दान का गुरुर नहीं फर्ज अदायगी का एहसास!

आज दिल्ली यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस के लोन पर मरहूम प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह राणा को श्रद्धांजलि देने के लिए सभा का आयोजन था। सैकड़ो की तादाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी के मुख्तलिफ विचारधाराओं, संगठन तथा आजाद ख्याल के शिक्षक वहां अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए मौजूद थे। मैं भी ग्वालियर से अपने नैतिक दबाव के कारण वहां से आकर सभा में शामिल हुआ था। वजह ही ऐसी थी, दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षकों ने अपने महबूब साथी को खोया था। सुरेंद्र राणा एक ऐसी शख्सियत थे जो मुख्तलिक विचारधारा, विचारों वालों को भी अपना नजदीक का साथी होने का एहसास कराते थे। खुशमिजाजी, खुलूस शराफत और सभी का अदब से इस्तकबाल उनकी आदत में शुमार था। दिल्ली यूनिवर्सिटी की शिक्षक सियासत मे जहां का हर मतदाता ऊंचे दर्जे की काबिलियत, आलिम फाजिल, डिग्री धारी है, उसका वोट समर्थन तथा अपनापन पाना बेहद मुश्किल तथा इम्तिहान से गुजरना जैसा है। हालांकि सुरेंद्र राणा किसी भी नामी वैचारिक संगठन से जुड़े हुए नहीं थे। अपने दम पर चंद साथियों के साथ उन्होंने अपना “यूनिवर्सिटी टीचर फोर्म” संगठन बनाकर, अपनी मेहनत रसूक तथा साथियों की मदद किसी भी हद तक जाकर करने की आदत के कारण अपनी एक पहचान यूनिवर्सिटी में बनाई हुई थी।
उनकी शख्सियत का असली एहसास आज की सभा में हुआ। सबके भाषण का सार एक ही था, सब के भाषण से यही लगता था कि वह मेरे सबसे नजदीक थे।
सभा में मौजूद लोगों की आंखें उस वक्त नम हो गई, जब उनके बेहद करीबी डॉक्टर डीबी सिंह ने रुंधे हुए गले से बताया कि आज मैं अपने दोस्त को दिए गए वादे को तोड़कर, एक बात का ज़िक्र कर रहा हूं। उन्होंने मुझसे वादा लिया था कि मैं कभी भी इसका जिक्र नहीं करूंगा। हर सर्दी शुरू होने पर उनका पैगाम आता था की सर्दियों में दिल्ली की सड़कों पर बिना गर्म कपड़े ओढ़े हुए इन बेसहारा, बेघरबार लोगों को कंबल बांटने चलना है। महीनो पहले वे अपनी तरफ से एक मोटी रकम तथा खास दोस्तों और अपने विद्यार्थियों से रुपया इकट्ठा करके गर्म कंबल खरीद कर टेंपो में लादकर सर्द रातों में निकल पड़ते थे। यही नहीं छठा वेतन आयोग के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षकों को एक मुस्त अच्छी खासी राशि मिली थी,
आंसुओं से तरबतर भर्रायी आवाज में उन्होने बताया कि उनका टेलीफोन आया था की इतनी बड़ी राशि पर गरीबों का भी हक है कम से कम आधी राशि को तो हमें बांट ही देना चाहिए।
सुरेंद्र राणा के आंतरिक मनोभाव में किसी दानवीर का गुरुर न होकर अपने इंसानी फर्ज की अदायगी का एहसास झलकता था। ऐसा इंसान जब अपने बीच से जब अकस्मात ओझल हो जाता है तो किसको तकलीफ नहीं होगी।
राजकुमार जैन

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