आस्था, पर्यावरण और मर्यादा की होली

होली आने वाली है। होलिका जलाने के नाम पर शहरों के कई चौक-चौराहों पर कचरा, प्लास्टिक और टायर जलाए जाते हैं, जिससे गंभीर वायु प्रदूषण फैलता है। इसका दुष्प्रभाव केवल उस स्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र के लोग इसे झेलते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और श्वास संबंधी रोगों से पीड़ित लोगों के लिए यह और भी हानिकारक साबित होता है।

होली के विषय में अलग-अलग पंथों में अलग-अलग विचार और अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। इस छोटे से लेख के माध्यम से यह कहना या समझाना संभव नहीं है कि होली नहीं जलानी चाहिए। आस्था हमें अपनी परंपराएँ निभाने के लिए प्रेरित करती है, और परंपराएँ समाज की सांस्कृतिक पहचान होती हैं।

फिर भी, यदि होलिका दहन करना है तो उसे सांकेतिक और सीमित रूप में किया जा सकता है। जैसे हवन के लिए बहुत बड़ी आग नहीं जलाई जाती, बल्कि थोड़ी-सी लकड़ी से विधि पूरी कर ली जाती है, उसी प्रकार होलिका दहन भी नियंत्रित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से किया जा सकता है।

उत्तर भारत की शादियों में ‘मरवा’ की परंपरा आज भी निभाई जाती है, जिसमें हरीश पलो (हल) गाड़ा जाता है। पहले खेती हल से होती थी, पर अब आधुनिक युग में ट्रैक्टर से खेती होती है और पारंपरिक हल आसानी से उपलब्ध नहीं होता। इसलिए लोग कारपेंटर से छोटा प्रतीकात्मक हल बनवाकर विधि पूरी कर लेते हैं। परंपरा भी बनी रहती है और समय के अनुसार परिवर्तन भी स्वीकार कर लिया जाता है। इसी तरह होली में भी प्रतीकात्मकता अपनाई जा सकती है।

बचपन से सुनते आए हैं कि होली के दिन लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक हो जाते हैं। यह एक सुंदर और आदर्श भावना है। लेकिन व्यवहार में कई जगह इसका उल्टा भी देखने को मिलता है। कुछ लोग मिलते हैं, गले लगते हैं, पर कई स्थानों पर उसी दिन का इंतजार किया जाता है कि अमुक व्यक्ति को नशे में अपमानित या पीटा जाए।

नशे के कारण लोग सड़कों पर हुड़दंग करते दिखाई देते हैं। गाड़ियों पर रंग और कीचड़ फेंक दिया जाता है, वाहनों को नुकसान पहुँचाया जाता है। गाँवों के पास से गुजरने वाली ट्रेनों पर गोबर या कीचड़ फेंकना भी कुछ जगहों पर देखा गया है। बाद में इसे “नशे में हो गया” कहकर टाल दिया जाता है। परंतु नशा किसी भी अनुचित व्यवहार का औचित्य नहीं बन सकता।

सबसे चिंता की बात यह है कि इस दिन कई महिलाएँ और बालिकाएँ छेड़छाड़ की शिकार होती हैं। रंग लगाने के नाम पर छोटी-छोटी लड़कियों तक के साथ अनुचित हरकतें की जाती हैं। यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। इसलिए उस दिन महिलाओं को विशेष सतर्कता रखनी पड़ती है। अकेले निकलने से बचना, समूह में रहना और सुरक्षित स्थान पर ही रंग खेलना — यह सब सावधानी के रूप में अपनाना पड़ता है। कई बार महिलाओं के समूह पर भी जबरन रंग डालने के लिए पुरुषों का झुंड हमला कर देता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि होली के नाम पर सभी लोग हुड़दंग और नशा ही करते हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग शालीन और मर्यादित ढंग से होली मनाता है। कई स्थानों पर फूलों की होली खेली जाती है। लोग घर में पुआ-पकवान और मनपसंद व्यंजन बनाते हैं, परिवार और मित्रों के साथ बैठकर हँसी-खुशी समय बिताते हैं। यही होली का वास्तविक आनंद है — अपनापन, भाईचारा और प्रसन्नता।

हमें यह तय करना होगा कि हम कैसी होली अपने बच्चों को विरासत में देना चाहते हैं — प्रदूषण, नशा और अव्यवस्था वाली, या मर्यादा, स्वच्छता और सौहार्द वाली। यदि हम स्वयं हुड़दंग से दूर रहेंगे और उसमें शामिल नहीं होंगे, तो हमारे बच्चे भी वही सीखेंगे। समाज का परिवर्तन उदाहरण से आता है।

यह लेख लिखने का उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं है। मैं देश के लगभग 18 राज्यों में रह चुका हूँ। जो देखा, जो महसूस किया, उसी अनुभव के आधार पर यह लेख लिखा है।

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