कोको आइलैंड से इसरो पर नजर, गुस्ताख चीन की साजिश और नेहरू की वो गलती

India-China Tension : भारत और चीन सीमा पर एक दूसरे के खिलाफ बंदूक तान कर खड़े हैं। 15-16 जून, 2020 की रात गलवान में बहे खून के छींटे अब भी महसूस किए जा सकते हैं। लद्दाख में कुछ पॉइंट्स से हटने के बावजूद चीन की आर्मी का दक्षिणी कमांड हर स्थिति के लिए तैयार है। ऐसे में बर्मा के पास कोको द्वीप पर उसका पहुंचना खतरनाक है।

जैसे पटेल ने लक्षद्वीप पर चीनी मंसूबों को धो डाला वैसे नेहरू नहीं कर पाए

चीन की चालबाजी और बदनीयती से हम सब वाकिफ हैं। अब वह हमारी नाक के नीचे समंदर में जमीन तलाश रहा है। इसकी ताजा तस्वीर मक्सर ने जारी की है। सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें हैरान करने वाली हैं। कोलकाता से महज 1255 किलोमीटर दूर कोको आइलैंड पर दिन-रात काम चल रहा है। ये कभी अंडमान निकोबार द्वीप समूह का ही हिस्सा था लेकिन अंग्रेजों ने इसे बर्मा को दे दिया। जापान ने 1942 में इस पर कब्जा तो कर लिया लेकिन 1948 में दोबारा बर्मा को दे दिया। और बर्मा के सैनिक तानाशाहों ने अपनी जेब और गोला बारूद के लिए कोको आइलैंड्स का इस्तेमाल चीन को करने दिया किया। कहने के लिए ये ये द्वीप बर्मा का है पर यहां जारी मिलिट्री एक्टिविटी चीन की मालूम पड़ती है। वही चीन जिससे हम लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक 3488 किलोमीटर के दायरे में आमने-सामने हैं। इस चीन ने कोको आइलैंड पर नापाक हरकत शुरू कर दी है। तस्वीरों में साफ आप इसे देख सकते हैं। दो नए हैंगर बनाए गए हैं। इनकी चौड़ाई लगभग 40 मीटर है। नया रास्ता आइलैंड के दक्षिणी सिरे तक बनाया जा रहा है। 2300 मीटर लंबा रनवे और रडार स्टेशन लगभग तैयार हो गया है।

भारत पर नकेल की साजिश

मतलब चीन अपना महाविनाशक चेंगदू जे-20 फाइटर जेट यहां उतार सकता है। चीन – बर्मा इकोनॉमिक कॉरिडोर के नाम पर हम पर नकेल कसने की कोशिश का माकूल जवाब देना होगा। चीन लंबे समय से स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की पॉलिसी पर काम कर रहा है ताकि भारत को घेर सके। दरअसल चीन समंदर में हमसे तो तगड़ा है लेकिन ग्लोबल घेराबंदी से उसकी सांस फूल रही है। दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर में क्वाड (भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका) और AUKUS (ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका) मजबूती से आपसी सैन्य रिश्ते बढ़ा रहे हैं। इसलिए चीन ने बर्मा को पैसे देकर कोको द्वीप का इस्तेमाल भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए किया है। कुछ खबरों के मुताबिक बर्मा ने 1992 में ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को यहां बेस बनाने की इजाजत दे दी थी। लेकिन कागज पर न तो बर्मा और न ही चीन इसकी तस्दीक करते हैं। कोको आइलैंड पर आधिपत्य का मतलब है कि मलक्का की खाड़ी पर नियंत्रण और हिंद महासागर पर पैनी नजर। जिस तरह के जासूसी उपकरणों की तस्वीर सामने आ रही है उससे ये आशंका बनती है कि वहां से इसरो के लॉन्च साइट श्रीहरिकोटा और डीआरडीओ के लॉन्च साइट चांदीपुर पर भी नजर रखी जा सकती है।

 

हमारी तैयारी

 

ऐसा नहीं है कि हमारी तैयारी कम है। अंडमान निकोबार में हमारा इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड है जो जल-थल-नभ से हमारी सीमाओं की रक्षा करने के लिए मुस्तैद है। लेकिन बिना सीमा पर खतरे के बिना महज कुछ दूरी पर घात लगाए बैठे दुश्मन की जासूसी निगाहों को अंधा करना असली चुनौती है। कोको आइलैंड पर सिग्नल इंटेलिजेंस की तैनाती तो पुरानी है लेकिन रनवे और हैंगर हैरान करने वाला है। अब जरा इस टाइमलाइन को देखिए

1. 1992- चीन ने ग्रेट कोको आइलैंड पर जासूसी उपकरण तैनात किए जो भारतीय नौसेना पर नजर रखती है। पूर्वी हिंद महासागर में दूसरे देशों की पनडुब्बियों पर भी यहां से नजर रखी जा सकती है
2.1998- अमेरिका ने कहा कि चीन की गतिविधियों के बहुत पुख्ता प्रमाण नहीं मिल रहे हैं।
3. 2005- नौसेना प्रमुख ने कहा कि कोको आइलैंड पर चीन के रडार की पुख्ता जानकारी नहीं है
4.2014- एयर मार्शल पीके रॉय ने कहा कि चीन सिविलियन इस्तेमाल के लिए रनवे बना रहा है और स्थिति खतरनाक नहीं है।
5. 2022- मक्सर ने सैटेलाइट तस्वीरों से बताया कि रडार, एंटी एयरक्राफ्ट गन और मिसाइलें कोको द्वीप पर दिखाई दे रही है
6. 2023- ताजा रिपोर्ट जिसका जिक्र हमने शुरू में ही कर दिया उससे लगता है कि यहां मिलिट्री बेस बनाया जा रहा है।

नेहरू की वो गलती

अंडमान निकोबार के लगभग 5000 द्वीपों में से एक है कोको द्वीप। लेकिन कब्जा है बर्मा का। 19 वीं सदी में अंग्रेजों ने अंडमान में कॉलोनी बसाया जहां सजायाफ्ता कैदियों को रखा जाता था। इनके लिए खाने पीने का सामान कोको से आता था। जमींदारी सिस्टम की तरह अंग्रेजों ने बर्मा के जादवेट परिवार को कोको आइलैंड लीज पर दे दिया। 1882 में ये ब्रिटिश बर्मा का हिस्सा बन गया। 1937 में बर्मा अंग्रेजों से मुक्त हो गया।

कोको स्वशासित द्वीप की तरह रहा। जब हम 1947 में आजाद हुए तो लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार की तरह कोको आइलैंड की स्थिति भी स्पष्ट नहीं थी। अंग्रेज एक मजबूत स्वतंत्र भारत नहीं चाहते थे इसलिए इन द्वीपों को देने के पक्ष में नहीं थे। इनका सामरिक महत्व था। इंडिया इंडिपेंडेंस बिल में अंडमान निकोबार द्वीप समूहों को भारत में रखा गया। इस हिसाब से कोको द्वीप भी भारत का हिस्सा होना चाहिए। लेकिन अंग्रेजों ने अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए कोको पर नजरें गड़ा दीं। लॉर्ड माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि वो इसे लीज पर ब्रिटेन को दे दें। 19 जुलाई 1947 को माउंटबेटन ने बताया कि भारत सरकार ने कोको आइलैंड पर उनकी राय मान ली है। ये नेहरू की ऐतिहासिक भूल थी। जहां सरदार पटेल ने लक्षद्वीप पर पाकिस्तानी नजर को कुंद कर दिया, वहीं नेहरू आसानी से मान गए। अंग्रेजों ने बाद में कोको आइलैंड बर्मा को दे दिया।

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