शिष्टाचार या फिर कुछ और है नीतीश कुमार का मोदी के पैरों की ओर बढ़ना ?

चरण सिंह 

हमारे देश में पैर छूना शिष्टाचार के दायरे में आता है। पर देखा यह भी जाता है कि क्या पैर शिष्टाचार के चलते छुए जा रहे हैं या फिर किसी स्वार्थवश। या फिर नीतीश मोदी की चाटुकारिता तो उतर आए हैं। क्या नीतीश कुमार पहले से ही नरेंद्र मोदी के पैर छुते रहे हैं ? नीतीश कुमार के पैर छूने की बात इसलिए हो रही है क्योंकि एनडीए के संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद नीतीश कुमार ने मोदी को अपनी पार्टी की ओर समर्थन देते हुए जो भाषण दिया उसकी लोग चर्चा नहीं कर रहे हैं बल्कि इस बात की चर्चा ज्यादा हो रहा है कि भाषण देने के बाद जब वह अपनी कुर्सी पर बैठने जा रहे थे तो उन्होंने नरेंद्र मोदी के पैर छूने का प्रयास किया। हालांकि नरेंद्र मोदी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

क्या नीतीश कुमार पहले भी नरेंद्र मोदी के पैर छुते रहे हैं। यदि नहीं तो अब जब उनकी पार्टी सरकार को बनाने और गिराने की स्थिति में है। ऐसे में उनका मोदी के पैर छूने के लिए हाथ बढ़ाना चाटुकारिता के अलावा कुछ नहीं माना जाएगा। जदयू एनडीए का घटक दल है तो निश्चित रूप से सरकार बनने पर नीतीश कुमार को खुशी ही हुई होगी। पर क्या नरेंद्र मोदी के पैर छूने के लिए उनके हाथ बढ़ाने को उनका कद घटना नहीं कहा जाएगा। इससे पहले भी वह नरेंद्र मोदी के रोड शो में अपने हाथ में कमल का लिए हुए थे। नीतीश कुमार ने ही मंच से नरेन्द्र मोदी को फिर से मुख्यमंत्री कह दिया था।
देखने की बात यह है कि एक और नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के पैर छू रहे हैं और दूसरी ओर उनके प्रवक्ता केसी त्यागी अग्निवीर योजना पर फिर से विचार करने की बात कर रहे हैं। क्या यह सब मंत्री पद के लिए हो रहा है ? जबकि जगजाहिर है कि अग्निवीर योजना नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है। क्या नरेंद्र मोदी अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को ऐसे ही जाने देंगे ? क्या इस सरकार में नीतीश कुमार चुप रहकर सरकार का मजा लूटना चाहेंगे या फिर बीच बीच में तेवर भी दिखाएंगे ?

इसमें दो राय नहीं कि किसी समय नीतीश कुमार को नरेंद्र का बड़ा विरोधी माना जाता था। यही वजह रही कि 2009  के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को बिहार में नहीं घुसने दिया था। २०१० के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को प्रचार करने नहीं दिया था। जब नरेंद्र मोदी को 2014  के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया गया तो नीतीश कुमार उखड़ गए और उन्होंने एनडीए से नाता तोड़कर अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 2014  के लोकसभा में नीतीश कुमार ने भारी नुकसान उठाया।

2015  के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया और बिहार में सरकार बनाई। 2017  में वह फिर से एनडीए में आ गये और 2019  के लोकसभा चुनाव में 16  सीटें पाई। 2020  के लोकसभा चुनाव में भले ही नीतीश कुमार का प्रदर्शन खास न रहा हो पर वह मुख्यमंत्री बने। 2022  में नीतीश कुमार राजद के साथ आ गये। 2024  के लोकसभा चुनाव के लिए नीतीश कुमार ने ही मोदी सरकार के खिलाफ इंडिया गठबंधन की शुरुआत की थी। वह बात दूसरी है कि आज की तारीख में नीतीश कुमार उन्हीं मोदी की सरकार का हिस्सा बनने जा रहे हैं, जिन मोदी को नीतीश पानी पी पीकर कोसते थे। अपने देखना यह होगा कि नीतीश कुमार अपने को कैसे सिद्ध कर पाते हैं।

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