इंसानियत अभी भी ज़िंदा हैं

 ऊषा शुक्ला

इंसानियत अभी ज़िंदा है” एक वाक्यांश है जिसका अर्थ है कि मानवीय प्रेम, दया और सहानुभूति अभी भी जीवित है। यह दुनिया में घृणा, नफरत और हिंसा के बावजूद लोगों की मानवता पर भरोसा जताता है. यह बात उन दिनों की है जब मैं सिल्चर असम में कॉलेज में पढ़ती थी और ट्रेन से घर की तरफ़ मीसामारी आर्मी कैट में आ रही थी अचानक रास्ते में ट्रेन ख़राब हो गई और ऐसा सुना जाने लगा कि अगले सात घंटे देर से चलेगी । मैंने सोचा कि इतनी देर तक कैसे बैठूँ। पता नहीं क्यों सड़क जानी पहचानी सी लगी। और मैं ट्रेन से उतर कर अपने घर की तरफ़ चल पड़ी। पर शायद मैं ग़लत रास्ते पर आ गई थी , सब सड़कें एक जैसी दिखती है । काफ़ी दूर तक कुछ नहीं दिखाई दे रहा था और मैं चलती जा रही थी । भगवान का नाम लेते हुए चलती जा रही थी , चलती जा रही थी पर कुछ नहीं दिख रहा था यहाँ तक कि एक आदमी भी नहीं दिख रहा था। अब दिल घबराने लगा । मुझे समझते देर नहीं लगी कि मैं ग़लत रास्ते पर अनजान जगह आ गईं हूँ और यहाँ से वापस जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। तभी दूर एक छोटी सी साइकिल पंचर की दुकान दिखाई दी । जान में जान आयी पर डर भी लगा ।किसी की नियत पर विश्वास करने का समय तो था ही नहीं। फिर भी हिम्मत जुटाकर मैंने अपने घर का रास्ता पूछा कि क्या यह रास्ता “मिसामारी” जाता है। पंचर वाले ने कहा कि मैं उल्टी दिशा में क़रीबन तीस किलोमीटर दूर जा चुकी हूँ । मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूँ? मैं यहाँ वहाँ घबराकर देख रही थी और वह कमउम्र पंचरवाला भी मेरे पास खड़ा रहा तभी सामने से एक ऑटो आता दिखाई दिया। पंचर वाले ने मुझे फिर वापस सिल्चर तक ले जाने के लिए ऑटो से कहा पर ऑटो वाले ने जितने पैसे माँगे उतने पैसे मेरे पास नहीं थे। तब साइकिल पंचर वाले नें अपने पास से पैसे आटो वाले को देकर मुझे आटो में बिठा दिया और कहा कि मैं वापस सिल्चर पहुँच कर वहाँ से बस में बैठ जाओ और अपने मीसामारी पहुँच जाओगे। मैंने भी ऐसा ही किया क्योंकि मेरे पास इसके सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था। मैं ऑटो में बैठ गई , रास्ते भर डरती नहीं ।ऑटो मुझे कहीं और ना ले जाए क्योंकि मैं कभी ऑटो में बैठी नहीं थी। फौज़ी गाड़ियों में जाने के कारण अकेले चलने की आदत थी ही नहीं। पर उस भले मानुस ने मुझे सिलचर तक पहुँचा दिया और मैंने वहाँ से बस पकड़ी और घर पहुँच गई। अपने मम्मी पापा को मैंने सारी घटना बतायी उन्होंने भगवान को बहुत धन्यवाद दिया कि मैं सकुशल घर पहुँच गई ।मेरे मम्मी पापा ने उस साइकिल पंचर वाले को बहुत दुआ दी और अगले दिन मेरे पापा मुझे लेकर उसे पंचर वाले की दुकान पर फ़ौजी गाड़ी से ढूंढते हुए पहुँचे। पर वहाँ कोई पंचर की दुकान थी ही नहीं। बहूत दूर तक हम लोग उस पंचर वाले को ढूंढते रहे। मेरे पापा को उस पंचर वाले का पैसा लौटाना था और उसे धन्यवाद देना था पर उस सड़क पर कोई पंचर की दुकान थी ही नहीं। वह भला आदमी शायद उसी दिन आया होगा और पेड़ के नीचे पंचर की दुकान खोलने बैठ गया होगा शायद उसे भगवान ने मेरी मदद करने के लिए भेजा था।
अगर कोई इंसान थकावट, तनाव या ज्यादा शराब के कारण सड़क पर गिर जाए,।तो वहां का माहौल अलग होता है।ना कोई फोटो वायरल होती है, ना कोई मज़ाक उड़ाया जाता है। ना कोई शर्मिंदगी, ना कोई ताना। बल्कि, आप देखेंगे कि उसके पास एक छोटी सी पानी की बोतल रखी होती है । चुपचाप, बिना किसी नाम या नोट के। सिर्फ एक अनजाने इंसान का छोटा-सा ख्याल। ये पुलिस या डॉक्टर नहीं रखते –बल्कि आम लोग, जो रास्ते से गुजरते हैं।यह वाक्यांश हमें याद दिलाता है कि दुनिया में बुराई और दुखों के बावजूद, मानवता की शक्ति अभी भी जीवित है और हमें उम्मीद बनाए रखने और अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। यह वाक्यांश उन लोगों की कहानियों या कार्यों के बारे में बात कर सकता है जो दूसरों की मदद करते हैं, भेदभाव से लड़ते हैं, या शांति स्थापित करने की कोशिश करते हैं।वो लोग जो समझते हैं कि कभी-कभी हम सब थक जाते हैं, टूट जाते हैं।और ऐसे वक्त में, जो सबसे ज़रूरी होता है – वो है थोड़ी सी करुणा। जापान में दफ्तर के बाद दोस्तों और सहकर्मियों के साथ शराब पीना आम बात है।मीटिंग्स से बातें शुरू होती हैं, फिर खाना, और फिर देर रात तक साथ बैठना।लेकिन जहां कई जगहों पर ऐसे हालात में लोग मज़ाक बन जाते हैं, जापान में लोगों की नज़र में दया होती है।ये कोई दिखावा नहीं है – ये उनकी संस्कृति का हिस्सा है।शहर की चाल में बसी संवेदनशीलता है।एक-दूसरे का ख्याल रखने की आदत – चुपचाप, बिना शोर के। ये सिर्फ पानी या हैंगओवर की बात नहीं है।ये छोटा-सा काम एक बड़ा संदेश देता है –कि हम सब कभी न कभी कमजोर पड़ते हैं,लेकिन हर किसी में यह ताकत होती है – दूसरों के लिए अच्छा करने की। दूसरों की नि स्वार्थ मदद करने की।

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