10 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने इंडिगो एयरलाइंस के उड़ान रद्दीकरण संकट पर केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेदेला की बेंच ने जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान सवाल दागे कि “आप इतने समय से क्या कर रहे थे? ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होने दी?” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह केवल यात्रियों की परेशानी का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान और सिस्टम की नाकामी का मामला है।
संकट का पृष्ठभूमि
1 दिसंबर से अब तक इंडिगो ने 4,000 से अधिक उड़ानें रद्द कीं, जिससे लाखों यात्री एयरपोर्ट पर फंस गए।
इससे हवाई किराए में भारी उछाल आया: पहले 5,000 रुपये में मिलने वाले टिकट अब 30,000-40,000 रुपये तक पहुंच गए।
कोर्ट ने अन्य एयरलाइंस पर सवाल उठाए कि संकट के बीच उन्होंने किराया इतना बढ़ाकर “पाउंड ऑफ फ्लेश” (अनुचित लाभ) कैसे वसूला? डीजीसीए (DGCA) पर कार्रवाई न करने का भी आरोप लगाया।
कोर्ट के मुख्य सवाल
यात्रियों की मदद के लिए क्या कदम उठाए गए? एयरपोर्ट पर फंसे लोगों को संभालने के इंतजाम कैसे किए?
मुआवजे के लिए क्या कार्रवाई हुई? एयरलाइन स्टाफ को जिम्मेदार बनाने के उपाय क्या हैं?
ऐसी स्थिति अचानक क्यों पैदा हुई, और दूसरी एयरलाइंस को फायदा उठाने की इजाजत कैसे मिली?
कोर्ट के निर्देश
कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को निर्देश दिया कि एयरपोर्ट पर फंसे इंडिगो यात्रियों को तुरंत मुआवजा देने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। साथ ही, स्वतंत्र न्यायिक जांच और प्रभावित यात्रियों को राहत प्रदान करने की मांग पर आगे सुनवाई तय की गई।
सरकार की प्रतिक्रिया
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि एक मजबूत फ्रेमवर्क मौजूद है और सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। उन्होंने बताया कि फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट (FDTL) नियमों को लागू करने का लक्ष्य लंबे समय से था, लेकिन एयरलाइन ने जुलाई और नवंबर में विस्तार मांगा था। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने डीजीसीए के कामकाज सहित जांच का ऐलान किया, यात्रियों से माफी मांगी और कड़ी कार्रवाई का वादा किया। सरकार ने किराए पर सीमा तय कर दी है, जो एक सख्त नियामकीय कदम है।








