पटना: दो कारणों से आरक्षण फिर चर्चा में है। पहला कारण, दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण में सुधार के लिए प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि आर्थिक आधार हो। एक परिवार, एक आरक्षण की नीति लागू हो। अगर कोई छात्र आरक्षण का लाभ लेकर IAS बन जाता है तो उसकी संतान को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाए। दूसरा कारण, संविधान सुधार आंदोलन के खिलाफ बिहार में सबसे पहले आवाज बुलंद की केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने।
उन्होंने कहा, आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है और इसे दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती। इसी बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा ने बिहार में 65 फीसदी आरक्षण लागू करने की मांग कर दी।
आरक्षण और वोट बैंक की चिंता
चिराग पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा दोनों ही NDA का हिस्सा हैं। इसलिए आरक्षण पर भाजपा के सामने एक विकट स्थिति उत्पन्न हो गयी है। विरोधी दल राजद अब भाजपा पर दबाव बना सकता है कि वह आरक्षण पर अपनी नीति और स्थिति स्पष्ट करे। 2023 में जब नीतीश कुमार राजद के साथ सरकार चला रहे थे तब जातीय सर्वे कराया था। इस सर्वे के आधार पर बिहार में आरक्षण का दायरा 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी कर दिया गया था।
अगर इसमें EWS का 10 फीसदी आरक्षण जोड़ दिया जाए तो बिहार में आरक्षण की व्यवस्था कुल 75 फीसदी हो जाएगी। लेकिन 2024 में पटना हाईकोर्ट ने 65 फीसदी आरक्षण को यह कह कर रद्द कर दिया था कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गयी सीमा 50 फीसदी से अधिक है। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
आरक्षण सुधार आंदोलन
जब जुलाई 2026 में नीट आंदोलन के समय परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता पर बहस चल रही थी उसी समय सामान्य वर्ग के कुछ छात्रों ने योग्यता बनाम जातिगत आरक्षण का मुद्दा उठाया। इसके बाद कुछ डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स और छात्रों ने सोशल मीडिया पर रिजर्वेशन रिफॉर्म आंदोलन अभियान चलाया। उन्होंने @reservationhataomovment के यूजरनेम से एक इंस्टाग्राम हैंडल बनाया और उस पर रिल्स और वीडियो डाल कर आरक्षण के आर्थिक आधार की वकालत करने लगे। इसके बाद योग्यता बनाम जातिगत आरक्षण पर चर्चा होने लगी।
आरक्षण सुधार आंदोलन का विस्तार
सामान्य वर्ग के जिन छात्रों को हाई कट ऑफ के कारण सरकारी नौकरी मिलने में दिक्कत हो रही थी या उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिल पा रहा था, वैसे छात्रों के लिए यह इंस्टाग्राम हैंडल एक बड़ा मंच बन गया। वे खुल कर अपनी हताशा और गुस्से का इजहार करने लगे। जुलाई के अंतिम सप्ताह में जैसे ही यह इंस्टाग्राम हैंडल लॉन्च हुआ सिर्फ 8 घंटे में 10 लाख फॉलोअर्स जुड़ गये। पांच दिनों में यह आंकड़ा 46 लाख के पार हो गया। अब फॉलोअर्स की संख्या 60 लाख पार हो गयी है। जब इस ऑनलाइन अभियान का प्रचार-प्रसार बढ़ गया तो @reservationhataomovment की तरफ से 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर एक दिन के शांतिपूर्ण सत्याग्रह का आह्वान किया गया।
अब किस स्थिति में है यह आंदोलन
दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर इस आंदोलन की मंजूरी नहीं दी थी। इसलिए वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये थे। बैरिकेडिंग लगायी गयी थी। धारा 144 लागू होने का बाद भी आंदोलनकारी छात्र वहां जुटे। पुलिस ने छात्रों को पीछे हटाने के लिए बल प्रयोग भी किया। कई छात्रों का पुलिस ने हिरासत में ले लिया। कुछ छात्र घायल भी हुए।
लेकिन पुलिस के इस बल प्रयोग की कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। जब कि जुलाई में इसी स्थान पर पुलिस की कार्रवाई पर पूरे देश में आक्रोश पैदा हो गया था। फिलहाल यह आंदोलन अभी सड़कों पर नहीं है लेकिन इसका डिजिटल अभियान जारी है। इस आंदोलन का सबसे बड़ा प्रभाव ये है कि अब लोग आरक्षण के नफा -नुकसान पर चर्चा करने लगे हैं। पहले यह एक वर्जित विषय था।
क्या आरक्षण समीक्षा की बात करना गुनाह है ?
क्या आरक्षण समीक्षा की बात करना गुनाह है ? कानूनी और संवैधानिक रूप से तो नहीं लेकिन राजनीतिक रूप से यह सबसे बड़ा गुनाह है। लोकतंत्र संख्या बल का खेल है। जिस जाति-समुदाय की संख्या सबसे अधिक, उसी का बोलबाला। जिनकी संख्या कम, उसकी ताकत कम। चूंकि आरक्षण जाति-वर्ग के आधार पर मिलता है इसलिए यह बहुसंख्यक वर्ग (पिछड़ा वर्ग) का सर्वोपरि हित है।
चूंकि चुनावी राजनीति में कम आबादी वाली जातियां (सवर्ण) गौण हैं इसलिए जब वे आरक्षण समीक्षा की बात करती हैं तो उसे राजनीतिक रूप से अपराध मान लिया जाता है। इसलिए बिहार समेत देश की राजनीति में आरक्षण में सुधार की बात करना एक वर्जित विषय है। चूंकि राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने के लिए बहुसंख्यक वर्ग के वोटों की जरूरत होती है इसलिए वे आरक्षण समीक्षा पर चर्चा करने से बचते और डरते हैं।
विरोधी बताओ और चुनाव जीत लो
मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में अगर किसी व्यक्ति ने या दल ने आरक्षण प्रणाली की समीक्षा की बात कर दी तो उसे पिछड़ा और दलित विरोधी मान लिया जाता है। फिर यह नैरेटिव सेट कर दिया जाता है कि फलां व्यक्ति या फलां दल पिछड़ा और दलित विरोधी है, आरक्षण विरोधी है। फिर तो चुनाव में उस दल का काम तमाम हो जाता है। जैसे 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान दिया था जिसमें आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की बात कही थी।
राजद प्रमुख लालू यादव ने मोहन भागवत के इस बयान को लपक लिया। हालांकि मोहन भागवत ने केवल समीक्षा की बात कही थी लेकिन लालू यादव ने प्रचारित कर दिया कि संघ और भाजपा, आरक्षण खत्म करने की बात कर रहे हैं। इसके बाद चुनाव का सीन बदल गया और भाजपा बुरी तरह चुनाव हार गयी।
माहौल बदलने की शुरुआत हो गयी है?
अब भारत का कोई भी राजनीतिक दल, आरक्षण व्यवस्था में समीक्षा या सुधार की बात नहीं कर सकता क्योंकि उसके मन में चुनाव हारने का डर बैठ चुका है। लेकिन @reservationhataomovment ने इस माहौल को बदलने की शुरुआत कर दी है। डिजिटल क्रांति ने अब आंदोलनों के स्वरूप को बिल्कुल बदल दिया है। अब मोबाइल की स्क्रीन से ही क्रांति का सूत्रपात हो रहा है। आरक्षण के मामले में अदालत की राय है? मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने मौखिक रूप से एक सवाल पूछा था, अगर माता-पिता दोनों IAS हैं तो
उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? अगर सक्षम होने बाद भी पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार आरक्षण का लाभ लेता रहेगा तो समाज कभी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएगा। नये आंदोलन ने भी इसी सवाल को प्रमुखता से उठाया है।








