दहशत, तबाही- बर्बादी का आलम कब तक चलेगा?

प्रोफेसर राजकुमार जैन 

अमेरिका- ईरान, इस्राइल‌ -अरब, रूस -यूक्रेन ‌ जंग में आधुनिक हथियारों, बमवर्षको, ड्रोन, मिसाइल, आणविक हथियारों की मार से पश्चिम एशिया की धरती इंसानी खून तथा‌ जीवन रेखा को चलाने वाले ईंधन, अन्न, संयंत्रों, इमारतों, उत्पादन केन्द्रों, तेल पेट्रोल गैस जैसे आधुनिक जीवन आवश्यक ‌ द्रव्यों, प्रयोगशालाओं को ‌ नेतनाबूस्त करने में लगा है। इससे ‌ पैदा जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक आपदा ‌ का सामना ‌ इंसानों को करना होता है। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत हमास के द्वारा‌ इस्राइल पर हमले से शुरू हुई‌,‌ परंतु इस युद्ध का असली गुनहगार अमेरिका ही है जो दूसरों मुल्को की‌ दौलत और आजादी दोनों पर अपना ‌ कब्जा बनाए रखने की फ़िराक में लगा रहता है।
इतिहास हमें बताता है कि युद्ध‌ शुरू करना आसान है परंतु अपनी मनचाही शर्तों पर खत्म करना तकरीबन नामुमकिन है। एक बार जंग शुरू होने पर ‌ बदले की आग सब कुछ भस्मीभूत करने पर आमादा हो जाती है। आज के युद्ध पहले जैसे युद्ध भी नहीं है। आणविक हथियारों ‌ के विध्वंस की एक ही मिसाल‌ काफी है। जापान के हिरोशिमा नागासाकी पर गिरे अमेरिकन बम से हुए नरसंहार के‌ निशान आज तक मिटे‌ नहीं हैं। आज के हथियार पल भर में शहर के शहर को नक्शे से मिटाने की ताकत रखते हैं। दोनों तरफ के बेकसूर नागरिकों की जान और‌ माल, बच्चों के स्कूलों, अस्पतालों में‌ भर्ती बीमारो को मौत के घाट उतारा जा रहा है।
आज वह समय भी नहीं है कि बम तो जापान पर गिरा है या लड़ाई तो पश्चिम एशिया में चल रही है हमें इससे क्या फर्क पड़ता है, इस युद्ध से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पेट्रोल गैस की‌ किल्लत पैदा हो जाने से हाहाकार मचा हुआ है। एक बार जंग शुरू होने पर प्रतिशोध, आर्थिक तबाही का ‌ तांडव‌ शुरू हो जाता है। युद्ध यह तय नहीं करता कि कौन सही या गलत है इसके स्थान पर यह तय करता है कि कौन बचेगा। देशभक्ति की चासनी में सामने वालों के ताबूत को देखकर शैतानी दिमाग खुशी से भर जाता है, परंतु जब अपने मुल्क के सैनिकों या आम नागरिकों की मौत के बाद रोते बिलखते बच्चों, औरतों, ‌ बूढ़े मां-बाप के चीत्कार भरे रूदन को सुनते हैं तो कलेजा फट जाता हैं। ‌ युद्ध हमेशा उथल-पुथल संघर्ष विघटन का प्रतीक है। हर युद्ध के बाद शांति संधि की बात शुरू हो जाती है।
फेक्स रोमाना‌ (रोमना शांति फेक्स)‌ मंगोलियन संधि, ‌ प्रथम विश्व युद्ध 1914- 18 ‌ जिसका अंत वर्साय की संधि से हुआ। दूसरा विश्व युद्ध 1939 से 1945 जिसमें होलोकास्ट जैसे‌ नरसंहार हुए जिसके कारण शीत युग की शुरुआत हुई। शीत युद्ध 1947- 1991 संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के वर्चस्व की प्रतिद्वंदिता‌ जिसमें परमाणु हथियारों की होड़ मच गई। कोरिया -वियतनाम युद्ध। सेंट- जर्मन की संधि,‌‌ फ्रैंक‌ फर्ट की संधि,‌ सैन फ्रांसिस्को संधि,‌ पेरिस शांति समझौता।
युद्धों के कारण मुल्कों के बीच ‌ हथियारी लड़ाई से मजबूती लाने में जो धन गरीबी, जनकल्याण नव निर्माण पर खर्च होना था उसमें कटौती कर युद्ध सामग्री तैयार करने में लग जाएगा। हथियारों की होड़, सैनिक शक्ति का दिखावा शुरू हो जाता है।
अब सवाल पैदा होता है कि क्या कोई युद्ध हमेशा-हमेशा के लिए चल सकता है? आख़िर में युद्ध का समाधान बातचीत, वार्ता से ही होता है। दुनिया के युद्धों के इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो युद्ध के बाद की संधिया इसकी गवाह है। पूरी दुनिया की भलाई इसमें है की युद्ध जितना जल्दी हो सके खत्म हो।
परंतु अफसोस इस बात का है कि संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद महासभा, यूनिसेफ जैसी संस्थाए भी आज बेअसर या किसी एक की तरफदारी में लग गई है।
पश्चिम एशिया के युद्ध में‌ हिंदुस्तान शांति स्थापित करने के लिए कुछ कदम उठा सकता था परंतु हमारी सरकार ने शुरुआत में ही अति उत्साही बनकर इजरायल +अमेरिका की तरफदारी कर दी जिसके कारण हमारी गुटनिरपेक्षता‌,‌ किसी को तरजीह न देने का सिद्धांत बोथरा हो गया।
डॉ ‌राममनोहर लोहिया ने 18 अप्रैल 1954 को‌ कहा था कि‌ बीसवीं सदी के पूर्वार्ध ने ‌ दो नए आविष्कारों को जन्म दिया,‌ परमाणु बम और महात्मा गांधी और सदी का उत्तरार्ध ‌ इन दोनों के बीच चुनाव करने के लिए संघर्ष करेगा और कष्ट सहेगा। लोहिया ने कहा कि परमाणु बम और हाइड्रोजन बम समृद्धि की उपलब्धि के लिए आवश्यक है। उन्होंने इन बमों की तुलना खजाने के सहस्त्र पहरेदारों से की और कहा अमेरिका और रूस जो आधुनिक सभ्यता के दो सबसे बड़े मालिक हैं, उनके पास इन बमों के सबसे बड़े भंडार हैं। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान सभ्यता अंधी गली में पहुंच गई है,। जहां एक की संपत्ति की रक्षा दूसरों के सामूहिक हत्या के बिना नहीं हो सकती। महात्मा गांधी ने मानव जाति के लिए एक नया युग शुरू किया है जिसमें सुरक्षा, धन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परस्पर बांटने में है। महात्मा गांधी ने आदमी को सिविल नाफरमानी के हथियार का इस्तेमाल करना सिखाया,‌ संपत्ति के आंतरिक समान बंटवारे के लिए लेकिन इससे पहले कि इस हथियार का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बताते, उनकी हत्या हो गई।

  • Related Posts

    शिक्षा पर कसा नवउदारवादी शिकंजा

    प्रेम सिंह     (यह लेख करीब 16-17…

    Continue reading
    क्या हम नीट और ऐसी प्रवेश परीक्षाओं को समाप्त कर सकते हैं?

    राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    सीटू ने की रसोई गैस की कीमत बढ़ाने की निंदा

    • By TN15
    • June 7, 2026
    सीटू ने की रसोई गैस की कीमत बढ़ाने की निंदा

    ‘बस बहुत हो गया अब हम अपनी मस्जिदों पर…’ संभल में बुलडोजर एक्शन पर भड़के सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क

    • By TN15
    • June 7, 2026
    ‘बस बहुत हो गया अब हम अपनी मस्जिदों पर…’ संभल में बुलडोजर एक्शन पर भड़के सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क

    LPG Price Hike : तीन महीने में दूसरी बार महंगा हुआ घरेलू गैस सिलेंडर, 29 रुपए और बढाए

    • By TN15
    • June 7, 2026
    LPG Price Hike : तीन महीने में दूसरी बार महंगा हुआ घरेलू गैस सिलेंडर, 29 रुपए और बढाए

    JDU नेता संजय झा का बड़ा दावा, ‘ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के कारण टूटा इंडिया गठबंधन’

    • By TN15
    • June 7, 2026
    JDU नेता संजय झा का बड़ा दावा, ‘ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के कारण टूटा इंडिया गठबंधन’

     आलोक सिंह बने आरएलएम के प्रदेश अध्यक्ष,  प्रशांत पंकज और सुभाष चंद्रवंशी बने कार्यकारी अध्यक्ष 

    • By TN15
    • June 7, 2026
     आलोक सिंह बने आरएलएम के प्रदेश अध्यक्ष,  प्रशांत पंकज और सुभाष चंद्रवंशी बने कार्यकारी अध्यक्ष 

    अंतरराष्ट्रीय विश्व पर्यावरण दिवस व बाल दिवस पर जनवादी महिला समिति ने किया पौधरोपण, बच्चों में बांटी पर्यावरण की समझ

    • By TN15
    • June 7, 2026
    अंतरराष्ट्रीय विश्व पर्यावरण दिवस व बाल दिवस पर जनवादी महिला समिति ने किया पौधरोपण, बच्चों में बांटी पर्यावरण की समझ