दिल्ली में महंगी एंटी-कैंसर दवाओं की कालाबाजारी और नकली दवाओं के अंतरराष्ट्रीय/अंतरराज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़
करीब ₹1 लाख की कीमत वाले ‘अवेलूमैब’ (Avelumab) इंजेक्शन में दवा की जगह भरा हुआ था सिर्फ पानी और बैक्टीरिया
एक लाख के इंजेक्शन में मिला सिर्फ पानी, जिन लोगों के ये इंजेक्शन चढ़ेंगे वे मरेंगे या ठीक होंगे ?
चरण सिंह
लड़ते रहो जाति और धर्म के नाम पर धंधेबाज लोगों की जान से खिलवाड़ कर पैसा कमा रहे हैं। जिस क्षेत्र लोगों जी जिंदगी बचाई जाए उसे क्षेत्र में मौत का सामान बेचा जा रहा है। जिम्मेदार लोग नोट बटोरने में मस्त हैं। जी हां मैं बात कर रहा हूं स्वास्थ्य के क्षेत्र की। मतलब आदमी यह नहीं सोच रहा है कि कल वह जिन्दा भी रहेगा या नहीं वह बेकार की बातों में उलझा हुआ है। सबसे अधिक काम शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में करने की है पर लोग हैं कि जाति और धर्म के नाम पर बंटकर राजनीतिक दलों हैं। थोड़ा बहुत अपनी जिंदगी के बारे में लो। इंजेक्शन में दवा नहीं पानी भरकर बेचा जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री बताएं कि यह इंजेक्शन जिसके चढ़ेगा वह मरेगा या फिर ठीक होगा ?
दरअसल दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने महंगी एंटी-कैंसर दवाओं की कालाबाजारी और नकली दवाओं के एक बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय/अंतरराज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। जांच में सामने आया है कि करीब ₹1 लाख की कीमत वाले ‘अवेलूमैब’ (Avelumab) इंजेक्शन में दवा की जगह सिर्फ पानी और बैक्टीरिया भरा हुआ था। यह नकली दवा सिंडिकेट दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान और हैदराबाद सहित देश के 7 राज्यों में फैला हुआ था, जिसमें पुलिस ने अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया है। यह वाकई एक बेहद चिंताजनक और गंभीर मामला है, क्योंकि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों की जिंदगी के साथ इस तरह का खिलवाड़ किया गया।
देशद्रोह का मामला तो यह है। इन आरोपियों के घरों पर बुलडोजर क्यों नहीं चलाया जा रहा है ? इन पर एनएसए क्यों नहीं लगाया जा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह का कोई पहला मामला हो। लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले गिरोहों का पर्दाफाश लगातार हो रहा है पर इन लोगों का कुछ बिगड़ नहीं पाता है। किसी समय समाज सेवा नाम से जाने जाने वाले शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र अब विशुद्ध रूप से धंधा बनकर रह गए हैं। सरकारें भी तमाम बातें करेंगी पर इस ओर गंभीरता से काम नहीं होता।
जिस राजस्थान में सरकारी स्कूलों के सुधार के लिए चलाए जा रहे अभियान का विरोध हो रहा है। उस राजस्थान में ही यह दवाइयां सरकारी अस्पतालों (जैसे बीकानेर, जयपुर, जोधपुर) में सप्लाई के लिए थीं, जिन्हें वहां से अवैध रूप से निकालकर ब्लैक मार्केट में बेचा जा रहा था और शीशियों में असली दवा की जगह पानी मिला दिया गया था।
दिल्ली पुलिस ने जब इन इंजेक्शंस की जांच जर्मनी की मर्क लैब (Merck Lab) से करवाई, तो पता चला कि इनमें कोई एक्टिव इंग्रीडिएंट (दवा का असर) था ही नहीं, बल्कि केवल पानी और बैक्टीरिया मौजूद थे।अस्पतालों के स्टाफ की मिलीभगत: गिरफ्तार किए गए 17 आरोपियों में कुछ नामी प्राइवेट अस्पतालों के कर्मचारी भी शामिल हैं, जो खाली शीशियों और पैकेजिंग का इस्तेमाल करके यह गोरखधंधा चला रहे थे।







