कर्पूरी ठाकुर, हरावल दस्ते के सोशलिस्ट थे !

प्रोफेसर राजकुमार जैन

जाति की आग में झुलस्ते हिंदुस्तान में एक ऐसा इंसान जिसने अपने किरदार, संघर्षो, ज्ञान, कथनी और करनी,व्यक्तिगत सादगी, ईमानदारी और होशियारी की बुनियाद पर जातिवाद को उसके घर में ही बार-बार पटकनी दी, और आखिर में शिकस्त देकर उनको अपना नेता मानने पर मजबूर कर दिया।
जी हां, वे थे कर्पूरी ठाकुर। वे इसलिए महान नहीं थे कि बिहार के एक बार उप-मुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री तथा तमाम उम्र विधायक रहे थे। आजादी के बाद, हिंदुस्तानी सोशलिस्टों के हरावल दस्ते की पहली कतार में वे शामिल थे। सोशलिस्ट पार्टी बिहार में कर्पूरी ठाकुर के चेहरे को आगे रखकर एक तरफ जहां समाजवादी नीतियों, विचारों सिद्धांतों को जमीनी स्तर पर अमली जामा पहनाने की कोशिश करती थी, वहीं फख्र के साथ ताल ठोकती थी कि हमारे पास कर्पूरी ठाकुर जैसा नेता है। इसलिए हुकूमत से लेकर पार्टी की कमान पार्टी ने कर्पूरी जी को सौंपी थी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी इनको बनाया गया l
गरीबी, मुश्किलों, दुश्वारियों, प्रताड़ना सहते हुए उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत की थी। ऐसे अभावों के बीच जब अपनी मेहनत, कुव्वत से इंसान आगे बढ़ता है तो जाहिर है की मां-बाप की तमन्ना होती है, हमारा बेटा अच्छी तालीम हासिल कर, बड़ी नौकरी, तनख्वाह, सुखी जीवन व्यतीत करें। परंतु कर्पूरी ठाकुर की संगत ने उनकी जिंदगी को दूसरी राह पर मोड़ दे दिया।
1938 में जब कर्पूरी जी मात्र 14 वर्ष के थे, उनके गांव के नजदीक गांव ओइनी में प्रांतीय किसान सम्मेलन हुआ। जिसमें समाजवाद के शिखर पुरुष आचार्य नरेंद्रदेव से उनकी मुलाकात हुई। सोशलिस्टों की जैसी परंपरा थी कि कहीं भी कोई नौजवान उनके संपर्क में आता उसे प्रोत्साहित कर सोशलिस्‍ट तंजीम में शामिल करने का प्रयास होता था। आचार्य जी ने बालक कर्पूरी ठाकुर से भाषण देने का इसरार किया। मंच पर बैठे नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि उनका भाषण सुनकर प्रभावित हुए।
1942 की क्रांति जिसमें महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सी, एम, कॉलेज दरभंगा मे कर्पूरी ठाकुर की सदारत में छात्रों की सभा में करो या मरो के समर्थन में कर्पूरी जी ने हुंकार भरी। इस कारण उन्हे गिरफ्तार कर दरभंगा जेल में बंद कर दिया गया। जेल मे बदइंतजामी के खिलाफ 28 दिन तक अनशन किया। एक साल के कैद की सजा उनको सुनाई गई। जो अक्टूबर 1944 में पूरी होने वाली थी परंतु गवर्नर के आदेश पर उन्हें फिर नजर बंद कर कैंप जेल से भागलपुर सेंट्रल जेल में बंदी बना दिया गयाl 2 साल 1 महीने की सजा काटकर नवंबर 1945 में उनको रिहा किया गया। कर्पूरी ठाकुर के जीवन की राह सोशलिस्ट तहरीक, उसके नेताओं के इर्द-गिर्द चलने लगी। जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया, पंडित रामानंद मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे नेताओं के संपर्क मैं आने के कारण उन्होंने 1934 में बनी कांग्रेसी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। 1946 में पार्टी के मंत्री के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया। इस कारण उनकी पहली लड़ाई इलियास नगर एवं विक्रमपट्टी के जमींदारों की जमीन भूमिहीनों में बांटने के लिए हुई। 1947 में बनी अखिल भारतीय हिंद किसान पंचायत के वे सचिव बनाए गए। और इस समय उन्होंने पूरे बिहार में दौरा कर गरीब किसानों, मजदूरों से संबंध कायम कर लिया। 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस छोड़कर अलग से सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर लिया। 1948 से 1952 तक वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री बने रहे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर पार्टी ने 1952 मे ‘अंतरराष्ट्रीय समाजवादी युवा सम्मेलन’ में भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से वियना और युगोस्लाविया भेजा। बाद वे 1953 मे इस्राइल भी गए। वहां पर खास तौर पर कृषि के क्षेत्र में उनके अविष्कारों, कम खर्चे पर मकान बनाने तथा सार्वजनिक शौचायलयों के उनके प्रबंधकीय से वह बहुत प्रभावित हुए और इसकी एक रपट उन्होंने योजना आयोग को भी प्रस्तुत की। इसी समय लेबनान, मिस्र ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर नई दुनिया का जायजा लिया।
आजाद हिंदुस्तान के पहले आम चुनाव 1952 मे बिहार विधानसभा के सदस्य चुन लिए गए। कांग्रेस के विशाल बहुमत वाले सदन में उन्होंने अपनी तैयारी, वाकपटुता तथा गरीब गुरबो, वंचकों के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपनी धाक जमा ली। वे प्रजा समाजवादी दल के सदस्य थे। 1965 में प्रजा समाजवादी तथा समाजवादी पार्टी के एकीकरण के लिए सारनाथ उत्तर प्रदेश में सम्मेलन हुआ। कई अड़चने मौजूद थी, परंतु डॉक्टर लोहिया ने कर्पूरी ठाकुर से कहा कि तुम इस कार्य को पूरा कर सकते हो। यह कर्पूरी जी थे जिनके प्रयास से प्रजा समाजवादी पार्टी का एक बड़ा वर्ग नई बनने वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गया। डॉ राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की एक नई रणनीति का नारा दिया था, जिसके कारण बिहार विधानसभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के 67 विधायक चुनकर आए थे। परंतु कम समर्थन वाली पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिंह को मुख्यमंत्री बनाना कर्पूरी ठाकुर ने स्वीकार कर लिया था।
किसी भी आदमी की असली पहचान जब वह किसी पद पर होता है तभी होती है। बिहार विधानसभा का सदस्य बनने के बाद कर्पूरी जी पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी। एक तरफ जहां पार्टी के संचालन, संघर्षों, विचारधारा के प्रचार प्रसार, शिक्षण प्रशिक्षण, प्रदेश भर में जनसभाओं, सम्मेलनों में शिरकत करना, कार्यकर्ताओं की निजी जीवन की मुश्किलों को जानना और उसके निदान की जिम्मेदारी भी थी। वहीं सदन में विधयक प्रक्रियाओं की गहन जानकारी के बल पर वंचक तबको की तकलीफो, दुश्वारियों, उन पर होने वाले सरकारी तथा जमीदारों,जाति के घमंड में चूर लोगों के जुल्म ज्यादती को सिलसिलेवार तथ्यों, तर्कों से लैस होकर उस अन्याय जुल्म को उजागर करना, तथा उसके
हल का रास्ता बताना था।
जारी है—– की आग में झुलस्ते हिंदुस्तान में एक ऐसा इंसान जिसने अपने किरदार, संघर्षो, ज्ञान, कथनी और करनी,व्यक्तिगत सादगी, ईमानदारी और होशियारी की बुनियाद पर जातिवाद को उसके घर में ही बार-बार पटकनी दी, और आखिर में शिकस्त देकर उनको अपना नेता मानने पर मजबूर कर दिया।
जी हां, वे थे कर्पूरी ठाकुर। वे इसलिए महान नहीं थे कि बिहार के एक बार उप-मुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री तथा तमाम उम्र विधायक रहे थे। आजादी के बाद, हिंदुस्तानी सोशलिस्टों के हरावल दस्ते की पहली कतार में वे शामिल थे। सोशलिस्ट पार्टी बिहार में कर्पूरी ठाकुर के चेहरे को आगे रखकर एक तरफ जहां समाजवादी नीतियों, विचारों सिद्धांतों को जमीनी स्तर पर अमली जामा पहनाने की कोशिश करती थी, वहीं फख्र के साथ ताल ठोकती थी कि हमारे पास कर्पूरी ठाकुर जैसा नेता है। इसलिए हुकूमत से लेकर पार्टी की कमान पार्टी ने कर्पूरी जी को सौंपी थी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी इनको बनाया गया l
गरीबी, मुश्किलों, दुश्वारियों, प्रताड़ना सहते हुए उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत की थी। ऐसे अभावों के बीच जब अपनी मेहनत, कुव्वत से इंसान आगे बढ़ता है तो जाहिर है की मां-बाप की तमन्ना होती है, हमारा बेटा अच्छी तालीम हासिल कर, बड़ी नौकरी, तनख्वाह, सुखी जीवन व्यतीत करें। परंतु कर्पूरी ठाकुर की संगत ने उनकी जिंदगी को दूसरी राह पर मोड़ दे दिया।
1938 में जब कर्पूरी जी मात्र 14 वर्ष के थे, उनके गांव के नजदीक गांव ओइनी में प्रांतीय किसान सम्मेलन हुआ। जिसमें समाजवाद के शिखर पुरुष आचार्य नरेंद्रदेव से उनकी मुलाकात हुई। सोशलिस्टों की जैसी परंपरा थी कि कहीं भी कोई नौजवान उनके संपर्क में आता उसे प्रोत्साहित कर सोशलिस्‍ट तंजीम में शामिल करने का प्रयास होता था। आचार्य जी ने बालक कर्पूरी ठाकुर से भाषण देने का इसरार किया। मंच पर बैठे नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि उनका भाषण सुनकर प्रभावित हुए।
1942 की क्रांति जिसमें महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सी, एम, कॉलेज दरभंगा मे कर्पूरी ठाकुर की सदारत में छात्रों की सभा में करो या मरो के समर्थन में कर्पूरी जी ने हुंकार भरी। इस कारण उन्हे गिरफ्तार कर दरभंगा जेल में बंद कर दिया गया। जेल मे बदइंतजामी के खिलाफ 28 दिन तक अनशन किया। एक साल के कैद की सजा उनको सुनाई गई। जो अक्टूबर 1944 में पूरी होने वाली थी परंतु गवर्नर के आदेश पर उन्हें फिर नजर बंद कर कैंप जेल से भागलपुर सेंट्रल जेल में बंदी बना दिया गयाl 2 साल 1 महीने की सजा काटकर नवंबर 1945 में उनको रिहा किया गया। कर्पूरी ठाकुर के जीवन की राह सोशलिस्ट तहरीक, उसके नेताओं के इर्द-गिर्द चलने लगी। जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया, पंडित रामानंद मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे नेताओं के संपर्क मैं आने के कारण उन्होंने 1934 में बनी कांग्रेसी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। 1946 में पार्टी के मंत्री के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया। इस कारण उनकी पहली लड़ाई इलियास नगर एवं विक्रमपट्टी के जमींदारों की जमीन भूमिहीनों में बांटने के लिए हुई। 1947 में बनी अखिल भारतीय हिंद किसान पंचायत के वे सचिव बनाए गए। और इस समय उन्होंने पूरे बिहार में दौरा कर गरीब किसानों, मजदूरों से संबंध कायम कर लिया। 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस छोड़कर अलग से सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर लिया। 1948 से 1952 तक वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री बने रहे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर पार्टी ने 1952 मे ‘अंतरराष्ट्रीय समाजवादी युवा सम्मेलन’ में भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से वियना और युगोस्लाविया भेजा। बाद वे 1953 मे इस्राइल भी गए। वहां पर खास तौर पर कृषि के क्षेत्र में उनके अविष्कारों, कम खर्चे पर मकान बनाने तथा सार्वजनिक शौचायलयों के उनके प्रबंधकीय से वह बहुत प्रभावित हुए और इसकी एक रपट उन्होंने योजना आयोग को भी प्रस्तुत की। इसी समय लेबनान, मिस्र ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर नई दुनिया का जायजा लिया।
आजाद हिंदुस्तान के पहले आम चुनाव 1952 मे बिहार विधानसभा के सदस्य चुन लिए गए। कांग्रेस के विशाल बहुमत वाले सदन में उन्होंने अपनी तैयारी, वाकपटुता तथा गरीब गुरबो, वंचकों के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपनी धाक जमा ली। वे प्रजा समाजवादी दल के सदस्य थे। 1965 में प्रजा समाजवादी तथा समाजवादी पार्टी के एकीकरण के लिए सारनाथ उत्तर प्रदेश में सम्मेलन हुआ। कई अड़चने मौजूद थी, परंतु डॉक्टर लोहिया ने कर्पूरी ठाकुर से कहा कि तुम इस कार्य को पूरा कर सकते हो। यह कर्पूरी जी थे जिनके प्रयास से प्रजा समाजवादी पार्टी का एक बड़ा वर्ग नई बनने वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गया। डॉ राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की एक नई रणनीति का नारा दिया था, जिसके कारण बिहार विधानसभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के 67 विधायक चुनकर आए थे। परंतु कम समर्थन वाली पार्टी के नेता महामाया प्रसाद सिंह को मुख्यमंत्री बनाना कर्पूरी ठाकुर ने स्वीकार कर लिया था।
किसी भी आदमी की असली पहचान जब वह किसी पद पर होता है तभी होती है। बिहार विधानसभा का सदस्य बनने के बाद कर्पूरी जी पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई थी। एक तरफ जहां पार्टी के संचालन, संघर्षों, विचारधारा के प्रचार प्रसार, शिक्षण प्रशिक्षण, प्रदेश भर में जनसभाओं, सम्मेलनों में शिरकत करना, कार्यकर्ताओं की निजी जीवन की मुश्किलों को जानना और उसके निदान की जिम्मेदारी भी थी। वहीं सदन में विधयक प्रक्रियाओं की गहन जानकारी के बल पर वंचक तबको की तकलीफो, दुश्वारियों, उन पर होने वाले सरकारी तथा जमीदारों,जाति के घमंड में चूर लोगों के जुल्म ज्यादती को सिलसिलेवार तथ्यों, तर्कों से लैस होकर उस अन्याय जुल्म को उजागर करना, तथा उसके हल का रास्ता बताना था।

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