अनुभूतियों को रख दिया है मैंने
एक ताक़ में ज़िलेदान में लपेटकर
वह फिर से बाहर न निकलें
उनपर रख दिया है भारी पत्थर
एक वक़्त था जब मैं शुन्य थी
मेरे पास नहीं था अहसासात का बैंक खाता
धीरे धीरे मैं शब्दों के क़रीब पंहुची
मेरी स्मृति में शब्दों का भंडार होने लगा
दृश्यों ने मेरे भीतर अनुभूतियों को जन्म दिया
मेरी शुन्यता डीज़िट में बदल गई
मैं अनुभूतियों की सेठानी बनती जा रही थी
बड़ी अल्पायु थी इस अमीरी की
संयम रखना है अब फीलिंग की आउटिंग पर
एहतियात से काम लेना है
इतने समय जो जमाखोरी की थी
सब यूज़लेस है अब
ज़ंग लगता जा रहा है सरंक्षण पर
बदबू आने लगी है ज़िलेदान से
बस एक अनुभूति शेष है मेरे पास
जिसे मैं फ्लैशबैक में जाकर स्पेंड करती हूं
ज़िन्दगी की जमा-पूंजी लगी थी
विदाई समारोह में
कितनी भव्य एंट्री थी जीवित आत्मा की मुर्दाघर में
– मेहजबीं








