इसके अलावा एक तरफ अमेरिका पर युद्ध के दौरान पड़ा आर्थिक बोझ है, तो दूसरी तरफ ईरान भी किसी तरह से पीछे हटने को तैयार नहीं है। सहयोगी देशों ने भी उनका साथ देने से साफ इनकार कर दिया है, इनमें फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन जैसे नाटो सदस्य देश शामिल हैं। इसके अलावा लगातार अमेरिका का मिसाइल भंडार भी कम हो रहा है. अमेरिका इस युद्ध में रोजाना 1 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। पांचवे हफ्ते में ही इस युद्ध में अमेरिका के मंसूबों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
भले ही ट्रंप ने 2 अप्रैल को दी अपनी स्पीच में जंग खत्म न होने की बात साफगोई से कही हो, और कहा हो कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी जारी है, लेकिन अमेरिका युद्ध में हर मोर्चे पर कमजोर पड़ता हुआ दिख रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा है कि हम अपने टारगेट को पूरा करने के लिए अभियान जारी रखेंगे। अमेरिका अपने सभी लक्ष्य को जल्द पूरा करने की राह पर है. इसके अलावा उन्होंने आने वाले हफ्तों ईरान पर कड़ा प्रहार करने की धमकी दी है. साथ ही कहा है कि वह ईरान को वापस पाषाण युग (Stone Age) में ले जाएंगे. जहां वे वास्तव में थे।
ईरान की ‘ढाई चाल’ जिसमें अमेरिका पूरी तरह घिर गया?
ईरान पर अमेरिकी और इजरायल की तरफ से 28 फरवरी को की गई संयुक्त कार्रवाई में भले ही देश ने सुप्रीम लीडर को खो दिया था, लेकिन उसके बाद खामेनेई के लड़ाकों ने हर कदम फूंक-फूंककर रखा. सबसे पहले ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने वाले जहाजों पर रोक लगाते हुए, रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया था. इससे वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति पर असर पड़ा, और पूरी दुनिया की लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा गई. दुनिया में तेल आपूर्ति का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रमुख रास्ता है. इस स्थिति में ईरान ने मित्र देशों जिनमें भारत, रूस, चीन शामिल हैं, उनके लिए इस रास्ते को बंद नहीं किया. वहीं दुश्मन देशों के लिए इस रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया. इस रास्ते से लगभग 20% तेल दुनिया के देशों में भेजा जाता है. ईरान ने इस रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की भी घोषणा की है।
अमेरिकी कार्रवाई से खाड़ी देशों में हड़कंप, बढ़ा सुरक्षा का खतरा








