“100 किलोमीटर दूर की परीक्षा: क्या अभ्यर्थी की ज़िंदगी इतनी सस्ती है?”

“चुनाव में स्टाफ जाता है, परीक्षा में छात्र क्यों? रोज़गार की दौड़ में रास्ते ही कठिन क्यों?”

सड़क हादसों में गई युवाओं की जान, कौन लेगा जिम्मेदारी?
नौकरी की तलाश में जिंदगी हार रहे बेरोजगार।

परीक्षार्थियों का विस्थापन: CET के नाम पर हरियाणा में प्रशासनिक असंवेदनशीलता और मौतें

हरियाणा में आयोजित CET परीक्षा ने 15 लाख अभ्यर्थियों को 100-150 किलोमीटर दूर केंद्रों पर भेजा, जिससे भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव बना। कई छात्रों की सड़क दुर्घटनाओं और थकावट से मौत हो गई। सवाल उठता है—क्या परीक्षा की पारदर्शिता अभ्यर्थियों की जान की कीमत पर होनी चाहिए? क्या प्रशासनिक योजना का अभाव युवाओं के जीवन से बड़ा है? यह लेख इसी असंवेदनशील व्यवस्था पर कठोर सवाल उठाता है, और भविष्य के लिए एक जिम्मेदार व मानवीय परीक्षा प्रणाली की मांग करता है।


डॉ. सत्यवान सौरभ

परीक्षा देना किसी भी युवा के जीवन का सबसे संवेदनशील और निर्णायक समय होता है। यह वह क्षण होता है जब वर्षों की मेहनत और सपनों को हकीकत में बदलने का रास्ता खुलता है। लेकिन अगर परीक्षा केंद्र तक पहुँचने की राह ही संघर्षपूर्ण हो जाए, तो उस परीक्षा की निष्पक्षता और प्रशासनिक तैयारी पर सवाल उठना लाज़मी है।

हरियाणा में आयोजित की गई CET (कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट) परीक्षा में यही हुआ — जब राज्य भर के 15 लाख से अधिक अभ्यर्थियों को अपने घरों से 100 से 150 किलोमीटर दूर तक परीक्षा देने भेजा गया। और वह भी तब जब वे अपने ही जिले या शहर में परीक्षा देने की सुविधा की आशा रखते थे।

हरियाणा सरकार और HSSC (हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग) ने यह परीक्षा ‘सुचारु और पारदर्शी’ तरीके से आयोजित करने का दावा किया। लेकिन उस पारदर्शिता की कीमत किसने चुकाई? छात्र। जो हरियाणा के कोने-कोने से, कभी रोडवेज़ बसों में खचाखच भरे माहौल में, तो कभी निजी वाहनों में अपनी जेब खाली करते हुए परीक्षा केंद्रों तक पहुँचे। अनेक लड़कियों ने रात भर सफर करके सुबह 10 बजे की परीक्षा दी, कई ग्रामीण युवाओं ने अपने जीवन में पहली बार शहरों की तरफ अकेले कूच किया, और कुछ लोग परीक्षा केंद्र पर पहुँच ही नहीं सके। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या प्रशासन को यह एहसास नहीं कि परीक्षा केवल एक पेपर नहीं होती, वह अभ्यर्थी के पूरे जीवन की उम्मीद होती है?

हरियाणा में हर पांच साल में चुनाव होते हैं। उसमें भी बूथ ड्यूटी, पोलिंग स्टेशन की निगरानी, EVM की सुरक्षा—ये सब होता है। क्या उसमें कर्मचारियों को एक जिले से दूसरे जिले तक नहीं भेजा जाता? क्या कभी किसी मतदाता को 100 किलोमीटर दूर वोट डालने भेजा गया है? नहीं। तो फिर परीक्षा में यह असंवेदनशीलता क्यों? क्या युवा वर्ग प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं आता? क्या सरकार मानती है कि एक बेरोज़गार युवक की यात्रा, उसका समय, उसकी जेब का खर्च, उसकी परीक्षा की तैयारी—इन सबका कोई मूल्य नहीं है?

जिन युवाओं के पास किराया देने तक के पैसे नहीं थे, उन्हें परिजनों से उधार लेना पड़ा। किसी ने खेत गिरवी रखे, तो किसी ने अपनी मां की जमा पूंजी निकाली। लड़कियों और विकलांग उम्मीदवारों को न सिर्फ यात्रा की परेशानी हुई बल्कि उनके लिए रुकने, भोजन और सुरक्षा की चिंताएं और भी ज़्यादा थीं। लंबी यात्रा के बाद कोई भी मानसिक रूप से शांत नहीं रह सकता। परीक्षा में प्रदर्शन सीधे रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि छात्र मानसिक रूप से कैसा महसूस कर रहा है। जिन छात्रों का केंद्र 150 किमी दूर था, उन्हें परीक्षा से एक दिन पहले ही निकलना पड़ा। इसका सीधा असर नींद, भोजन और पढ़ाई की निरंतरता पर पड़ा।

जब छात्र एडमिट कार्ड डाउनलोड करते हैं, तब उनसे परीक्षा केंद्र का प्राथमिक शहर चुनने का विकल्प दिया जा सकता था, जैसा कई राष्ट्रीय परीक्षाओं में होता है। हर जिले में कम से कम 5-10 सरकारी या निजी संस्थान तो हैं ही, जहां परीक्षा आयोजित हो सकती थी। जैसे चुनाव में कर्मचारी अन्य जिलों में ड्यूटी करते हैं, वैसे ही शिक्षक, पर्यवेक्षक और अन्य स्टाफ को दूर भेजा जा सकता था। छात्र अपने ही ज़िले में परीक्षा देते।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह एक सोची-समझी योजना थी या व्यवस्थागत असफलता? क्या प्रशासन को छात्रों के संघर्ष की कोई चिंता नहीं? क्या यह बेरोज़गार युवाओं की परीक्षा लेने के नाम पर उनका मनोबल तोड़ने की प्रक्रिया नहीं है? क्या HSSC खुद को जवाबदेह मानती है या सिर्फ नोटिस निकाल देना पर्याप्त है?

हरियाणा के नेताओं ने इस विषय पर कोई विशेष संवेदनशीलता नहीं दिखाई। जबकि यही छात्र आने वाले समय में वोटर भी हैं और परिवर्तन के वाहक भी। राजनीतिक दलों को चाहिए था कि इस मुद्दे पर खुलकर सरकार से सवाल पूछते। लेकिन अफसोस, बेरोज़गारी का मुद्दा अब शोर में दबा दिया गया है, और रोजगार की परीक्षा अब छात्रों के सहनशीलता की परीक्षा बन गई है।

हरियाणा CET परीक्षा के दौरान ऐसी कई घटनाएं सामने आईं जो ना सिर्फ दुःखद थीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की पोल भी खोल गईं। जींद में एक छात्र का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया, जब वह मोटरसाइकिल से परीक्षा केंद्र जा रहा था। भिवानी में एक महिला अभ्यर्थी की तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल में मौत हो गई, वजह—थकावट, गर्मी और तनाव। रोहतक में बस में सफर के दौरान एक छात्र को हार्ट अटैक आया और उसकी मृत्यु हो गई। परिवार का कहना था कि वह पिछली रात से बिना सोए निकला था और खाना भी नहीं खाया था। कैथल-करनाल हाईवे पर ट्रक से टकराई बाइक पर सवार दो अभ्यर्थियों की मौके पर मौत हो गई। सिरसा में दो सगे भाई परीक्षा देने जाते हुए दुर्घटना का शिकार हुए और जान चली गई। रेवाड़ी में परीक्षार्थियों से भरी एक कार पलटी, जिसमें कई छात्र घायल हो गए।

इन खबरों ने साबित कर दिया कि परीक्षा केंद्रों की गलत प्लानिंग सिर्फ असुविधा नहीं, जीवन की कीमत पर खड़ी की गई प्रशासनिक गलती थी।

100-150 किमी की लंबी यात्रा, वो भी सुबह 10 बजे की परीक्षा के लिए, छात्रों को रात में ही निकलना पड़ता है। थकावट और तनाव, जो सीधे हार्ट अटैक या दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है। रहने-खाने की कोई व्यवस्था नहीं, कोई छात्र स्टेशन पर सोया, कोई बस स्टैंड पर, और कोई खुले में इंतज़ार करता रहा। सड़क सुरक्षा की घोर अनदेखी — इतने बड़े परीक्षा आयोजन के दौरान कोई ट्रैफिक प्लान या मेडिकल बैकअप नहीं।

सरकार और प्रशासनिक अधिकारी अगर इन मौतों पर संवेदना व्यक्त कर भी दें, तो सवाल यह है — क्या ये मौतें रोकी नहीं जा सकती थीं? क्या एक बेहतर परीक्षा केंद्र प्रणाली, ज़िलावार आयोजन, और परिवहन की व्यवस्था इन जिंदगियों को बचा नहीं सकती थी?

सपनों के पीछे भागते हुए छात्र नहीं मरे, मरा है सिस्टम — जो संवेदनहीन होकर देखता रहा।

अब सवाल उठता है — क्या HSSC इन मौतों पर जवाबदेह ठहराया जाएगा? क्या परीक्षा केंद्र निर्धारण के मानदंडों की समीक्षा होगी? क्या आने वाली परीक्षाओं में कोई सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे? अगर नहीं, तो ये मौतें महज़ आंकड़े बन जाएंगी, और हर अगली परीक्षा में फिर कोई नया अभ्यर्थी… नौकरी की उम्मीद में जान गंवाता रहेगा।

परीक्षा केंद्र निर्धारण में “होम डिस्टिक्ट प्रेफरेंस” लागू किया जाना चाहिए। परीक्षा व्यवस्था में शिक्षा विभाग के अनुभवी अधिकारियों को जोड़ा जाए। सीटिंग प्लान और स्टाफ तैनाती का मॉडल चुनाव आयोग से सीखा जाए। हर जिले में स्थायी “एग्जाम सेंटर इनफ्रास्ट्रक्चर” विकसित किया जाए। परीक्षार्थियों से फीडबैक और सुझाव अनिवार्य रूप से लिए जाएं। ट्रैफिक, मेडिकल और सुरक्षा योजना हर बड़े परीक्षा आयोजन से पहले बनाई जाए।

यह सुखद है कि हरियाणा के कई कोनों से अभ्यर्थियों ने सोशल मीडिया, धरनों और याचिकाओं के माध्यम से इस विस्थापन मॉडल का विरोध किया है। अब यह जरूरी है कि यह विरोध संगठनात्मक रूप ले और सरकार तक आवाज़ पहुंचे कि—हम परीक्षा देने को तैयार हैं, लेकिन अपने आत्मसम्मान को गिरवी नहीं रखेंगे।

सरकार को यह याद रखना होगा कि बेरोज़गार युवा सिर्फ नौकरी के लिए आवेदन नहीं करते, वे देश के भविष्य की बुनियाद रख रहे होते हैं। अगर हम उन्हें ही यूँ दर-दर भटकाकर थका देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ किस व्यवस्था पर भरोसा करेंगी?

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