जामिया से जेल तक : अल-फलाह के चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी का विवादास्पद सफर

हाल ही में दिल्ली के रेड फोर्ट के पास 10 नवंबर 2025 को हुए बम विस्फोट (जिसमें 12 लोगों की मौत हुई) ने हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी को सुर्खियों में ला दिया है। इस घटना में इस्तेमाल हुई एक i20 कार यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से जुड़ी पाई गई, और अब नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की जांच में कई डॉक्टरों पर शक है। लेकिन अब नजरें यूनिवर्सिटी के फाउंडर और चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी पर हैं, जिनका अपना इतिहास भी धोखाधड़ी, जेल और विवादों से भरा पड़ा है। आइए, उनके सफर को समझते हैं।

 

शुरुआती जीवन और जामिया में एंट्री

 

उन्होंने इंदौर की देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी से इंडस्ट्रियल एंड प्रोडक्ट डिजाइन में B.Tech किया।
1993 में वे दिल्ली के प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लेक्चरर बने। यहां उनकी महत्वाकांक्षा सिर्फ पढ़ाने तक सीमित न रही—उन्होंने अपने भाई सऊद अहमद के साथ मिलकर बिजनेस शुरू किया, जिसमें अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स जैसी कंपनियां शामिल थीं। जामिया के दौरान ही उन्होंने बिजनेस नेटवर्क फैलाया, लेकिन यही उनके पतन का कारण भी बना।

 

धोखाधड़ी का केस और जेल की सजा

2000 में दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी थाने में उनके और उनके भाई के खिलाफ FIR नंबर 43/2000 दर्ज हुई। आरोप थे: निवेशकों के सिग्नेचर जाली करना, फर्जी कंपनियां बनाकर फंड हड़पना और आर्थिक धोखाधड़ी।
दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग ने जांच की, जिसमें फोरेंसिक सबूत मिले कि सिग्नेचर नकली थे और फंड ट्रांसफर गलत जगह हुए। दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। वे तीन साल से ज्यादा जेल में रहे। 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट ने बेल खारिज कर दी, लेकिन फरवरी 2004 में बेल मिली।
2005 में पटियाला कोर्ट ने बरी किया, लेकिन शर्त पर कि निवेशकों को पूरा पैसा लौटाना होगा। यह केस उनके करियर पर बड़ा दाग छोड़ गया।

 

अल-फलाह यूनिवर्सिटी: शिक्षा या साजिश का अड्डा?

 

जेल से रिहा होने के बाद जवाद ने 2019 में फरीदाबाद के धौज गांव में अल-फलाह यूनिवर्सिटी की स्थापना की। यह प्राइवेट संस्थान मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य कोर्स ऑफर करता है, जिसमें अल-फलाह ग्रुप की 12+ कंपनियां शामिल हैं।
लेकिन यहां भी विवादों का दौर चला:
कम सैलरी और कश्मीरी डॉक्टर: कश्मीर से लाए डॉक्टरों को कम वेतन पर काम करवाया जाता था, जिससे अलग-थलग समुदाय बना। प्रबंधन ने शिकायतों को नजरअंदाज किया।
धार्मिक कट्टरता: संस्थान में पांच वक्त की नमाज, बुर्का-हिजाब पर जोर। एक प्रोफेसर डॉ. शाहीन सईद (जो हाल ही में आतंकी साजिश के आरोप में गिरफ्तार हुईं) लड़कियों को धार्मिक शिक्षा देती थीं। उनकी गैरहाजिरी की शिकायतें आईं, लेकिन चांसलर ने कोई कार्रवाई नहीं की।
कोविड काल का कांड: महामारी में मरीजों का इलाज कर रही नर्सों को लाइफ इंश्योरेंस की मांग पर निकाल दिया गया।
इंटर्न्स का विरोध: पिछले साल मेडिकल इंटर्न्स ने स्टाइपेंड न मिलने और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर पर हल्ला बोला, तो उन्हें सस्पेंड कर दिया गया।

 

हालिया दिल्ली ब्लास्ट से कनेक्शन

 

10 नवंबर को रेड फोर्ट ब्लास्ट में इस्तेमाल चौथी कार (ब्रेजा) अल-फलाह यूनिवर्सिटी की पार्किंग से बरामद हुई। एक प्रोफेसर को साजिश में गिरफ्तार किया गया। NIA अब यूनिवर्सिटी के ऑपरेशंस और जवाद के पुराने बिजनेस पर नजर रख रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या शिक्षा के नाम पर कोई बड़ी साजिश रची जा रही थी? इससे संस्थान की साख को गहरा झटका लगा है।

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