ईरान के छात्रों की जान बचाने के कारण 6 महीने ‌ जेल की सजा मुझे मिली

प्रोफेसर राजकुमार जैन

2 फरवरी, 1978 को ईरान का ‌राजा मोहम्मद रज़ा पहलवी भारत के दौरे पर दिल्ली आया हुआ था। उनके खिलाफ दिल्ली‌ यूनिवर्सिटी, जे.एन.यू. के छात्रों ‌ के साथ-साथ हिंदुस्तान में पढ़ने वाले ईरानी छात्रों ने भी कनॉट प्लेस में‌ उसके खिलाफ प्रदर्शन‌ करते हुए नारे लगाए थे। ईरान का‌ राजा निरंकुश तानाशाह था। दिल्ली‌ यूनिवर्सिटी तथा ‌ जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ 16 ईरानी छात्रों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के‌ छात्रों की जमानत के लिए गया हुआ था। ईरानी छात्रों की जमानत देने वाला वहां कोई नहीं था। अगर उऩकी जमानत न होती तो सूची बना कर तिहाड़ जेल भेज दिए जाते तथा वापस ईरान जाते, तो राजा का अमानुषिक अत्याचारी ‌ शासन ‌ हमेशा की तरह उन्हें हवाई अड्डे पर ही गोली मारकर हत्या कर सकता था। कानून की धारा 110/111 तथा 112/117 में गिरफ्तार 16 ईरानी छात्रों की जमानत मैंने ले ली। उन छात्रों ने अपने नाम और पते गलत लिखवा‌ दिए। मैं दिल्ली विधानसभा का सदस्य तथा मुख्य सचेतक था।

ईरान में तख्ता पलट जाने पर ‌ अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी ‌ शासन आ जाने पर ‌ ईरानी छात्र वापस ईरान चले गए परंतु केस चलता रहा। 1980 में जज ने जमानती के रूप में जुर्माना न भरने के आरोप में शुरू में आठ साल की सजा मौखिक रूप से मुझे अदालत में सुनाई, परंतु जब मैंने कहा की में नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला तथा सिद्धांततः जुर्माना न भरने पर तथा मेरा केस‌ ‌ मशहूर वकील बी.एम. तारकुंडे, आर.के.गर्ग, प्राणनाथ लेखी बिना फीस के लड़ेंगे तो जज ने डर के मारे 6 महीने की सजा देकर तिहाड़ जेल भिजवा दिया। 31 मार्च 1984 को समाजवादी नेता मधु लिमए को सायंकाल इसका पता चला, उनकी एक आंख पर पट्टी बंधी हुई थी, उन्होंने तभी हाथ से हैवियस कार्पस तैयार कर रात्रि 9 बजे भारत के मुख्य न्यायधीश यशवंत राव चंद्रचूड़ के निवास स्थान पर मशहूर सुप्रीम कोर्ट की वकील नित्या रामकृष्णन के हाथों उनके घर पर भिजवा दी।

मुख्य न्यायाधीश ने मधु जी के कानूनी नुक्तों को देखकर अगले दिन के लिए ‌ सुप्रीम कोर्ट में केस लगा दिया। अगले दिन मुख्य न्यायाधीश यशवंत राव चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति आर.एस. पाठक, न्यायमूर्ति वी. खालिद की पीठ के सामने मेरे केस की सुनवाई हुई। मधु जी ने सुप्रीम कोर्ट में अपने मित्र की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की रक्षा पर बहस की। मुख्य न्यायधीश का चैंबर वकीलों से भरा था। मधु लिमये के तर्कों को सुनकर कोर्ट में सन्नाटा छा गया। कोर्ट के आदेश से मेरी रिहाई हो गई।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में‌ पर्शियन ‌‌‌ विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर चंद्रशेखर शर्मा को ‌ घटनाक्रम का पता चला‌ वे ‌ ईरान में शिक्षण,‌ अनुसंधान ‌ के संदर्भ में ‌ विजिटर प्रोफेसर के रूप में जाते रहते थे, ‌ वहां की सरकार को इस संदर्भ में ‌ उन्होंने सूचित किया। प्रोफेसर चंद्रशेखर ने मुझसे कहा कि आपका ईरान में रेड कारपेट स्वागत करने का ‌ आयोजन है। मैंने विनम्रता पूर्वक कहा, कि मैंने नागरिक आजादी के लिए‌ केवल अपने फर्ज की अदायगी की थी,‌ इस आदर सत्कार के लिए‌ उनका शुक्रगुजार करते हुए अपनी असमर्थता प्रकट कर दी।

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