Gujarat Government : कहीं मोदी के गृह राज्य की गफलत में तो नहीं हुआ मोरबी पुल हादसा ?

कम क्षमता वाले पुल के लिए ब्लैक किये गए टिकट, नहीं हुई सुरक्षा ऑडिट

चरण सिंह राजपूत 

गुजरात मोरबी पुल हादसा एक ओर जहां लोगों की अति उत्साह की एक दर्दनाक घटना है वहीं प्रशासनिक भ्र्ष्टाचार और निरंकुशता की भी इस मामले में स्पष्ट रूप से देखी जा रही है। गुजरात मोरबी मामले को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। कहीं यह हादसा गुजरात के रॉल मॉडल को कुछ ज्यादा ही प्रचारित करने का परिणाम तो नहीं है। समझने की जरुरत यह है कि देश में गुजरात को मोदी के नाम पर ऐसे प्रचारित कर दिया गया है कि जैसे वहां पर राम राज आ गया हो। इन सबके चलते नौकरशाही में लापरवाही आती है। सरकारी विभाग निकम्मेपन की ओर जाने लगते हैं। यह सब इस हादसे से साफ़ जाहिर हो रहा है। यह भी अपने आप में प्रश्न है कि इतना बड़ा हादसा होने के बावजूद मीडिया इस मामले को इतनी गंभीरता से नहीं ले रहा है।
गुजरात के मोरबी में हुए पुल हादसे में अब तक कुल 132 लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसे में गुजरात में हुए पुल हादसा कई अहम और बड़े सवाल भी खड़ा कर रहा है। दरअसल यह पुल राजा-महाराजाओं के जमाने का है और 26 अक्टूबर को गुजराती नव वर्ष के मौके पर इसे 7 महीने बाद फिर से चालू किया गया था।

ऐसे में प्रश्न उठता है जब पुल की क्षमता बहुत कम थी तो फिर लोगों को 50 रुपये में टिकट क्यों ब्लैक किये गये ? मतलब लोगों की जान की कीमत पर पैसे कमाए गए। मतलब पुल प्रबंधन वहां पहले से टिकट ब्लैक करता रहा है बिना सुरक्षा ऑडिट के पुल को खोल दिया गया था ?
मोरबी पुल हादसे में सबसे बड़ा सवाल यह कि जब 100 से 120 लोगों की क्षमता वाला ही यह पुल था तो उस पर 400 से अधिक लोग कैसे पहुंच गए ? क्या प्रबंधन को इसकी जानकारी नहीं थी ? मोरबी पुल की रख रखाव वाली एजेंसी के खिलाफ 304, 308 और 114 के तहत क्रिमिनल केस दर्ज किया गया है। यह अपने आप में प्रश्न है कि इतना बड़ा हादसा होने के बावजूद अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। जानकारी यह भी मिली है कि पुल का सुरक्षा ऑडिट ही नहीं हुआ था और फिटनेस सर्टिफिकेट ही नहीं लिया गया। तो क्या  पुल खोलते समय नगर पालिका प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी ? यह पुल नगर पालिका की सम्पत्ति है और क्या नगर पालिका को ब्लैक टिकट बेचे जाने की जानकारी नहीं थी ?
प्रश्न यह भी है कि अगर पुल पर निर्धारित संख्या से अधिक लोग पहुंच भी गये तो उन्हें रोका क्यों नहीं गया और उन्हें वहां से हटाया क्यों नहीं गया ? क्या वहां प्रशासन का कोई जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद नहीं था ? क्या पुल का रख रखाव करने वाली कंपनी का सारा ध्यान टिकट ब्लैक करने और अधिक मुनाफा कमाने पर था। पुल घटना के चार दिन पहले खुला क्या नगर पालिका ने बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के पुल खोलने पर कंपनी का कोई नोटिस भेजा ?

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