार उठा लेने में संकोच नहीं करते थे। अराजकता का आलम यह था कि सरकारी अधिकारी भी दुबके रहते थे। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी बिहार आने पर लालू-राबड़ी के जंगलराज का जिक्र करना नहीं भूलते। सीएम नीतीश कुमार तो बिहार में तब के अविकास को अक्सर रेखांकित करते हैं।तेजस्वी को लगने लगा है कि आरजेडी के कार्यकर्ताओं की वैसी अराजकता अब उनकी राह में बाधा बन सकती है। इसलिए उन्होंने अब अलिखित आचार संहिता अपने कार्यकर्ताओं के लिए तय कर दी है।
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में उत्साहजनक नतीजे आने के बाद से ही तेजस्वी यादव आरजेडी की छवि बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने पहले आरजेडी को A टू Z की पार्टी बनाने की बात कही थी। वे पार्टी में हर जाति के लोगों को शामिल करना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने BAAP (B- बैकवर्ड, A- अगड़े, A- आधी आबादी, P- पूअर) का स्लोगन दिया था। इसके जरिए वे समाज के हर तबके को जोड़ना चाहते हैं। उनके पिता लालू यादव ने अपने समय में M-Y (मुस्लिम-यादव) का समीकरण बनाया था। हर समीकरण की एक मियाद होती है। तब यह समीकरण काफी कारगर था।अब इसकी आभा खत्म हो रही है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मुस्लिम-यादव की बिहार में आबादी करीब 31-32 प्रतिशत है। चुनावी फतह के लिए इतने वोटों का एकतरफा होना काफी है। पर, आरजेडी इस समृद्ध वोट आधार के बावजूद इस बार बिहार में लोकसभा की सिर्फ चार सीटें ही जीत पाई।
तेजस्वी यादव को भी अब लगता है कि आरजेडी के लिए अब मुस्लिम-यादव समीकरण लाभकारी नहीं रहा। इसलिए कि मुस्लिम वोटों में नीतीश और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी तो सेंध लगा ही रही थी, अब प्रशांत किशोर भी इन वोटों के लिए खतरा बन गए हैं। यह ठीक है कि उनके साथ बड़े यादव-मुस्लिम नेताओं में वैसे ही चेहरे हैं, जो अब सियासत में अपनी चमक खो बैठे हैं। लेकिन आम मुसलमान जिस तरह उनके प्रभाव में आ रहे हैं, उससे दूसरे दलों की तरह आरजेडी भी चिंतित है। यही वजह है नए तबके को तेजस्वी अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। इसके लिए आरजेडी को अपनी संस्कृति में बदलाव लाना होगा। इसी बदलाव के तहत तेजस्वी ने मुरैठा-गमछा कल्चर त्यागने का निर्देश अपने समर्थकों को दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आरजेडी समर्थक अपने को बदल पाते हैं या नहीं। इसका पहला टेस्ट तेजस्वी की आभार यात्रा में होगा।

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