चरण सिंह
कहने को तो सभी पार्टियां देशभक्ति का राग अलापती रहती हैं पर जमीनी हकीकत यह है इनको देश और समाज से कोई लेना देना नहीं है। चुनाव के समय भले ही ये दल जनता जनार्दन बोलते हों पर जनता इनके लिए वोट से ज्यादा कुछ नहीं। सब दलों का अपना अपना वोटबैंक है। इन दलों की राजनीति बस अपने वोटबैंक के इर्द गिर्द घूमती है। देश में किसान संगठनों की भरमार इसलिए है क्योंकि विपक्ष किसानों से जुड़े मुद्दे नहीं उठा रहा है। श्रमिकों की लड़ाई तो आज की तारीख में लड़ी ही नहीं जा रही है। लड़ी भी कैसे जाए सभी दल उद्योपतियों के पैसों के दम पर राजनीति कर रहे हैं।
उत्तराखंड में अंकिता भंडारी कांड पर राजनीतिक दल बोलना तब शुरू किए जब पूरा उत्तराखंड उबल गया। अरावली पहाड़ियों का मुद्दा विपक्ष को तब दिखाई दिया जब राजस्थान और हरियाणा में जनांदोलन खड़ा हो गया। उन्नाव रेप कांड की पीड़िता दिल्ली में रोती बिलखती रही पर विपक्ष का साथ उसे न मिला। सुप्रीम कोर्ट की ओर से राहत मिली।
दरअसल देश में जितनी भी पार्टियां हैं वे सब कुछ सत्ता पाने और बचाने में लगे हैं। जनहित के मुद्दे न उठाने की वजह से आम लोगों को जोड़ने में विफल साबित हो रहे हैं। निश्चित रूप से केंद्र सरकार और बीजेपी शासित प्रदेश सरकारों से लोग खुश नहीं हैं पर विपक्ष जनता से जुड़े मुद्दे उठाने को तैयार नहीं। चाहे एसआइआर का मुद्दा और एवीएम का मुद्दा हो या फिर वोट चोरी का मुद्दा, ये सभी मुद्दे सत्ता से जुड़े हैं। यदि केंद्र सरकार पर यह आरोप लगता है कि जिस प्रदेश में चुनाव करीब होते हैं उस प्रदेश के विपक्ष के नेताओं के घरों और ऑफिस पर ईडी के छापे पड़ने शुरू हो जाते हैं। यदि प्रदेश में गैर बीजेपी शासित सरकार हो तो मंत्रियों और विधायकों पर शिकंजा कसा जाता है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब बीजेपी मनमानी कर रही है। तो जनता क्यों नहीं उबल रही है ? इसकी बड़ी वजह यह है कि विपक्ष एकजुट होकर जनहित के मुद्दों पर संघर्ष नहीं कर पा रहा है। कांग्रेस एसआईआर मुद्दे पर आक्रामक है तो सपा पीडीए का राग अलाप रही है। बिहार में आरजेडी माई समीकरण से बाहर नहीं निकल पा रही है। आम आदमी पार्टी दिल्ली चुनाव क्या हार गई कि जैसे उसके पास कोई मुद्दा ही न बचा हो।
टीएमसी को मोदी सरकार के 11 साल के गलत काम दिखाई नहीं दिए ? यदि दिखाई दिए तो टीएमसी नेता बताएं पार्टी कितनी बार जनहित के मुद्दे पर सड़क पर उतरी है? अब जब चुनाव करीब आ रहे हैं और ईडी की छापामारी हुई तो टीएमसी ने कोलकाता से लेकर दिल्ली तक बवाल मचा दिया। विपक्ष के किसी नेता के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि जनहित के मुद्दे पर ये लोग सड़कों पर क्यों नहीं उतरते ? एकजुटता क्यों नहीं दिखाते ? मोदी सरकार को 12 साल होने जा रहे हैं पर एक भी आंदोलन विपक्ष ने एकजुटता के साथ जनता के लिए नहीं किया है।
विपक्ष में बैठी लगभग सभी पार्टियां अपना स्वार्थ साधने में लगी हैं। यदि ये लोग बदलाव के लिए प्रयास करते तो नीतीश कुमार की अगुआई में इंडिया गठबंधन बनाते तो 2024 का लोकसभा चुनाव शायद जीत जाते हैं। ये सभी पार्टियां अपने अपने प्रदेश में सत्ता चाहती हैं। यही वजह रही कि पंजाब के साथ दिल्ली और हरियाणा में भी आप कांग्रेस मिलकर चुनाव न लड़ सकीं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने सपा को नहीं सटाया।
उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का टकराव समय समय सामने आता रहता है। मतलब बदलाव से ज्यादा इन पार्टियों को प्रदेश की सत्ता की चिंता है। जनता तो इन लोगों के लिए बस वोटबैंक है। ममता बनर्जी अब तो गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के खिलाफ आग उगल रही रही हैं पर जब नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों से मिलकर इंडिया गठबंधन खड़ा किया था। सभी विपक्षी पार्टियों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया था। तब ममता बनर्जी ने ही नीतीश कुमार को नीचा दिखाने के लिए संयोजक पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रस्तावित किया था और अरविन्द केजरीवाल ने समर्थन दिया था।
दरअसल कोलकाला में IPAC कंपनी के खिलाफ ईडी की रेड को लेकर सियासी बवाल खड़ा हो गया है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि ईडी ने छापे मारने की आड़ में पार्टी की चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों की लिस्ट, अंदरूनी डेटा और फाइनेंशियल कागजात लूट लिए गए । दरअसल कोलकाता में कई ठिकानों पर गुरुवार को ईडी ने रेड मारी थी। इनमें से दो रेड IPAC कंपनी के खिलाफ भी थीं।
यह कंपनी टीएमसी के चुनावी मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभाल रही है। इस रेड के बाद बंगाल का सियासी पारा चढ़ गया है, जिसका असर दिल्ली तक दिख रहा है। शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के 8 सांसदों ने दिल्ली में होम मिनिस्टर, अमित शाह के दफ्तर के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ऑफिस के बाहर विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया।








