सत्ता के लिए हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं जातियों के बीच भी पैदा की जा रही नफरत !

 चरण सिंह 

जो लोग यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि बीजेपी हिन्दुओं की हितैषी पार्टी है वे लोग यह समझ लें कि बीजेपी को हिन्दू मुस्लिम से कोई लेना देना नहीं उसे तो नफरत का माहौल बनाए रखकर हिन्दू वोट बैंक को बनाए रखना है। सत्ता के लिए बीजेपी हिन्दू मुस्लिम का खेल ही नहीं खेलती बल्कि हिन्दुओं को भी आपस में उलझा देती है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर यूपी बिहार में यादव तो हरियाणा में जाट बीजेपी के निशाने पर क्यों रहते हैं ?बिहार चुनाव जीतने के लिए यादवों के खिलाफ तो हरियाणा में जाटों के खिलाफ विभिन्न जातियों को एकजुट नहीं किया गया? जाट और यादव हिन्दू हैं या फिर मुस्लिम ? ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी सवर्णों की पार्टी है। जाट और यादव दोनों ही ओबीसी हैं। उधर बीजेपी कैडर दलित समुदाय को सटाने को तैयार नहीं। मतलब की  रणनीति यह होती है कि किस धर्म और किस जाति के खिलाफ माहौल बनाने के लिए उसे दूसरे लोगों को लामबंद करना है। छत्तीसगढ़ में राजपूतों के वोट हासिल करने के लिए रमन सिंह तो राजस्थान में राजपूत और जाट वोट के लिए वसुंधरा राजे का इस्तेमाल तो कर लिया पर सरकार बनाने में इन नेताओं को ठेंगा दिखा दिया गया। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को कहां पचाया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ तो हिंदुत्व चेहरे के साथ ही राजपूत लॉबी और नाथ सम्प्रदाय के बल पर मुख्यमंत्री बने हुए हैं। दरअसल बीजेपी प्रभावशाली लोगों की पार्टी है। इसमें किसी भी जाति और धर्म का व्यक्ति हो सकता है।  दरअसल बीजेपी ने बड़ी चालाकी से देश के शीर्षथ उद्योगपतियों को साध रखा है। इन उद्योगपतियों के दम पर बीजेपी ने न केवल मीडिया बल्कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए तंत्रों को भी कब्ज़ा लिया है। बताया जा रहा है कि जब भी बीजेपी को किसी भी नेता,ब्यरोक्रेट्स या पूंजीपति को साधना होता है। संबंधित व्यक्ति की कमजोरी ढूंढी जाती है और फिर विभिन्न हथकंडे अपनाकर  उस पर दबाव बनाया जाता है। इस रणनीति के तहत हर तंत्र प्रभावित किया जा रहा है। यहां तक काफी हद तक न्यायपालिका भी।
बीजेपी इन प्रभावशाली लोगों के दम पर ही राजनीति कर रही है और इनके लिए ही काम कर रही है। जनता तो बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर है। वैसे तो देश में सरकारी संसाधनों के दोहन की पराकाष्ठा है पर परमाणु ऊर्जा के निजी हाथों में देने पर अरावली पहाड़ियों के अस्तित्व को खत्म करने के लिए खेले जा रहे खेल ने सत्ता का असली चेहरा सामने ला दिया है। विपक्ष कितना भी दम्भ सरकार से टकराने का भरता घूम रहा हो पर जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी पार्टी जनहित के मुद्दे पर सड़क पर उतरने को तैयार नहीं। न ही जनहित में विपक्ष एक हो रहा है।11 साल मोदी सरकार को हो गए हैं और यूपी, बिहार, गुजरात, उत्तराखंड, कर्नाटक और महारष्ट्र के साथ कई प्रदेशों में भी बीजेपी की सरकार है पर न तो केंद्र सरकार और न ही किसी प्रदेश सरकार के खिलाफ जनहित में कोई बड़ा आंदोलन हुआ। देश में विपक्ष मजबूत होता तो कुकुरमुत्ते की तरह किसान संगठन न खड़े होते। परमाणु ऊर्जा को निजी क्षेत्र में देने और अरावली पहाड़ियों छाए संकट छाने के गंभीर मुद्दों पर भी विपक्ष एकजुट नहीं हो पा रहा है।

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