सुभाष चंद्र बोस की विचाधारा के कैसे हो सकते हैं स्वतंत्रता संग्राम को नकारने वाले ?

चरण सिंह राजपूत 
ज पूरा देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पराक्रम दिवस दे रूप में मना रहा है। लोगों की इस देशभक्ति में कोई राजनीति नहीं है। राजनीति तो दिल्ली से सत्तारूढ़ पार्टी कर रही है। अमर ज्योति को बुझाकर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगाने की बात कर रहे हैं। इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण कर रहे हैं। प्रधानमंत्री का कहना है कि जब तक नेताजी की ग्रेनाइट की प्रतिमा बनकर तैयार नहीं हो जाती तब तक उस स्थान पर उनकी एक होलोग्राम प्रतिमा लगाई जाएगी।
दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने को सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा से जोड़ने का प्रयास करते हैं। सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर वह किसी न किसी माध्यम से उनके संघर्ष को भुनाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। जहां उन्होंने आजाद हिन्द फौज की 75 वीं जयंती पर लालकिले पर तिरंगा फहराया वहीं इस जयंती पर वह इंडिया गेट पर उनकी प्रतिमा लगा रहे हैं।
यदि पीएम मोदी की पार्टी भाजपा के मातृ संगठन की बात करें तो आजादी की लड़ाई में यह संगठन दूरी बनाकर चल रहा था। जबकि सुभाष चंद्र बोस इस लड़ाई के नायक थे। इसी विचारधारा के नाथू राम गोडसे ने उन राष्ट्रपिता की हत्या कर दी थी जिनको  राष्ट्रपिता की उपाधि सुभाष चंद्र बोस ने ही दी थी। यहां तक कि भारत छोड़ो आंदोलन में गांधी के रास्ते से असहमत होने के बावजूद सुभाष चंद्र बोस लड़ाई में शामिल थे। देश से बाहर जाकर भी वह उन अंग्रेजों से लोहा लेते रहे जिनके पैरोकार इनकी विचाधारा के लोग थे। जब मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मो. अली जिन्ना और हिन्दू महासभा के सावरकर थे तब बंगाल में इन संगठनों ने अंग्रेजों के रहमोकरम पर संविद सरकार बनाई थी। ये लोग भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रह थे। यह ये लोग तब कर रहे थे जब लगभग हर धारा से जुड़े लोग अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। भारत छोड़ो आंदोलन में  सोशलिस्टों के साथ ही तमाम कम्युनिस्ट नेता भी गिरफ़्तार हुए थे। यदि कहीं कोई नहीं था तो बस आरएसएस से जुड़े लोग थे । इन  लोगों ने तो अंग्रेजों के राज को ही स्वाभाविक बताना शुरू कर दिया था। क्रांतिकारियों की कार्यशैली में ये लोग खामियां निकाल रहे थे। सुभाष चंद्र बोस जैसे नायक कभी उनके आदर्श नहीं रहे। मोदी आज जिस आजादी की बात करते हैं। जिस आजादी की वजह से पीएम बने हैं, वह आज़ादी सुभाष चंद्र बोस जैसे नायकों के बल पर ही हासिल हुई है न कि अंग्रेजों की पैरोकारी से।
यह नेताजी का अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ छेड़ा गया बिगुल ही था कि नेताजी ने आजाद हिन्द फौज भले ही विदेश में जाकर बनाई लेकिन उसका पूरा उद्देश्य अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराना था। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने आजाद हिन्द सेना के ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए उन्होंने “दिल्ली चलो!” का नारा दिया।  जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी। जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। मार्च 1944 में आजाद हिन्द फ़ौज के दो डिवीजन मोर्चे पर थे। पहली डिवीजन में चार गुरिल्ला बटालियन थी। यह अराकान के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मोर्चा ले रही थी।
इसमें से एक बटालियन ने वेस्ट अफ्रीकन ब्रिटिश डिवीजन की घेराबंदी को तोड़ते हुए मोवडोक पर कब्ज़ा कर लिया। वहीं बहादुर ग्रुप की एक यूनिट जिसका नेतृत्व कर्नल शौकत अली कर रहे थे, मणिपुर के मोइरंग पहुंच गई। 19 अप्रैल की सुबह कर्नल शौकत अली ने मोइरंग में झंडा फहरा दिया।
इधर, जापान की 31 वीं डिविजन के साथ कर्नल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज की दो बटालियनों ने चिंदविक नदी पार की। यहां से ये लोग इम्फाल और कोहिमा की ओर बढ़े। इस ऑपरेशन के दौरान जापानी सेना के कमांडर और भारतीय अधिकारियों के बीच कहासुनी ने स्थिति को बिगाड़ दिया। ऐसे विपरीत हालात में मौसम ने भी आजाद हिन्द फ़ौज का साथ छोड़ दिया। दरअसल मानसून हर साल के मुकाबले इस साल जल्दी शुरू हो गया था। भारी बारिश ने पहाड़ी सड़कों को कीचड़ के दरिया में तब्दील कर दिया। जापानी सेना इस अभियान से पीछे हटने लगी। ऐसे में आजाद हिन्द फ़ौज का आत्मविश्वास डिगने लगा। मई के अंत तक आजाद हिन्द फ़ौज की सभी बटालियनें वापस बेस कैंप की ओर लौटने लगीं।
मार्च में जो आजाद हिन्द फ़ौज आक्रामक तरीके से भारतीय क्षेत्रों में आक्रमण कर रही थी। अगस्त आते-आते बर्मा में अपने आधार क्षेत्र को बचाने में लग गई। इम्पीरियल सेना के तोपखानों और लड़ाकू विमानों ने जंग का रुख मोड़ दिया था। कोहिमा से वापसी के बाद भारत को आजाद कराने का सपना लगभग दफ़न हो चुका था। जापान की स्थिति और भी ख़राब थी। इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना बेकार था।
इस हताशा भरे दौर में भी सुभाष चंद्र बोस ने रेडियो रंगून के जरिए गांधी जी और देश को संबोधित किया। जिस गांधी की लंगोटी पर कटाक्ष करते हुए मोदी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष को भुनाने का प्रयास करते हैं उसको राष्ट्रपिता का संबोधन सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस ने ही दिया था। अगले एक साल तक आजाद हिन्द फ़ौज ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के किसी भी मोर्चे पर सीधी लड़ाई से बचने की कोशिश करती रही। मांडला और माउन्ट पोपा में बुरी तरह मात खाने के बाद आजाद हिन्द फ़ौज को रंगून की तरफ पीछे हटना पड़ा। सैनिकों के बीच हताशा की भावना थी।
अप्रैल 1945 तक आजाद हिन्द फ़ौज के कई सैनिक बढ़ती हुई ब्रिटिश आर्मी के सामने हथियार डालने लगे। अप्रैल के अंत में पहली डिवीजन के 6000 सैनिकों को छोड़ कर बाकी सभी सैनिकों ने बर्मा छोड़ दिया और आजाद हिन्द फौज अपने पुराने केंद्र सिंगापुर लौट गई। इन छह हजार सैनिकों को बिर्टिश आर्मी के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस तरह देश से अपेक्षित सहयोग न मिलने की वजह से जुलाई तक “दिल्ली चलो” का नारा एक असफल प्रयोग और सैनिक एडवेंचर के तौर पर इतिहास में दर्ज होकर रह गया।
इधर, जब जून 1945 में कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को जेल से छोड़ा जा रहा था। तभी आजाद हिन्द फ़ौज के 11 हजार सैनिक युद्ध बंदी के तौर पर उस दिल्ली पहुंचे, जिसे फतह करने के लिए इन लोगों ने कसमें खाई थीं। यहां भारतीयों ने इनका स्वागत नायकों की तरह किया। भारत का कोई ऐसा राजनीतिक दल या विचारधारा नहीं थी जो इन लोगों के पक्ष में खड़ा नहीं था। आरएसएस और उसके लोग यहां से भी नदारद थे। अब उसके झंडाबरदार मोदी जिस लालकिले से तिरंगा फहराने की बात कर रहे हैं उसी लालकिले में इन युद्धबंदियों पर मुक़दमा चलाया गया।
भूलाभाई देसाई के नेतृत्व में तेजबहादुर सप्रू, आसफ अली और काटजू की टीम इस मुकदमे में इन सैनिकों की पैरवी कर रही थी। सुभाष के मामले में आरएसएस और मोदी जिन पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना करते नहीं थकते हैं वही नेहरू मुकदमे के पहले दिन वकालत की पढ़ाई के करीब तीस साल बाद वकील की फिर से वर्दी पहनते हैं और सुभाष के पक्ष में ट्रायल में खड़े हो जाते हैं। उस समय नेहरू को सुभाष और उनके सैनिकों की पैरवी करते देख देश के लोग खुशी से झूम उठे थे। और नारा लगा था -हिन्दुस्तान की एक ही आवाज, सुभाष, ढिल्लो और शाहनवाज ।
उसी समय नेताजी से जुड़े विमान हादसे की खबर आ गई और इन सैनिकों पर चल रहे मुकदमे के प्रति जनता की सहानुभूति भी जुड़ गई। यहां तक कि ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिक भी इस मामले में आजाद हिन्द फ़ौज के साथ खड़े हो गए।  कानपुर, कोहाट, इलाहाबाद, बमरौली की एयरफोर्स इकाइयों ने इन सैनिकों को आर्थिक सहयोग भेजा। पंजाब और संयुक्त प्रान्त में आजाद हिन्द फ़ौज के पक्ष में हो रही जनसभाओं में ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के लिए काम रहे भारतीय सैनिक भी वर्दी में जाते दिखे।
यह मुकदमा आजादी की लड़ाई को कितना मजबूत कर गया था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के गवर्नर कनिंघम ने तत्कालीन वायसरॉय को लिखा कि राज के लिए अब तक वफादार रहे लोग इस मुदकमे की वजह से ब्रिटिश ताज के खिलाफ होते जा रहे हैं। ब्रिटिश इम्पीरियल आर्मी के कमांडर इन चीफ ने अपने दस्तावेजों में दर्ज किया कि सौ फीसदी भारतीय अधिकारी और ज्यादातर भारतीय सैनिकों की सहानुभूति आजाद हिन्द फ़ौज की तरफ है।
नवम्बर 1945 को लाल किले में शुरू हुआ यह मुकदमा मई 1946 में खत्म हुआ। फैसले में कथित आरोपी तीन अफसरों कर्नल शाहनवाज, प्रेम सहगल और गुरुबक्श सिंह ढिल्लो को देश निकाले की सजा दी गई। हालांकि इस पर कभी अमल नहीं हुआ। बाकी के सैनिकों पर जुर्माना लगा और तीन महीने के भीतर उन्हें छोड़ दिया गया। जो लालकिला सुभाष चंद्र के साम्प्रदायिक सौहार्द का गवाह बना। जिस लालकिले की देखभाल के लिए मोदी सरकार के पास पैसे नहीं थे। और उसकी देखरेख के लिए उसे कारपोरेट घराने डालमिया को दे दिया, उसी लालकिले में प्रधानमंत्री मोदी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर राजनीति करने जा रहे हैं। जिन लोगों का दूर-दूर तक आजादी की लड़ाई से कोई वास्ता नहीं रहा वे लोग अब आजादी की विरासत के वारिस बन गए हैं।

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