शिवाजी महाराज के वंशज होने पर गर्व की अनुभूति 

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट

आज के महाराष्ट्र में नागपुर व उसके आसपास के क्षेत्र के राजा गुर्जर जाति के थे जो शिवाजी के वंशज थे। शिवाजी का गोत्र बैंसला था। जिसको आज बहुत से साथियों ने बिगाड़ करके बंसल कहने का प्रयास किया हैं।
आपको गर्व की अनुभूति होगी कि आप शिवाजी महाराज के वंशज हैं।
वस्तुतः सन 1793 में रघुजी द्वितीय नागपुर के राजा थे ।जो शिवाजी के वंशज थे। उनकी एक बनूबाई (बनोबाई)नामक बेटी थी। जिसकी शादी वेंकट राव उर्फ नानासाहेब गुर्जर पुत्र श्री रामराव गुर्जर के साथ हुई थी। जो प्रतापराव गुर्जर के वंशज थे। लेकिन शादी के समय दूल्हा-दुल्हन दोनों ही अल्प वयस्क थे।
तब भिवापुर एक ताल्लुक होता था । उसमें 6 गांव लगते थे उनकी जो राजस्व से आमदनी होती थी ।वह 17415 रुपए होती थी ।यह शादी के समय बनुबाई को राजा रघुजी सेकंड ने दान‌ दे दिया था ।रघुजी सेकंड की मृत्यु 1816 में हो गई। प्रतापराव गुर्जर का वंशज हुआ तेज सिंह राव। जिसकी भूमि में से १७६.९१ एकड़ भूमि अतिरिक्त भूमि घोषित कर राज्य सरकार में निहित कर दी गई थी ।जिसके विरुद्ध तेज सिंह राव गुर्जर ने मुकदमा लड़ा।
परंतु हाई कोर्ट महाराष्ट्र ने इसे पूर्ण रूप से एक निजी दान माना ,लेकिन यह राजा के द्वारा दी हुई कोई ग्रांट लेजिसलेटिव (अर्थात विधिक अथवा वैधानिक रुप से उचित विधिक दान)  के रूप में नहीं मानी गई थी ।इसलिए माननीय उच्च न्यायालय मुंबई द्वारा तेज सिंह राव की पेटिशन खारिज कर दी गई ।मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष  चुनौती देने के कारण निर्णय हेतु गया ।जिसमें 19 अगस्त1992 को निर्णय आया। जो  तेजसिंह राव के विरुद्ध आया । यह माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किया गया था। तेज सिंह राव द्वारा जो यह तर्क दिया  गया था कि 199 साल पहले, जो सन 1793 में दान मिला था, वह भूमि अतिरिक्त भूमि घोषित नहीं की जा सकती है ।यह दलील नहीं मानी गई थी ।तेज सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह भी तर्क प्रस्तुत किया था कि उनके पास यह भूमि रघुजी सेकंड द्वारा दान दिए जाने के कारण से आई है ।जो रजिस्टर माफी सन 1866 से 1914 तक रघो जी सेकंड द्वारा दी गई हुई भूमि पाई जाती है। जो रामाराव गुर्जर के बेटे व्यंकटराव उर्फ नानासाहेब गुर्जर को शादी के समय दी गई थी। बनोबाई‌  और वेंकट राव के संयोग से एक लड़का पैदा हुआ। लेकिन उस लड़के को पुरसोजी भोंसले ने राज सिंहासन पर बैठाने के लिए दत्तक पुत्र के रूप में ले लिया ।फिर बनो बाई ने चितकोजी राव गुर्जर को गोद ले लिया। यह भूमि चितकोजी राव गुर्जर को भिवापुर ताल्लुक की बनुबाई से दत्तक पुत्र होने के कारण विरासत में उस समय से ही मिल गई थी। तेज सिंह राव गुर्जर ने तत्कालीन गवर्नर जनरल इंडिया ऑफिस लंदन के पत्र दिनांक 16 दिसंबर 1867 का भी उल्लेख किया है। जिसमें कि यह भूमि गुर्जर भोंसले फैमिली  (जो नागपुर से संबंध रखती है ,) को मिली थी ।
लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस को स्वीकार नहीं किया गया। महाराष्ट्र एग्रीकल्चर लैंड सीलिंग ऑन होल्डिंग्स एक्ट 1961 के तहत उक्त भूमि को अतिरिक्त भूमि घोषित किया गया था ।यह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दिनांक 20 अगस्त1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया में श्री राजेश भटनागर द्वारा प्रकाशित कराया गया था।

अतः सिद्ध होता है कि शिवाजीराव भोंसले गुर्जर थे। इसलिए उन्हें राज सिंहासन के समय अर्थात तिलक के समय कुछ रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने  संकोच का कारण बनाया  था। उनकी जाति पर  प्रश्न चिन्ह लगाया था। यहां तक कि बहुत से मराठा सामंत भी शिवाजी को राजा बनाने के लिए सहमत नहीं थे। शिवाजी महाराज के राज्य अभिषेक के लिए काशी के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान गंगभट्ट को रायगढ़ लाया गया। यह वैदिक विद्वान होने के नाते जानते थे कि भारतवर्ष की गुलामी की जंजीर को यदि कोई काट सकता है तो वह केवल शिवजी ही एक ऐसा पुरुष होगा और स्थानीय ब्राह्मणों को भी उन्होंने ही शिवाजी के राज्याभिषेक के लिए सहमत किया था। पंडित गंगभट्ट की देखरेख और माता जीजावाई की उपस्थिति में राज्याभिषेक का कार्य संपन्न हुआ। राज अभिषेक से पूर्व पवित्र संस्कार करने के बाद वैदिक रीति के अनुसार शिवाजी को पंचामृत स्नान आदि सभी क्रिया संपन्न कराई गई थी। ऐसे महान अवसर पर हजारों की संख्या में लोग एकत्र हुए थे जिनमें सामंत, राजदूत, सेनानायक, धर्माचार्य एवं  वैदिक विद्वान , आबाल वृद्ध शामिल थे । वस्तुत  वह हिंदुओं के स्वाभिमान का राज्याभिषेक था।
शिवाजी की प्रत्येक नीति अपने अनुसार की बनी हुई होती थी। वह अपनी भवानी तलवार को म्यान से बाहर तब  निकालते थे जब उसका धर्म और नीति के अनुसार उपयोग आवश्यक हो गया हो। शिवाजी के राज्यारोहण के पश्चात दक्षिण विजय को‌ भारतवर्ष के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास के शिष्य थे। नीति निर्गुण होने के साथ-साथ धर्मनिष्ठ भी थे।
शिवाजी के विषय में बताया जाता है कि  एक बार एक कुरान शरीफ लूट के समान में आ गई जिसको उन्होंने ससम्मान उसके स्वामी तक पहुंचा दिया । तथा एक बार गौहर बानो नाम की औरत शिवाजी के सैनिकों ने उनको लाकर के भेंट दी परंतु शिवाजी ने ससम्मान उसको वापस किया ।यह शिवाजी की ही महानता थी कि उन्होंने इस्लाम का कभी अनादर नहीं किया।
शिवाजी ने नारी सम्मान और मनुष्य की सामाजिक आर्थिक उन्नति के लिए अनेक नियम बनाए।
शिवाजी ने भारतवर्ष की सीमाओं को बाहरी विदेशी दुश्मनों से सुरक्षित रखने के लिए नौसेना की स्थापना भी की। शिवाजी ने अपनी बुद्धि कौशल से औरंगजेब को यथायोग्य व्यवहार करते हुए कई बार धोखा दिया। शिवाजी ने औरंगजेब के सिपाहसलार जो शिवजी को धोखे से मारने के लिए आया था, को अपने नाखूनों पर व्याघ्र नख चढाकर दुश्मन का पेट फाड़ कर मौत की नींद सुला दिया था।
शिवाजी राज विजय के  लेखक अंबिका दत्त व्यास एवं वीर रस की कविताएं राजकवि भूषण को अध्ययन करने के उपरांत उनकी वीरता और साहस की कहानी अपने आप उभर कर सामने आ जाती है।

 

गुर्जरों का जो प्राचीन इतिहास है वह बहुत ही स्वर्णिम है। आठवीं शताब्दी से लेकर 12 वीं सदी तक गुर्जरों का स्वर्णिम काल रहा है।यही केवल छत्रिय लोग हुआ करते थे अर्थात् क्षत्रियों में गुर्जर सबसे विशिष्ट क्षत्रिय हैं । शिवाजी भोंसले महाराज  वंशजों एवं संबंधियों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा साफ-साफ गुर्जर शब्द दिया  है । वह महाराष्ट्र में बैंसला के स्थान पर भोंसले बोले जाते हैं। लेकिन राजस्थान के लोग आज भी अपने आप को बैंसला ही बोलते हैं। कहीं कहीं पर बींसला भी बोला जाता है। यह केवल शब्दों के उच्चारण में अपभ्रंश हो जाने के कारण, स्थान परिवर्तन हो जाने कारण बोली, भाषा तथा उच्चारण का अंतर होने पर ऐसा होता है।
लिए जानें शिवाजी के बारे में कुछ और विशेष।
शिवाजी की देशभक्ति और साहस को स्मरण करते ही वीर पुरुषों की भुजाएं फड़कने लगती थीं। दुश्मन के खेमे में शिवाजी के नाम से भय का वातावरण व्याप्त हो जाता था।
शिवाजी के अंदर बुद्धि कौशल के अतिरिक्त सांगठनिक शक्ति बहुत ही उच्च कोटि की थी। उन्होंने 6 जून 1674 को रायगढ़ के प्रसिद्ध दुर्ग में अपने आप को महाराज घोषित कर दिया और सर्वप्रथम हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करने की घोषणा की। जो भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण एवं अनमोल घटना है। शिवाजी महाराज 350 वर्ष बाद भी इस विशेष कार्य के लिए याद किए जाते हैं। यह वह समय था जब मुग़ल सल्तनत औरंगज़ेब के नेतृत्व में भारतवर्ष को पद दलित करना चाहती थी। ऐसे में शिवाजी महाराज का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने औरंगजेब के दांत खट्टे किए तथा गजवा -ए -हिंद के बदले हिंदवी स्वराज की घोषणा की।
यह महोत्सव केवल पश्चिमी भारत में महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि  इसको संपूर्ण भारतवर्ष को मनाना चाहिए। शिवाजी का राज्याभिषेक दिवस राष्ट्र के स्वाभिमान दिवस के रूप में स्थापित करना चाहिए।
शिवाजी महाराज का चयन राजा के रूप में जनता के द्वारा किया गया था और यह एक प्रजातंत्र का जीवंत उदाहरण है।

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