डॉ. लोहिया ने भी दिया था जिन्दा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं का नारा
रिजीम चेंज के लिए हुआ था जेपी और अन्ना आंदोलन भी, दोनों आंदोलन को था आरएसएस का समर्थन
सरकार की गलत नीतियों का विरोध करना संवैधानिक अधिकार, मोदी सरकार का विरोध क्यों नहीं ?
चरण सिंह
समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था कि जिन्दा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं तो प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने रिजीम चेंज की बात कर कौन सा अपराध कर दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रिजीम चेंज शब्द से इतना क्यों आग बबूला हैं ? क्या जेपी आंदोलन रिजीम चेंज के लिए हुआ था ? क्या अन्ना आंदोलन रिजीम चेंज के लिए नहीं हुआ था ? राजनाथ सिंह तो अपने को असली समाजवादी मानते हैं। तो फिर लोहिया का नारा क्या उन्हें याद नहीं ? चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, रक्षा राजनाथ सिंह हों, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या फिर पूर्व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ये सभी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के जमीनी संघर्ष की तारीफ करते रहे हैं। तो रिजीम चेंज शब्द से इतना बौखलाहट क्यों ?
लोहिया यही तो कहते थे कि यदि सरकार निक्क्मी हो या अराजक नीतियों के दम पर राज कर रही हो, जनता का शोषण कर रही हो। बुनियादी सुविधाएं न दे पा रही हो तो उसके समय पूरा होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। समय पूरा होने से पहले ही उखाड़ फेंक देना चाहिए। जो जनता सरकार बनवाती है वह उखाड़ भी फेंक देती है। दरअसल प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण भूषण ने दिल्ली प्रेस क्लब में सीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में रिजीम चेंज करने की बात क्या कर दी कि बीजेपी में खलबली मच गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद मोर्चा संभाला और कहा कि कांग्रेस अपने समर्थक दलों के साथ मिलकर देश में अराजकता फैलाना चाहती है। हर सरकार आंदोलनकारियों को अराजक तत्व बोलती है। पुराने समाजवादी राजकुमार जैन अक्सर अपने लेख में लिखते हैं कि जब वे लोग चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में आंदोलन कर रहे थे तो चरण सिंह ने उन्हें अराजक बोला था। जब इमरजेंसी लगी तो चरण सिंह भी जेल में बंद थे। तब राजकुमार जैन ने चरण सिंह से कहा था कि अब तो आप भी इंदिरा गांधी की नजरों में अराजक हैं।
मोदी सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त से जिसका वोट चाहे बनवा दे जिसका चाहे कटवा दे। चुनाव आयुक्त को सेफ करने के लिए कोई मामला दर्ज न होने का कानून बना दे। फॉर्म 6 में चुनाव आयुक्त मनमानी कर बदलाव कर दे। सुप्रीम कोर्ट की अनुमति की बात कर जनता को भ्रमित करे। सुप्रीम कोर्ट किसी तरह की अनुमति न देने की बात कर चुनाव आयुक्त को झुठला दे। शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र का कबाड़ा कर दिया जाए। बेरोजगारी और महंगाई चरम पर हो। लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्रों को कब्जा कर सत्ता को बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे। सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज को डंडे के दम पर दबाया जाए पर कोई रिजीम चेंज की बात न करे। सत्ता परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यूपीए की सरकार गई तभी तो एनडीए की सरकार बनी थी न ?
दरअसल बीजेपी की नीतियां अंग्रेजी हुकूमत जैसी हैं। जिस प्रकार से अंग्रेज 144 धारा लगाकर आंदोलन को कुचलने का प्रयास करते थे। ठीक उसी तरह से बीजेपी सरकार 163 धारा लगाकर आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रही है। अंग्रेजी हुकूमत भी क्रांतिकारियों को तमाम यातनाएं देती थी। ठीक उसी यह सरकार भी दमन का रास्ता अख्तियार कर आंदोलनकारियों को पिटवा रही है। सरकार को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि आंदोलन को दबाने का जितना प्रयास होता है आंदोलन उतना ही मजबूती से उभरता है। दरअसल जिस अंदोलन के दम पर देश आज़ाद हुआ। जिस आंदोलन के दम पर शासकों की तानाशाही निकाली जाती रही है। उस आंदोलन से बीजेपी का घबराना स्वभाविक है।
गत दिनों इंडियन एक्सप्रेस की मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पोल खोल खबर ने स्पष्ट कर दिया कि बीजेपी को जितवाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव में धांधली करते रहे। प. बंगाल के 27 लाख वोट कटना इसका इसका प्रमाण माना जाता है।
प्रधानमंत्री आंदोलन को लेकर कह रहे रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए लोगों का दिल जितना पड़ता है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्रों को कब्जाकर जनता को भ्रमित करने को क्या दिल जितना कहा जा सकता है ? क्या मेन स्ट्रीम मीडिया के दम पर सरकार जनता को अपने मतलब ख़बरें नहीं परोस रही है ? क्या सरकार की गलत नीतियों को लेकर ख़बरें चलाने और लिखने वाले पत्रकारों को नौकरी से निकाला नहीं जा रहा है ? क्या आंदोलनकारियों के दमन की ख़बरों को रोकने के लिए स्वतंत्र पत्रकार टारगेट नहीं किये जा रहे हैं ? यदि यह सब हो रहा है तो फिर रिजीम चेंज बनता है।







