उम्र नहीं, जुनून चाहिए

ऊषा शुक्ला

जिंदगी के हर पड़ाव पर खुद को बेहतर बनाने की एक नई शुरुआत—जीवन एक ऐसी यात्रा है, जिसमें हर उम्र का अपना अलग अनुभव, हर रिश्ते का अपना अलग दायित्व और हर पड़ाव का अपना अलग अर्थ होता है। बचपन में सपने देखने की आजादी होती है, युवावस्था में उन्हें पूरा करने का जोश होता है और उम्र बढ़ने के साथ जिंदगी हमें अनुभवों की वह पूँजी देती है, जिसकी कीमत किसी धन-दौलत से नहीं आँकी जा सकती। लेकिन अक्सर समाज में एक ऐसी सोच देखने को मिलती है, जो उम्र बढ़ने के साथ इंसान के सपनों पर भी विराम लगा देना चाहती है। लोग कहने लगते हैं कि अब इस उम्र में क्या करना, अब आराम कीजिए, अब जीवन में और क्या हासिल करना है?
मैं इस सोच से सहमत नहीं हूँ। मेरा मानना है कि *जीवन में आगे बढ़ने के लिए उम्र नहीं, जुनून चाहिए। सपनों को पूरा करने के लिए जवानी नहीं, हौसलों की जवानी चाहिए। जब तक मन में कुछ नया सीखने की इच्छा है, जब तक दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा है और जब तक अपने अनुभवों को दूसरों तक पहुँचाने की चाह है, तब तक जीवन में कोई भी पड़ाव अंतिम नहीं होता। हर सुबह एक नई शुरुआत है और हर नया दिन स्वयं को बेहतर बनाने का एक अवसर।
जीवन के अनुभव ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी हैं-जब मैं अपने जीवन की यात्रा पर नजर डालती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि मैंने समय के साथ कितनी भूमिकाएँ निभाई हैं। एक बेटी के रूप में जन्म लिया, बहू बनकर दूसरे घर को अपना बनाया, पत्नी के रूप में जीवनसाथी का हाथ थामा, माँ बनकर अपने बच्चों की दुनिया सँवारी। फिर सास बनी, समधन बनी और अब दादी बनकर जीवन के एक नए, खूबसूरत अध्याय में प्रवेश किया। हर रिश्ते ने मुझे कुछ सिखाया। हर जिम्मेदारी ने मुझे पहले से अधिक मजबूत बनाया और हर परिस्थिति ने जीवन को देखने का एक नया नजरिया दिया। एक बेटी के रूप में मैंने अपने माता-पिता के स्नेह को महसूस किया। बहू बनकर परिवार के साथ सामंजस्य बैठाना सीखा। पत्नी के रूप में जीवनसाथी के साथ सुख-दुख बाँटना सीखा और माँ बनकर यह समझा कि बच्चों की परवरिश केवल उन्हें अच्छी शिक्षा और सुविधाएँ देने का नाम नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार देना भी उतना ही जरूरी है।
मैंने अपने बच्चों के भविष्य को सँवारने के लिए अपना समय और ऊर्जा लगाई। मेरी कोशिश रही कि वे केवल सफल इंसान ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार मनुष्य भी बनें। मेरे लिए उनकी परवरिश किसी प्रतियोगिता में आगे निकलने का प्रयास नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाने की प्रक्रिया रही।
आज जब बच्चे अपने जीवन में आगे बढ़ रहे हैं और परिवार में नई पीढ़ी का आगमन हुआ है, तो मन में एक संतोष भी है और एक नई ऊर्जा भी। लेकिन क्या जीवन का अर्थ केवल जिम्मेदारियाँ निभा लेने के बाद रुक जाना है?
नहीं! मेरा मानना है कि दूसरों के लिए जीते-जीते अपने भीतर की प्रतिभा को पहचानना और उसे सही दिशा देना भी जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
उम्र बढ़ रही है, लेकिन मेरे सपनों की उम्र नहीं—
समय किसी के लिए नहीं रुकता। हर बीतता दिन हमारी उम्र में एक संख्या जोड़ देता है। चेहरे पर कुछ नई लकीरें आ जाती हैं, शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता और जिम्मेदारियों का स्वरूप बदल जाता है। लेकिन क्या इन परिवर्तनों के साथ हमारी सोच और हमारे सपनों को भी बूढ़ा हो जाना चाहिए? मुझे लगता है कि उम्र बढ़ना प्रकृति का नियम है, लेकिन उत्साह खो देना हमारी मजबूरी नहीं।
यदि कोई महिला पचास या साठ वर्ष की उम्र में लिखना शुरू करती है, तो उसे यह सोचकर पीछे नहीं हटना चाहिए कि अब उसकी रचनाएँ कौन पढ़ेगा। यदि कोई व्यक्ति इस उम्र में कोई नई कला सीखना चाहता है, तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि सीखने की उम्र निकल चुकी है। यदि किसी के मन में समाज के लिए कुछ करने की इच्छा है, तो उसे दूसरों की टिप्पणियों से डरकर अपने कदम नहीं रोकने चाहिए। हम अक्सर अपने जीवन का बड़ा हिस्सा दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने में लगा देते हैं। परिवार की खुशियाँ, बच्चों की जरूरतें, रिश्तों की मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारियाँ हमारे जीवन का केंद्र बन जाती हैं। यह सब महत्वपूर्ण है, लेकिन इसी बीच कभी-कभी हम अपने भीतर की आवाज सुनना भूल जाते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हमारे अंदर भी कुछ करने की क्षमता है, कुछ कहने के लिए शब्द हैं और कुछ सपने हैं, जो अब तक पूरे होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए अब मैं मानती हूँ कि अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं है। अपनी प्रतिभा को निखारना अहंकार नहीं है और अपने सपनों की दिशा में कदम बढ़ाना परिवार के प्रति जिम्मेदारियों से विमुख होना नहीं है। बल्कि जब इंसान अपने भीतर संतोष और आत्मविश्वास महसूस करता है, तो वह अपने आसपास के लोगों को भी सकारात्मक ऊर्जा दे पाता है।
ऊषा का लक्ष्य केवल आगे बढ़ना नहीं, कुछ सार्थक करना है— हर व्यक्ति का जीवन में कोई न कोई लक्ष्य होता है। किसी का लक्ष्य धन कमाना होता है, किसी का बड़ा पद प्राप्त करना और किसी का समाज में प्रतिष्ठा हासिल करना। लेकिन उम्र और अनुभव के साथ मेरे लिए लक्ष्य का अर्थ थोड़ा बदल गया है। अब मेरा लक्ष्य केवल अपने लिए कुछ हासिल करना नहीं, बल्कि अपने अनुभवों को शब्दों में ढालकर लोगों तक पहुँचाना है।
मैं चाहती हूँ कि मेरे विचार उन महिलाओं तक पहुँचें, जिन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन आज भी अपने भीतर कुछ करने की इच्छा रखती हैं। मैं उन लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहती हूँ, जो जीवन की कठिनाइयों के कारण निराश हो चुके हैं। मैं उन माता-पिताओं से कहना चाहती हूँ, जो बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते स्वयं को भूल गए हैं, कि जीवन में अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए भी जगह होनी चाहिए। मेरे मन में अनेक विचार आते हैं। कभी रिश्तों के बदलते स्वरूप पर लिखने का मन करता है, कभी माता-पिता के महत्व पर, कभी बच्चों की परवरिश पर और कभी जीवन-मृत्यु के उस सत्य पर, जिसे जानते हुए भी हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। मैंने जीवन में खुशियाँ भी देखी हैं और बिछोह का दर्द भी महसूस किया है। माता-पिता का साथ छूटने का दुख जाना है और परिवार में नई पीढ़ी के आगमन की खुशी भी अनुभव की है। इन अनुभवों ने मुझे सिखाया है कि जीवन बहुत छोटा है। इसलिए इसे केवल शिकायतों, प्रतिस्पर्धा और दूसरों से तुलना करने में नहीं बिताना चाहिए। यदि हमारे अनुभव किसी एक व्यक्ति को भी सही दिशा दिखा सकें, यदि हमारे शब्द किसी निराश इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला सकें और यदि हमारी सोच किसी परिवार में रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ा सके, तो यह भी एक बड़ी उपलब्धि है।
मेरे लिए सफलता का अर्थ केवल यह नहीं कि कितने लोग मुझे जानते हैं, बल्कि यह भी है कि मेरे कारण कितने लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव आया।
रिश्ते निभाना और अपना अस्तित्व बचाए रखना, दोनों जरूरी हैं-हमारे समाज में महिलाओं से अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार के लिए हर समय उपलब्ध रहें। वे माँ हैं, इसलिए बच्चों की चिंता करें। पत्नी हैं, इसलिए पति का ध्यान रखें। बहू हैं, इसलिए ससुराल की जिम्मेदारियाँ निभाएँ। सास हैं, इसलिए नए परिवार को स्वीकार करें। समधन हैं, इसलिए दोनों परिवारों के बीच संबंधों को मधुर बनाए रखें। इन सभी भूमिकाओं का अपना महत्व है। परिवार किसी भी व्यक्ति के जीवन का मजबूत आधार होता है। लेकिन एक महिला की पहचान केवल उसके रिश्तों से ही नहीं बनती। उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी सोच, अपनी रुचियाँ और अपने सपने भी होते हैं।
मैं मानती हूँ कि परिवार के प्रति समर्पण और स्वयं के प्रति सम्मान के बीच संतुलन होना चाहिए। महिला यदि अपने परिवार से प्रेम करती है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी प्रतिभा को भूल जाए। वह अच्छी माँ हो सकती है और साथ ही एक अच्छी लेखिका भी बन सकती है। वह परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए समाज के लिए कुछ कर सकती है। वह अपने बच्चों और नाती-पोतों से प्रेम करते हुए अपने सपनों को भी जीवित रख सकती है।
जीवन के किसी एक रिश्ते को निभाने के लिए दूसरे रिश्ते या अपनी पहचान का त्याग करना आवश्यक नहीं है। जरूरत है समझदारी, सहयोग और समय के सही प्रबंधन की। मैं चाहती हूँ कि महिलाएँ स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ है, जिसे मैं हमेशा से करना चाहती थी, लेकिन जिम्मेदारियों के कारण टालती रही? यदि उत्तर हाँ है, तो उसे पूरा करने की शुरुआत आज से क्यों नहीं?
हो सकता है कि शुरुआत में कठिनाई आए। हो सकता है कि कुछ लोग आपका मजाक भी उड़ाएँ। लेकिन याद रखिए, अपने सपनों की कीमत वही समझ सकता है, जिसके मन में उन्हें पूरा करने की इच्छा होती है।
निरंतर प्रयास ही सफलता की असली कुंजी है—कहा जाता है कि लोहे को जंग निष्क्रियता से लगती है। इंसान के जीवन में भी ऐसा ही होता है। जब हम सीखना बंद कर देते हैं, प्रयास करना छोड़ देते हैं और यह मान लेते हैं कि अब हम कुछ नया नहीं कर सकते, तब हमारी क्षमताएँ धीरे-धीरे सीमित होने लगती हैं। जीवन में आगे बढ़ने के लिए हर दिन कोई बहुत बड़ा काम करना आवश्यक नहीं है। कभी एक नया विचार पढ़ लेना, कभी कुछ पंक्तियाँ लिख लेना, कभी कोई नई कला सीख लेना और कभी अपनी किसी पुरानी गलती को सुधार लेना भी प्रगति है।
हमें अपनी तुलना दूसरों से करने के बजाय स्वयं से करनी चाहिए। कल मैं क्या थी और आज क्या हूँ? कल मेरी सोच कैसी थी और आज उसमें कितना सुधार आया? कल जिन परिस्थितियों में मैं हार मान लेती थी, क्या आज उनका सामना अधिक धैर्य से कर पा रही हूँ? यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमें अपने भीतर सकारात्मक बदलाव का एहसास कराते हैं, तो समझिए कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
हर प्रयास तुरंत सफलता नहीं देता। कई बार मेहनत के बावजूद परिणाम हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं आते। लेकिन असफलता का अर्थ यह नहीं कि हमारी कोशिश व्यर्थ हो गई। असफलता हमें अपनी कमियों को पहचानने और अपनी रणनीति बदलने का अवसर देती है। हमें केवल यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा प्रयास सही दिशा में हो और हम अपनी गलतियों से सीखने के लिए तैयार रहें। मैं अपने जीवन में भी इसी सोच को महत्व देना चाहती हूँ। मैं नहीं चाहती कि किसी दिन पीछे मुड़कर देखूँ और यह सोचूँ कि मेरे पास करने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन मैंने केवल इस डर से प्रयास नहीं किया कि लोग क्या कहेंगे।
लोगों की राय समय के साथ बदलती रहती है, लेकिन अपने अधूरे सपनों का मलाल कभी-कभी लंबे समय तक मन में रह जाता है। इसलिए प्रयास करते रहना जरूरी है।
जीवन का सबसे सुंदर अध्याय अभी बाकी हो सकता है।- हम अक्सर सोचते हैं कि जीवन का सबसे अच्छा समय बचपन था, जवानी थी या वह समय था जब बच्चे छोटे थे। बीते हुए समय की यादें हमें सुख देती हैं, लेकिन कभी-कभी हम उन्हीं यादों में इतने खो जाते हैं कि वर्तमान की संभावनाओं को देखना भूल जाते हैं। सच यह है कि जीवन का हर चरण अपने साथ कुछ नया लेकर आता है।
बचपन में सीखने का उत्साह होता है। युवावस्था में सपनों को साकार करने की ऊर्जा होती है। मध्य आयु में अनुभव और जिम्मेदारी होती है। और जीवन के बाद के वर्षों में हमें अपने अनुभवों को समझने, बाँटने तथा अपने मन की रुचियों को समय देने का अवसर मिल सकता है।
बेशक, उम्र के साथ शरीर की क्षमताएँ बदलती हैं। स्वास्थ्य और परिस्थितियों के अनुसार हमें अपने काम करने का तरीका भी बदलना पड़ता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में नए लक्ष्य बनाने की संभावना समाप्त हो जाती है। कभी-कभी जीवन का सबसे सुंदर अध्याय वही होता है, जिसकी हमने पहले कल्पना भी नहीं की होती।
मेरे जीवन में दादी बनने का अनुभव भी ऐसा ही एक नया अध्याय है। नन्ही-सी पोती को देखकर ऐसा लगता है, जैसे समय ने एक नया चक्र शुरू कर दिया हो। जिस परिवार को सँवारने में वर्षों लगाए, उसी परिवार में एक नई पीढ़ी का आगमन हमें जीवन के अर्थ पर फिर से विचार करने का अवसर देता है। अब मेरी जिम्मेदारियाँ पहले जैसी नहीं हैं। समय के साथ भूमिकाएँ बदलती हैं, लेकिन जीवन के प्रति उत्साह बना रह सकता है। मैं चाहती हूँ कि आने वाली पीढ़ी मुझे केवल एक ऐसी महिला के रूप में न देखे, जिसने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाईं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में भी पहचाने, जिसने उम्र के हर पड़ाव पर सीखना और आगे बढ़ना जारी रखा। मैं चाहती हूँ कि मेरी पोती जब बड़ी हो, तो उसे यह संदेश मिले कि सपनों का संबंध केवल उम्र से नहीं होता। अपने जीवन को सार्थक बनाने की शुरुआत किसी भी समय की जा सकती है।
दूसरों से नहीं, स्वयं से बेहतर बनने की होड़— आज के समय में सोशल मीडिया और समाज की प्रतिस्पर्धा ने तुलना करने की आदत को बढ़ा दिया है। हम दूसरों की उपलब्धियाँ देखते हैं और कभी-कभी अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं।
किसी ने बड़ी उपलब्धि हासिल की, किसी ने नया घर खरीदा, किसी ने प्रसिद्धि प्राप्त की—यह सब देखकर हमें लगता है कि हम पीछे रह गए। लेकिन हर इंसान की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है और हर किसी के जीवन का उद्देश्य भी अलग हो सकता है। इसलिए दूसरों की सफलता से प्रेरणा लेना अच्छी बात है, लेकिन उससे अपने आत्मविश्वास को कमजोर करना उचित नहीं। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगिता स्वयं से है। यदि आज मैं कल से अधिक धैर्यवान हूँ, अधिक संवेदनशील हूँ, अपनी गलतियों को स्वीकार करने में सक्षम हूँ और अपने विचारों को बेहतर ढंग से व्यक्त कर पा रही हूँ, तो यह भी मेरी उपलब्धि है। मुझे हर दिन दुनिया को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं कि मैं क्या कर सकती हूँ। मुझे स्वयं को यह विश्वास दिलाना है कि मैं अपनी क्षमताओं का सही उपयोग कर रही हूँ। मैं यह भी समझती हूँ कि हर दिन एक जैसा नहीं होता। कुछ दिन ऊर्जा से भरे होते हैं और कुछ दिन मन थका हुआ होता है। कभी परिस्थितियाँ साथ देती हैं और कभी हमें धैर्य रखना पड़ता है। ऐसे समय में स्वयं के प्रति कठोर होने के बजाय अपने मन और शरीर की जरूरतों को समझना चाहिए। आराम करना ठहर जाना नहीं है। कभी-कभी आगे की लंबी यात्रा के लिए रुककर स्वयं को संभालना भी आवश्यक होता है।लेकिन अस्थायी विश्राम को स्थायी हार नहीं बनने देना चाहिए।
मेरी कलम, मेरी सोच और मेरी पहचान—मेरे मन में विचारों की एक दुनिया है। रिश्तों की मिठास, बदलते सामाजिक मूल्य, माता-पिता का योगदान, बच्चों के संस्कार, बुजुर्गों का सम्मान और जीवन की अनिश्चितता—ऐसे अनेक विषय हैं, जिन पर मैं लिखना चाहती हूँ।
मेरा विश्वास है कि शब्दों में लोगों के दिल तक पहुँचने की शक्ति होती है। एक अच्छा विचार किसी को अपने व्यवहार पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है। एक सच्चा अनुभव किसी को अपनी परेशानी में अकेला महसूस होने से बचा सकता है। एक संवेदनशील लेख रिश्तों में छिपी गलतफहमियों को समझने का अवसर दे सकता है।
मैं अपनी लेखनी को इसी उद्देश्य से आगे बढ़ाना चाहती हूँ।
मैं यह दावा नहीं करती कि मेरे पास हर समस्या का समाधान है। मैं भी जीवन से सीख रही हूँ। मेरे विचार भी अनुभवों के साथ बदल सकते हैं। लेकिन मैं जो महसूस करती हूँ, जो समझती हूँ और जो सीखती हूँ, उसे ईमानदारी से शब्द देना चाहती हूँ। मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे लेख केवल पढ़े न जाएँ, बल्कि पाठकों को सोचने के लिए भी प्रेरित करें। मैं चाहती हूँ कि मेरी कलम किसी के प्रति कटुता फैलाने के बजाय संवेदनशीलता जगाए। वह लोगों को रिश्ते तोड़ने से पहले उन्हें समझने का अवसर दे। वह हमें याद दिलाए कि धन और प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन मानवीय संबंधों में सम्मान, विश्वास और अपनापन भी उतने ही जरूरी हैं। यदि मेरी लेखनी किसी एक व्यक्ति को अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी का एहसास करा सके, किसी एक परिवार में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बढ़ा सके या किसी एक महिला को अपने सपने पूरे करने का साहस दे सके, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक मानूँगी। यही मेरी पहचान बनाने की इच्छा है—दिखावे से नहीं, विचारों से; केवल शब्दों से नहीं, उन भावनाओं से जो शब्दों के माध्यम से दूसरों तक पहुँचती हैं।
अंत में—अभी बहुत कुछ करना बाकी है—जीवन की यात्रा में हम सब कभी न कभी ऐसे मोड़ पर पहुँचते हैं, जहाँ हमें लगता है कि अब बहुत कुछ बीत चुका है। लेकिन जब तक जीवन है, तब तक संभावनाएँ भी हैं।
हो सकता है कि हमारे कुछ सपने पूरे हो चुके हों और कुछ अधूरे रह गए हों। हो सकता है कि कुछ अवसर हमारे हाथ से निकल गए हों। लेकिन बीते हुए समय को वापस नहीं लाया जा सकता, जबकि वर्तमान में नए प्रयास किए जा सकते हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर सपना उसी रूप में पूरा नहीं होता, जैसा हमने सोचा था। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने जीवन को नए अर्थ नहीं दे सकते।
मैं ऊषा शुक्ला, अपने जीवन के अनुभवों को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरा प्रत्येक दिन किसी न किसी रूप में सीखने, समझने और कुछ सार्थक करने में बीते। मेरा उद्देश्य किसी से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं के अनुरूप बेहतर बनना है। मैं चाहती हूँ कि मेरे शब्द मेरी पहचान बनें और मेरे विचार किसी के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बनें। मैं जानती हूँ कि रास्ता आसान नहीं होगा। हर प्रयास को सराहना नहीं मिलेगी और हर विचार से हर व्यक्ति सहमत भी नहीं होगा। लेकिन यदि मेरा उद्देश्य स्पष्ट है और मेरी नीयत सच्ची है, तो मुझे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। आखिरकार, जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि हमने कितने वर्ष जीए, बल्कि इस बात में भी है कि उन वर्षों में हमने क्या सीखा, क्या किया और दूसरों के जीवन में क्या योगदान दिया। उम्र का बढ़ना मेरे हाथ में नहीं, लेकिन अपने अनुभवों को अपनी ताकत बनाना मेरे हाथ में है। समय को रोकना मेरे वश में नहीं, लेकिन हर दिन कुछ नया सीखना मेरे वश में है। लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, यह मैं तय नहीं कर सकती, लेकिन अपने लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़ाना अवश्य तय कर सकती हूँ। मैं जीवन से यही सीख लेकर आगे बढ़ना चाहती हूँ कि जब तक मन में जुनून है, तब तक कोई भी उम्र सपनों की सीमा नहीं बन सकती। क्योंकि मैं केवल बीते हुए कल की कहानी बनकर नहीं रहना चाहती। मैं अपने आज को सार्थक बनाना और आने वाले कल के लिए कुछ अच्छा छोड़ जाना चाहती हूँ।
मेरी मंजिल अभी बाकी है। मेरी कलम की यात्रा अभी जारी है। मेरे अनुभवों में अभी अनेक कहानियाँ छिपी हैं और मेरे मन में अभी बहुत कुछ कहने की इच्छा है।
मैं ऊषा हूँ—मेरे लिए हर सुबह एक नई शुरुआत है, हर अनुभव एक नई सीख है और हर दिन स्वयं को बेहतर बनाने का एक अवसर है। *मेरी उम्र नहीं, मेरा जुनून मेरी पहचान बने। मेरे शब्द नहीं, मेरे विचार मेरी आवाज बनें। और जब कभी मेरे जीवन की यात्रा का मूल्यांकन हो, तो यह कहा जाए कि इस महिला ने हर उम्र में जीवन को जीने के साथ-साथ उसे बेहतर बनाने का प्रयास भी किया।*यही मेरा लक्ष्य है, यही मेरा जुनून है और यही मेरी जीवन-यात्रा का अगला अध्याय है।

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