रामस्वरूप मंत्री
देश भर में किसानों के 750 से ज्यादा संगठन कार्यरत है तथा वे अपने-अपने तरीके से किसानों के मूलभूत सवालों को लेकर संघर्ष चला रहे हैं ।इन्हीं संगठनों की एकजुटता के चलते मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि काले कानून सरकार को वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा । संयुक्त किसान मोर्चा हो या अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति इन सब का निर्माण मुलताई किसान संघर्ष और मंदसौर किसान संघर्ष से ही प्रेरणा लेकर हुआ है। मुलताई में 12 जनवरी 1998 को फसल का मुआवजा मांग रहे 50000 से ज्यादा किसानों पर गोली चालन जिसमें 24 किसानों की मौत और बाद में मंदसौर में बर्बाद हुई फसल का मुआवजा मांग रहे किसानों पर गोली चलाई जाने की घटना ने ही देश के किसान संगठनों को एकजुट होने का निर्णय लेने पर मजबूर किया। इस तरह से किसान संघर्ष समिति के संघर्ष ने देश के किसान संगठनों को एकजुट होने और नई दिशा देने का काम भी किया है।
मुलताई किसान संघर्ष से पैदा हुई किसान संघर्ष समिति ने ना केवल किसानों के संघर्ष को नई दिशा दी है बल्कि संगठन को वैचारिक ताकत और प्रतिबद्धता से भी नवाजा है। कस ने संगठन को लेकर भी कई नए आयाम स्थापित किए हैं। किसान संघर्ष समिति देश का ऐसा पहला संगठन है जिसने देश की आधी आबादी महिला को भी अपने संगठन का नेतृत्व संभालने का मौका दिया यह अपने आप में एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जहां खेत में ग्रामीण महिलाएं अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उपज पैदा करते हैं वहीं महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है आज तक महिलाओं को किसी संगठन ने नेतृत्व सपना का काम नहीं किया है लेकिन किसान संघर्ष समिति ने यह कदम उठाया है और अपने मध्य प्रदेश इकाई का प्रमुख बनाकर महिला नेत्री आराधना भार्गव के कंधों पर यह जिम्मेदारी सौंप है यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और इसने देश के किसान संगठनों को भी एक नई दिशा देने का काम किया है
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12 जनवरी, 1998। मध्य प्रदेश के लिए काला दिन। यही वो तारीख थी जब बैतूल के मुलताई में किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन पर पुलिसवाले कहर बनकर टूट पड़े थे। पुलिस की अंधाधुंध फायरिंग में 24 किसानों की जान चली गई थी। इसके बाद जमकर सियासी हंगामा भी हुआ, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बार अफसोस तक नहीं जताया। घटना के 24 साल बाद 20220 में मुंबई में उन्होंने इसके लिए माफी मांगी।
साल 1997 में प्रदेश के किसान बेहद परेशान थे। बीते चार वर्षों से सोयाबीन और गेहूं की फसल लगातार खराब हो रही थी। लगातार कर्ज के जाल में फंसते जा रहे किसानों ने सरकार से मदद मांगी। दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद किसानों ने आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने का फैसला किया। 25 दिसंबर 1997 को किसानों ने संघर्ष समिति बनाई और सरकार से 5 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजे की मांग की। संघर्ष समिति ने सरकार से कहा कि उन्हें कर्जमाफी दी जाए, बिजली बिल माफ किया जाए और मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध कराया जाए।
1998 के मुलताई गोलीकांड मध्य प्रदेश के इतिहास के काले अध्यायों में से एक है, जिसके बाद से हर साल 12 जनवरी को किसान इन शहीदों की याद में सम्मेलन और आंदोलन करते हैं ।
मुलताई गोलीकांड की खास बात यह है कि 12 जनवरी को गोली चालन कराने का षड्यंत्र करनेवालों को सजा नहीं हुई, तीन मुकदमों में डा.सुनीलम के साथ तीन अन्य आंदोलनकारियों को आजीवन कारावास की सजा हुई।
मुलताई किसान आंदोलन राज्य की हिंसा और आंदोलनकारियों को सजा, दोनो को भुगत रहा है। जिसका मकसद आंदोलन को कुचलना था। लंबे समय तक पुलिस प्रताड़ना चलती रही। एक बार कांग्रेस की सरकार बदलने के बाद जब 12 जनवरी आयी तब तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती ने विधानसभा में शहीद स्तंभ के निर्माण तथा शहीद परिवारों को नौकरी के संबंध में पूछे जाने पर मुलताई गोलीचालन को देश के इतिहास में काला धब्बा बतलाते हुए मुकदमे वापस लेने का आश्वासन दिया था। आश्वासन पूरा कर पातीं उसके पहले भाजपा ने उन्हें हटा दिया तथा बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बना दिया।
24 किसानों का शहीद स्तंभ मुलतापी में आज तक नहीं बन सका है। गोलीचालन के बाद सरकार द्वारा किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए रातोरात मुलताई बस स्टैंड पर किसान स्तम्भ बनाया गया लेकिन शहीद स्तंभ के लिए आज तक सरकार ने भूमि आवंटित नहीं की। डा.सुनीलम ने कई बार विधानसभा में और सड़क पर इस संबंध में सवाल उठाया, जवाब मिला कि बस स्टैंड के सामने का स्थान छोटे झाड़ का जंगल है इसलिए शहीद किसानों के स्तंभ के लिए भूमि आवंटित नहीं की जा सकती जबकि किसान स्तंभ आज भी वहां खड़ा है। यही कारण है कि पिछले 28 वर्षों से किसान संघर्ष समिति शहीद किसान स्तंभ का शिलालेख किसान स्तंभ पर ले जाकर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करती है, आयोजन समाप्त होने के बाद शिलालेख वापस किसान संघर्ष समिति कार्यालय में लाया जाता है।
मुलताई किसान आंदोलन से ही ही किसान संघर्ष समिति का जन्म हुआ और किसान संघर्ष समिति ने देशके किसान आंदोलन मे संघर्ष और विचारवान संगठन के रूप में पहचान बनाई।किसान संघर्ष समिति ने अपने संघर्ष पूर्ण आचरण के चलते किसानों केलिए तमाम सकारात्मक परिणाम निकाले । 1998 के पहले मध्य प्रदेश में अनावरी तय करने की इकाई तहसील थी जिसके कारण मुलताई में मुआवजा नहीं दिया जा रहा था लेकिन आंदोलन के बाद सरकारों को इकाई बदलकर पटवारी हलका करनी पड़ी। इसके चलते राजस्व का मुआवजा पहले की तुलना में कहीं अधिक किसानों को मिलने लगा।मुलताई किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धि फसल बीमा के भुगतान के तौर पर सामने आयी। फसल बीमा का प्रीमियम देशभर में किसानों से 1985 से काटा जा रहा था परंतु पहली बार फसल बीमा का भुगतान बैतूल जिले में 1998 में हुआ। तब से लेकर आज तक फसल बीमा का मुद्दा सभी सरकारों के लिए अहम मुद्दा बना हुआ है। हालांकि जिस तरह से फसल बीमा योजना चलायी जा रही है उससे बीमा कंपनियां लाखों करोड़ रुपये कमाकर मालामाल हो गयी हैं परंतु पहले की तुलना में किसानों को अधिक फसल बीमा देने के लिए बीमा कंपनियां आज मजबूर हो गयी हैं।
मुलताई के किसान आंदोलन के परिणामस्वरूप सरकार को इल्ली प्रकोप तथा गेरुआ रोग को राजस्व आचार संहिता में शामिल करने के लिए मजबूर होना पड़ा , जिसके चलते किसानों को पहले से अधिक मुआवजा मिल रहा है। मुलताई के किसानों ने 20 वर्ष पहले चक्रवृद्धि ब्याज खत्म कर बिना ब्याज के किसानों को ऋण देने हेतु संघर्ष शुरू किया था। आज तमाम राज्यों में कम से कम 50,000 रुपये का अल्पकालीन ऋण बिना ब्याज पर किसानों को दिया जाने लगा है। किसान संघर्ष समिति ने एक नहीं दो बार किसानों की कर्जा माफी करायी है। इसी तरह बिजली बिल माफ कराने में भी मध्य प्रदेश में किसान संघर्ष समिति सफल हुई है। मुलताई में किसान संघर्ष समिति ने टेस्ट रिपोर्ट का बढ़ाकर लिया जाने वाला पैसा आंदोलन कर किसानों को वापस कराया है।
किसान संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.सुनीलम कहते हैं कि मुलताई के किसानों के द्वारा शुरू किया गया आंदोलन का विस्तार आज पूरे देश में हो चुका है तथा किसानों की एकजुटता 12 जनवरी 1998 की तुलना में बहुत मजबूत हुई है। संयुक्त किसान मोर्चा की ताकत किसान संघर्ष समिति जैसे 750 किसान संगठनों की एकजुटता से बनी है। यही कारण है कि मोदी की महाबली सरकार को तीन कानून रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
(लेखक इदौर के वरिष्ठ पत्रकार और किसान संघर्ष समिति मालवा निमाड़ केसयोजक है)







