ऐसे कैसे सरकार बनाएगा इंडिया?

चरण सिंह

भले ही लोकसभा चुनाव में एनडीए को बहुमत मिल गया हो पर चुनाव परिणाम ने एग्जिट पोल को सिरे से नकार दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में तो एग्जिट पोल की धज्जियां ही उड़ा दी। बीजेपी को बहुमत न मिलना ही विपक्ष की जीत है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन ने प्रेस कांफ्रेंस कर संकेत दे दिया कि वे लोग सरकार बनाने जा रहे हैं। राहुल गांधी ने जिस तरह से कहा कि उन्होंने जो वादे जनता से किये वे सभी पूरे करेंगे। मतलब वे लोग सरकार बनाने जा रहे हैं। बुधवार को इंडिया गठबंधन की बैठक हो रही है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने नये सहयोगी दलों के जुड़ने की बात भी कही। मतलब एनडीए से टूटकर भी कुछ दल इंडिया गठबंधन के साथ आ सकते हैं। दरअसल एनडीए में भी कई दल ऐसे हैं जो प्रधानमंत्री की तानाशाही से नाराज हैं। खुद भाजपा के भी कई नेता हैं जो नहीं चाहते कि मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनें। ऐसे मे देखना यह होगा कि जब एनडीए के बहुमत हासिल कर लिया है तो इंडिया गठबंधन सरकार कैसे बनाएगा ? ाहालांकि यह चुनाव विपक्ष ने नहीं बल्कि जनता ने लड़ा है। इन चुनाव में जनता जीती है और सभी पार्टियां हारी हैं। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। जनता ने न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष को भी अपनी ताकत का एहसास कराया है। बीजेपी के लिए तो यह बड़ा सबक ही है कि जिस उत्तर प्रदेश का हवाला बीजेपी के नेता दूसरे प्रदेशों में देते थे उसी उत्तर प्रदेश में पार्टी ने मुंह की खाई है। योगी आदित्यनाथ का बुल्डोजर लोगों ने नकार दिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में सफलता पाई है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह सब जनता की नाराजगी का फायदा इन नेताओं को मिला है। सबसे बड़ा उदाहरण तो नगीना से चंद्रशेखर आजाद का इंडिया गठबंधन ने टिकट नहीं दिया आजाद अपनी पार्टी आजाद समाज पार्टी से चुनाव लड़े और पर्चा भरने से लेकर चुनाव परिणाम तक उन्होंने चुनाव में बढ़त ही बनाई और अंतत जीत दर्ज की। कहा जा सकता है कि लोग आंदोलनकारी नेता को पसंद करते हैं।
एनसीपी मुखिया शरद पवार के डीटीपी मुखिया चंद्रबाबू नायडुु, उड्रीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात करने की की बात सामने आ रही है। वह बात दूसरी है कि उन्होंने इस वार्ता से इनकार किया है। जानकारी यहां तक मिल रहंी है कि नीतीश कुमार को उप प्रधानमंत्री तो चंद्र बाबू नायडू को विशेष राज्य के दर्जे का ऑफर दिया गया है। राजनीति में कुछ भी हो सकता है। यह तो कंफर्म है कि इस बार न तो केंद्र सरकार मनमानी कर पाएगी और न ही सत्ता पक्ष और विपक्ष लापरवाह हो पाएगा। दोनों ओर के नेताओं को जनता ने अपनी ताकत का एहसास कराया है।
इंडिया गठबंधन को तो जनता का एहसान मानना चाहिए क्योंकि जिस तरह से जनता ने वोट दिया है उसकी उम्मीद खुद उन्हें ही नहीं होगी। सरकार से नाराजगी का फायदा विपक्ष को मिला है। जनता ने इन चुनाव में मजबूत विपक्ष दिया है। विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए जमीनी मुद्दे संसद में उठाने होंगे। दरअसल जिस तरह से प्रधानमंत्री ने स्तर से गिरकर भाषण दिये, जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के घोषणा पत्र का हवाला देते हुए मंगलसूत्र तक का नाम ले लिया, उससे लोगों में मोदी के प्रति नाराजगी देखने को मिली। ऐसे ही यदि राहुल गांधी को छोड़ दें तो विपक्ष के नेताओं का संघर्ष जमीन पर दिखाई नहीं दिया। यह जरूर कहा जा सकता है कि चंद्रशेखर आजाद संसद में दलितों की समस्याओं को उठाते दिखेंगे। पश्चिमी बंगाल में भले ही एग्जिट पोल टीएमसी को कम आंक रहे थे। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से अपने को साबित किया है। राहुल गांधी के संघर्ष का फायदा कांग्रेस को मिलता दिखाई दिया। दक्षिण में कांग्रेस को उतनी बढ़त नहीं मिली जितनी उम्मीद की जा रही थी।

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